Saturday, February 25, 2012

स्वस्थ भारत बीमार भारत

राजकिशोर

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत को उन देशों की सूची से निकाल दिया है जहाँ पोलियो अभी तक मौजूद है। पिछले साल भर में पोलियो का एक भी मामला सामने नहीं आया। अगर अगले साल भी पोलियो का कोई भी मामला सामने नहीं आया, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन भारत को पोलियो-मुक्त देश घोषित कर देगा। इसके बाद पाकिस्तान और नाइजीरिया, दो ऐसे देश रह जाएँगे जहाँ पोलियो बचा रह जाएगा।  विश्व स्वास्थ्य संगठन, रोटरी इंटरनेशनल, यूनिसेफ तथा कई अन्य संगठनों और कुछ सरकारों द्वारा पोलियो के विरुद्ध वर्तमान अभियान इसी तरह जारी रहा, तो उम्मीद की जा सकती है कि अगले कुछ वर्षों में पूरी दुनिया पोलियो के कीटाणुओं से मुक्त हो जाएगी।
          पोलियो दूसरी भयंकर बीमारी है जिससे धरती को निजात मिलने जा रही है। इसके पहले चेचक को अलविदा कहा जा चुका है। पोलियो और चेचक, दोनों ही खतरनाक बीमारियाँ हैं जिनसे अब तक करोड़ों क्या, अरबों लोग मर चुके हैं या विकलांग हो चुके हैं। चेचक ने कई सौ सालों तक यूरोप में तूफान बरपा कर रखा था। वहाँ के कई राजा-रानी तक चेचक के शिकार हो कर मर गए। अंग्रेजों के भारत में आने के बाद चेचक का संक्रमण यहाँ भी बड़े पैमाने पर हुआ। लेकिन मानवता के सम्मिलित प्रयास से चेचक अब इतिहास की वस्तु बन चुका है। महामारी के रूप में प्लेग और हैजे का भी लगभग खात्मा हो चुका है। बेशक एड्स नामक अब तक की सबसे भयावह संक्रामक बीमारी  का खतरा दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है, लेकिन वैज्ञानिक इस मोर्चे पर भी सघन प्रयास कर रहे हैं कि इससे बचने का कोई सक्षम तरीका निकल आए। बीमारियों से लड़ने के विश्वव्यापी इतिहास को देखते हुए हमें आशावादी होने का पूरा अधिकार है।
          लेकिन आशावाद की भी एक सीमा होती है। कल अगर एड्स का टीका निकल आता है, तो समस्या सिर्फ यह रह जाएगी कि किस तरह विश्व की पूरी आबादी को या उस आबादी को जिसके एड्स द्वारा संक्रमित हो जाने का खतरा है, यह टीका लगा दिया जाए। इसके लिए पैसा और कार्यकर्ता जुटाने में परेशानी नहीं होगी, जैसा कि चेचक और पोलियो उन्मूलन कार्यक्रम के दौरान पाया गया। लेकिन ये वे बीमारियाँ हैं जो संक्रमण से होती हैं और संक्रमण के लिए राष्ट्रों की सीमाओं का कोई मतलब नहीं है। जब तक धरती के एक भी हिस्से में पोलियो के कीटाणु  सक्रिय हैं, तब तक दुनिया के हर देश में उनके संक्रमण का खतरा मौजूद है। पश्चिम ने बहुत पहले ही चेचक और पोलियो से मुक्ति पा ली थी, लेकिन उसे डर था कि दूसरे देशों में जब तक ये बीमारियाँ रहेंगी, वह स्वयं भी सुरक्षित नहीं है। इसलिए उसकी संस्थाओं और सरकारों ने इन बीमारियों को जड़ से मिटा देने का बीड़ा उठाया और इसमें सफलता हासिल की। एड्स के साथ भी यही होगा। पर इससे भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे एशियाई देश तथा अफ्रीका के तमाम देश बीमारी-मुक्त नहीं हो जाएँगे, जहाँ की अधिकांश गरीब आबादी उन बीमारियों से ग्रस्त रहती है जिनका संबंध गरीबी, अज्ञान और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से है। विश्व गरीबी और विश्व बीमारी, दोनों के बीच बहुत घनिष्ठ रिश्ता है।
          इस रिश्ते को हम अपने देश में बहुत अच्छी तरह पहचान सकते हैं। कल ही यूनिसेफ द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट आई कि दुनिया भर में जो लोग खुले में शौच करते हैं, उनमें भारतीयों की संख्या सबसे ज्यादा है। यहाँ के लगभग 58 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं (चीन में सिर्फ पाँच प्रतिशत, पाकिस्तान और इथिओपिया में सिर्फ साढ़े चार प्रतिशत), जिससे अनेक बीमारियों के संक्रमण का खतरा बना रहता है। केंद्रीय सरकार लगभग एक दशक से सब के लिए शौचालय का कार्यक्रम चला रही है, इसके बाद यह स्थिति है। इस दर से प्रत्येक घर में शौचालय होने का लक्ष्य प्राप्त करने में हमें पता नहीं कितने दशक लग जाएँगे।  
          यही, बल्कि इससे ज्यादा बुरी स्थिति पीने का साफ पानी  मुहैया करने की है। सभी जानते हैं कि प्रदूषित जल के उपयोग से बहुत सारी बीमारियाँ होती हैं। पीलिया, डायरिया और टायफायड से अब भी हर साल लाखों भारतीयों की – खासकर बच्चों की – मृत्यु होती है। कुपोषण से होनेवाली बीमारियों की कोई सीमा नहीं है। स्वास्थ्य सुविधाएँ उचित समय पर प्राप्त न होने से भी लाखों भारतीय हर सास बेमौत मारे जाते हैं। प्रसव कोई बीमारी नहीं है – यह एक सामान्य स्थिति है। लेकिन प्रसव के दौरान या प्रसव के कारण मरनेवाली महिलाओं की संख्या के मामले में भारत बहुत आगे है।
          इसलिए चेचक-मुक्त या पोलियो-मुक्त या कुछ वर्षों में संभव दिख रहे कोढ़-मुक्त भारत को हम स्वस्थ भारत का प्रतीक नहीं मान सकते। टीका लगा कर हम मलेरिया, टीबी, टायफायड, डायरिया, हैजा आदि से देश को राहत नहीं दिला सकते। अगर इनका टीका निकल भी आए, तो कुपोषण या अपर्याप्त आहार का क्या करेंगे जिनसे तरह-तरह की बीमारियों का खतरा बना रहता है शहरी और ग्रामीण, दोनों तरह की आबादी में मधुमेह और रक्तचाप बड़ी तेजी से फैल रहे हैं जिनका मुख्य कारण जीवन में बढ़ता हुआ तनाव है। तनाव की समस्या नई जीवन स्थितियों से पैदा हो रही है जिनके केंद्र में असुरक्षा की भावना है। तथाकथित सुखी और संपन्न लोग भी भयंकर तनाव में जी रहे हैं, क्योंकि जीने और काम करने के वर्तमान वातावरण में कहीं किसी तरह का सकून नहीं है। भारत आज कई गंभीर अर्थों में एक बीमार देश है।
          जाहिर है, इसके लिए हमारे सार्वजनिक जीवन की वह व्यवस्था जिम्मेदार है जिसके मन में स्वस्थ भारत की कोई कल्पना ही नहीं है। वह न शारीरिक बीमारियों से लड़ना चाहती है न मानसिक बीमारियों से। रोज ही विकास दर के बारे में दावे किए जाते हैं या चिंता जताई जाती है, पर रोगमुक्त या स्वस्थ भारत का नाम किसी नेता, मंत्री, उद्योगपति या विचारक की जबान पर नहीं आता।    

Friday, February 24, 2012

व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कब तक बचेंगे?

राजकिशोर


दिल्ली के रामलीला मैदान में पिछले साल 5 जून को जो पुलिस बर्बरता की गई थी, उस पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर चारों ओर से जो आश्चर्य प्रगट किया जा रहा है, वह स्वाभाविक ही नहीं, उचित भी है। भारत के न्यायिक इतिहास में इस तरह का समन्वयवादी फैसला पहली बार आया है। इस मुकदमे का सबसे अच्छा पहलू यह है कि 5 जून की जिस घटना ने देश की अंतश्चेतना को हिला दिया, उसका संज्ञान सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी ओर से लिया। अन्यथा बड़ी-बड़ी घटनाएँ होती रहती हैं और अदालतें इस इंतजार में चुप रहती हैं कि कोई आए और उनकी शिकायत दायर करे। लेकिन इस मुकदमे के फैसले में अदालत की ओर से जो कुछ कहा गया और जो आदेश पारित किए गए, उनसे लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय खुद ही उलझनों का शिकार हो गया और उसने फैसला सुनाते समय एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। रामलीला मैदान की वह घटना, जिसमें आधी रात को दिल्ली पुलिस के बंदे सोए हुए लोगों पर किसी विदेशी सेना की तरह टूट पड़े, कोई ऐसी घटना नहीं थी, जिसके साथ न्याय करने में बीच का कोई रास्ता उपलब्ध हो।
ऐसा भी नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के दोनों माननीय न्यायाधीशों को, जिन्होंने इस मामले पर विचार किया है, इस बात का एहसास न रहा हो। उन्होंने जिन कठोर शब्दों में उस रात दिल्ली पुलिस द्वारा किए गए लाठी प्रहार की निंदा की है, उसमें दुविधा की हलकी-सी रंगत भी नहीं है। अदालत ने साफ-साफ कहा है कि यह पुलिस का अत्याचार था और लोकतंत्र पर हमला था। यह लगभग उसी प्रकार की प्रतिक्रिया है जैसी जलियावाला बाग की घटना पर किसी सभ्य दिमाग की हो सकती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि जलियावाला बाग में जुल्म कर रही पुलिस के हाथ में बंदूकें थीं और रामलीला मैदान को बाबा रामदेव के काला धन विरोधी अभियान के समर्थकों से खाली कराने गई पुलिस के पास लाठियाँ। लेकिन इरादे और तौर-तरीकों में कोई फर्क नहीं था।
विचित्र ही है कि माननीय न्यायाधीशों को इस आकस्मिक तथा तात्कालिक उत्तेजना से शून्य इस अश्लील हमले के पीछे कोई दुर्भावना नजर नहीं आई। बाबा रामदेव और उनके द्वारा आह्वानित सामूहिक धरने में शामिल हजारों लोगों से केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस में किसी की व्यक्तिगत अदावत या नापसंदगी क्या हो सकती है! अगर न्यायालय का इरादा इस तरफ इशारा करना है, तो यह सच हो सकता है। लेकिन यह तो कोई भी देख सकता है कि सरकार का एकमात्र लक्ष्य काले धन के विरुद्ध बाबा रामदेव के अभियान को चोट पहुँचाना था और इसमें वह एक तरह से सफल भी हुई। यह व्यक्तिगत दुर्भावना से अधिक गहरी चीज है, क्योंकि यह राजनीतिक दुर्भावना है - नागरिकों की न्यायसंगत माँगों के प्रति सरकार की घोर असहिष्णुता और देश को एक अधिनायकवादी मिजाज से चलाने की जिद का एक घातक नमूना है। माननीय न्यायाधीशों की टिप्पणियों में इस आशय के अनेक शब्द खोजे जा सकते हैं। इसलिए हम यह बहाना नहीं कर सकते कि उन्हें घटना की गंभीरता का एहसास नहीं था। लेकिन उन्होंने इलाज की जो परची लिखी है, वह वास्तव में इस बीमारी की रोकथाम कर सकती है, इसमें शक करनेवालों की संख्या अनंत होने को बाध्य है।
सर्वाधिक विचारणीय बात हरजाने की वह रकम है जो सरकार को देनी है। इतनी संपन्न सरकार के लिए पाँच-सात लाख रुपए का हरजाना मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है। वह हँसते हुए यह रकम दे देगी। सवाल यह है, यह पैसा किसकी जेब से जाएगा? क्या यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं है कि जनता के वोट से पाई हुई ताकत का इस्तेमाल कर सरकार नागरिकों की एक संविधान-सम्मत, बल्कि संविधान के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लक्ष्य से जुटी, सभा पर हमला करवाती है और फिर उसी जनता द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से उस हमले के शिकार लोगों को राहत बाँट देती है? असल में, नुकसान किसका हुआ? जुर्माने का भार किस पर पड़ा? ऐसे सभी मामलों में होना यह चाहिए कि जिनके गलत फैसले से इस तरह का लोमहर्षक कांड हुआ, उन्हें व्यक्तिगत रूप से दंडित किया जाए। वर्तमान मामले में हरजाने की रकम उनसे वसूल की जानी चाहिए, जो इस हमले के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसा नियमित रूप से होने से ही सरकार चलानेवाले लोग सँभल कर काम करना सीखेंगे और गलत फैसले लेने से बचने की कोशिश करेंगे। काश, टूजी घोटाले की तरह इस घोटाले के लिए भी किसी की जिम्मेदारी तय की गई होती और ए. राजा की तरह कोई बी. राजा भी पकड़ कर तिहाड़ जेल में डाल दिया जाता। लोकतंत्र पर हमला सौ-पचास अरब रुपयों की धोखाधड़ी से ज्यादा गंभीर घटना है।
सरकारी कामकाज में व्यक्तिगत जिम्मेदारी के सिद्धांत को ज्यादा करके इसलिए लागू नहीं किया जाता कि भूल किसी से भी हो सकती है। यदि भूल हो जाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को स्वीकार न किया जाए, तो कोई भी सरकारी अधिकारी कोई भी महत्वपूर्ण निर्णय करते हुए घबराएगा। व्यक्तिगत जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाने के लिए वह कोशिश करेगा कि उसे कोई निर्णय लेना ही न पड़े। नतीजा यह होगा कि सरकार ठप पड़ जाएगी। चूँकि सरकार को निर्णय तो लेने ही पड़ते हैं, इसीलिए यह नीति निर्धारित की गई है कि गलती हो जाने पर वह किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं मानी जाएगी न ही इसके लिए किसी एक व्यक्ति को दंडित किया जाएगा। लेकिन अनेक निर्णय भूल से ज्यादा होते हैं। उनके पीछे स्वार्थ या दुर्भावना होती है। ऐसे मामले हमेशा अलग से पहचाने जा सकते हैं। किसी भी सोच-विचारवाले आदमी की मान्यता यही होगी कि 5 जून का हमला किसी की भूल नहीं थी – यह एक उद्धत और अहंकारी फैसला था। ऐसे फैसलों के लिए व्यक्तिगत दंड की नीति बनाना जरूरी है।
न्यायालय ने उन पुलिसवालों की शिनाख्त करने और उन पर मुकदमा चलाने का हुक्म दिया है जो उस बर्बर कांड के लिए जिम्मेदार हैं। क्या यह आसान होगा? क्या इस फैसले पर वास्तव में अमल हो सकेगा? क्या इन पुलिसवालों ने अपनी खुद की पहल पर ऐसा किया होगा? क्या खुद की पहल पर वे ऐसा कर सकते थे? ये जायज सवाल अपनी जगह पर हैं। फिर भी चूँकि हमें सर्वोच्च न्यायालय की बुद्धिमत्ता पर विश्वास बनाए रखना है, इसलिए हम यही कहेंगे कि उसके आदेश पर अगर दोषी पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई होती है, तो यह भी मामूली उपलब्धि नहीं होगी। इसके बाद सरकार के सभी अधीनस्थ कर्मचारी कोई भी गलत काम करने से यह सोच कर हिचकेंगे कि उन्हें आदेश देनेवाले तो दंडित होने से बच जाएँगे, पर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर दोषी तथा सजा का पात्र करार दिया जाएगा। 000

Friday, January 28, 2011

विनायक सेन के समर्थन में

राजद्रोह बनाम देशद्रोह

राजकिशोर

बिनायक सेन को राजद्रोह के लिए उम्रकैद की सजा दी गई है। इसके औचित्य पर काफी बहस हुई है और आगे भी होती रहेगी। इस बहस में जो बात उभर कर आ रही है, वह यह है कि देशद्रोह और राजद्रोह एक नहीं हैं। रायपुर की जिस अदालत ने सेन को उम्रकैद की सजा सुनाई है, उसने भी छत्तीसगढ़ राज्य के इस आरोप को निरस्त कर दिया है कि बिनायक सेन ने भारतीय राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा है या इसमें मदद की है। इससे यह साबित होता है कि बिनायक सेन और चाहे जो हों, पर वे देशद्रोही नहीं हैं। लेकिन अदालत ने यह माना है कि वे राजद्रोह के अपराधी हैं।

राजद्रोह क्या है? हमारे कानून में इसकी परिभाषा यह है कि वह व्यक्ति राजद्रोह का अपराधी है जो देश में विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध असंतोष या अस्नेह की भावना फैला रहा हो। बिनायक सेन सरकार के विरुद्ध असंतोष या आक्रोश फैला रहे थे, इसलिए वे राजद्रोही हैं। इस निष्कर्ष को पचा पाना मुश्किल है। सच तो यह है कि जब भारत में आजाद और संप्रभु सरकार की स्थापना हुई, तभी से सरकार के विरुद्ध असंतोष की भावना का इजहार किया जा रहा है। स्वयं महात्मा गांधी नई सरकार से असंतुष्ट थे। नई-नई बनी सरकार की आलोचना करना वे नहीं चाहते थे, जो उनके अपने ही शिष्यों द्वारा ही चलाई जा रही थी। फिर भी उन्होंने तरह-तरह से अपना असंतोष प्रगट किया। पाकिस्तान को उसका 55 लाख रुपया दिलवाने के लिए तो वे अनशन पर ही बैठ गए। कम्युनिस्ट तो इसे आजादी भी मानने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि नेहरू की सरकार पूँजीपतियों की सरकार है। जब तक भारत आर्थिक दृष्टि से आजाद नहीं होता, तब तक सिर्फ राजनीतिक आजादी का कोई मूल्य नहीं है। हिंदूवादी भी इस सरकार के कटु आलोचक थे, क्योंकि इससे हिन्दू राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त नहीं हो रहा था।

क्या ये सभी राजद्रोही थे?

बिहार आंदोलन के दिनों में जयप्रकाश नारायण पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे सीआइए के एजेंट हैं और लोकतांत्रिक विधि से चुनी गई सरकारों को बरख्वास्त कराना चाहते हैं। बाद में इतिहास ने साबित किया कि जयप्रकाश ही सही थे, उनके आलोचक नहीं। आज जयप्रकाश को इंदिरा गांधी से बड़ा व्यक्तित्व माना जाता है। क्या जयप्रकाश राजद्रोही थे? सरकारी परिभाषा के अनुसार उन्हें राजद्रोही साबित करना बेहद आसान था। जयप्रकाश की इस सलाह से बहुत-से लोग चौंके भी थे कि अगर किसी राजकीय कर्मचारी को कोई ऐसा आदेश मिले जो संविधान या कानून के विरोध में है, तो कर्मचारी का कर्तव्य है कि वह उसका पालन न करे। यह स्थापना अतिवादी लग सकती है, पर इसमें दम है। कोई भी कर्मचारी सरकार का कर्मचारी नहीं होता, वह राज्य का कर्मचारी होता है। सरकार भी राज्य का ही एक अंग है। उसे कार्यपालिका कहा जाता है। राज्य के अन्य दो महत्वपूर्ण अंग हैं विधायिका और न्यायपालिका। विधायिका और न्यायपालिका के आदेश कार्यपालिका के आदेश से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसलिए जब कार्यपालिका का आदेश विधायका और न्यायपालिका के आदेश से मेल न खाता हो, तब राजकीय कर्मचारी अगर उसकी अवज्ञा करता है, तो वह सजा का नहीं, बधाई का पात्र है। अगर यह मान्यता स्वीकार कर ली जाती है, तो सभी सरकारें सचेत हो जाएँगी और वे जन विरोधी आदेश कम से कम देंगी। प्रश्न यह है, क्या इस प्रकार की अवज्ञा को राजद्रोह कहेंगे?

अगर सरकार के विरुद्ध अस्नेह फैलाना राजद्रोह की सीमा में आता है, तो समझ में नहीं आता कि विपक्ष और स्वतंत्र प्रेस की जरूरत क्या है। इनका तो काम ही सरकार के गलत कामों की आलोचना करना है। प्रेस से अगर यह आजादी छीन ली गई, तो उसका व्यक्तित्व क्या रह जाएगा? जहाँ तक विपक्ष का सवाल है, उसके नेता समय-समय पर राष्ट्रपति के पास जाते रहते हैं और सरकार को बरख्वास्त करने की माँग करते रहते हैं। क्या यह राजद्रोह है? विपक्ष विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाता है। इस प्रस्ताव में कहा जाता है कि सरकार ने संसद का विश्वास खो दिया है, इसलिए उसे इस्तीफा दे देना चाहिए। क्या इसे भी राजद्रोह कहा जाएगा?

हमें यह समझने में पता नहीं कितना समय लगेगा कि सरकार और राज्य एक नहीं हैं और सरकार तथा देश एक नहीं हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं, राज्य बना रहता है। देश की सत्ता राज्य से भी बढ़ कर है। राज्य संविधान, कानून और फौज से चलता है, जबकि देश एक भावना है, जिसके मूल में राष्ट्रीयता का भाव होता है। माओवादी भी यह नहीं कहते कि हम एक देश के रूप में भारत का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। वे यह भी नहीं कहते कि हम सत्ता में आएँगे, तो भारतीय राज्य को विघटित कर देंगे। माओवादी सरकार की सत्ता को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। विपक्ष के सभी दल ऐसा ही चाहते हैं। माओवादी इस आधार पर इनसे अलग हैं कि वे हिंसा के द्वारा देश की राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। यह जरूर आपत्तिजनक है, क्योंकि हिंसा के बल पर राज्य की सत्ता पर कब्जा करने की नीति से न राज्य रह जाएगा न देश। उच्छृखलता और हिंसावाद किसी भी देश के अस्तित्व के लिए सतत खतरा हैं।

कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि राजद्रोह देशभक्ति के लिए आवश्यक हो जाए। महात्मा गांधी महान देशभक्त थे। पर उन्हें राजद्रोह के अपराध में सजा दी गई थी। बाल गंगाधर तिलक को भी राजद्रोह के मुकदमे का सामना करना पड़ा था। क्या स्वतंत्र भारत में लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी नहीं हो सकते? बल्कि आज तो उनकी ज्यादा जरूरत है। जो अन्यायी और शोषणकारी व्यवस्था का विरोध करता है, उसे देशभक्त माना जाना चाहिए। उसे राजद्रोही वही कहेगा जो देश को सरकार का पर्याय मानता है। 000

तारीख

पेट्रोल की कीमतें

दोहरी मूल्य प्रणाली के समर्थन में

राजकिशोर

पिछले साल भर में पेट्रोल तथा डीजल की कीमतों में जिस तेजी से वृद्धि की गई है, वह आश्चर्यजनक है। पहले की बात और थी। जब विश्व बाजार में क्रूड तेल की कीमतें बढ़ती थीं, तो इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ता था। झटके का कुछ हिस्सा सरकार सँभाल लेती थी। यूपीए सरकार ने तय किया कि हम पेट्रोल उत्पादों पर सब्सिडी जारी नहीं रखेंगे। पेट्रोल उत्पादों की कीमतें बाजार द्वारा निर्धारित होंगी। इसी का नतीजा है कि सभी तेल कंपनियाँ अपने उत्पादों की कीमतें लगातार बढ़ाती रही हैं। जब कोई दल पेट्रोल की कीमत वृद्धि का विरोध करता है, तो सरकार का जवाब होता है – इस मामले में हम कुछ नहीं कर सकते। जब विश्व बाजार में कीमत बढ़ जाती है, तो हमें भी कीमत बढ़ानी पड़ती है।

सरकार के इस तर्क से युद्ध नहीं किया जा सकता। वाकई कोई भी चीज अपनी कीमत पर ही बिकनी चाहिए। आम तौर पर सब्सिडी देना कोई अच्छी बात नहीं है। यह एक तरह से खैरात देना है, जिसे किसी को स्वीकार भी नहीं करना चाहिए। मुश्किल यह है कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जिसमें आर्थिक स्तर पर भयावह विषमता है। ऐसे समाज में एक ही कीमत किसी को जरा भी बोझ नहीं लगती, तो दूसरे का जेब खाली कर देती है। जब आय में भयावह विषमता है, तो खर्च में भी भयावह विषमता होना अनिवार्य है। इसलिए कोई भी कीमत वृद्धि समाज के सभी वर्गों को समान रूप से प्रभावित नहीं करती। दाल-चावल या सब्जियों की कीमत बढ़ती है, तो उच्च वर्ग में इनकी खपत कम नहीं हो जाती, लेकिन जिनके पास कम पैसा है, उन्हें इन वस्तुओं का उपभोग कम करना पड़ जाता है। जब शक्कर का दाम बढ़ा था, तब बहुत-से परिवारों ने फीकी चाय पीना शुरू कर दिया था। इसी तरह, अब जब कि सब्जियों की कीमतें आग उगल रही हैं, साधारण लोग जहाँ तक संभव है, सब्जी के उपभोग में कटौती कर रहे हैं।

पेट्रोल के साथ ऐसा नहीं है। जब पेट्रोल की कीमत बढ़ाई जाती है, तब उसका उपभोग कम नहीं हो जाता। कोई स्कूटर वाला बस से चलना शुरू नहीं कर देता, हालाँकि आजकल बसों या मेट्रो रेल की दरें कोई आरामदेह नहीं हैं। कुछ लोगों की कमाई का बीस से तीस प्रतिशत तक घर से कार्य स्थल तक जाने और वहाँ से लौटने में खर्च हो जाता है। तिस पर समय से पहुँचने की कोई गारंटी नहीं है। इसीलिए निजी वाहनों का चलन बढ़ता जा रहा है। महानगरों में तो फिर भी सार्वजनिक वाहनों की व्यवस्था है – वह चाहे जैसी हो, पर छोटे शहरों और कस्बों में सार्वजनिक वाहन खरगोश के सींग की तरह अदृश्य हैं। इसलिए वहाँ जिसके पास भी साधन हैं, वह स्कूटर, मोटरसाइकिल या सेकंड हैंड कार खरीद कर ही रहता है। इससे भी पेट्रोल की खपत तेजी से बढ़ रही है। अगर इन रिहायशों में उचित संख्या में बसें चला दी जाएँ या ट्राम गाड़ी की शुरुआत कर दी जाए, तो इस दुर्लभ ईंधन की काफी बचत हो सकती है।

तो किस्सा यह है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर वाहन रखने वाले साधारण लोगों की जेब पर तुरंत असर होता है। ईंधन पर उनका खर्च बढ़ जाता है। इसमें कटौती भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह वर्ग वैसे भी अंधाधुंध वाहन नहीं चलाता। इसके विपरीत, संपन्न वर्ग को कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि पेट्रोल का बजट उसकी आय का बहुत मामूली प्रतिशत होता है। अधिकतर की कारें तो नियोक्ता के पैसे से चलती हैं। पेट्रोल पर खर्च की इस विषमता से बचने का कोई तरीका निकालना चाहिए। मेरी सम्मति में, इसका एक तरीका पेट्रोल की दोहरी मूल्य प्रणाली है। यानी पेट्रोल का ज्यादा उपभोग करने वालों से अधिक कीमत वसूल की जाए और इससे जो रकम उपलब्ध होती है, उसका प्रयोग पेट्रोल की कीमत गिराने में किया जाए।

यह कैसे किया जाए, इस पर जानकार लोगों को अपनी राय रखनी चाहिए। मेरे खयाल से, एक सहज उपाय यह है कि पेट्रोल की राशनिंग कर दी जाए। प्रत्येक वाहन के लिए पेट्रोल की एक निश्चित मात्रा तय कर दी जाए। जिस वाहन पर इस निश्चित सीमा से ज्यादा पेट्रोल खर्च किया जाता है, उसके स्वामी को उस निश्चित सीमा से अधिक पेट्रोल खरीदने पर ज्यादा कीमत वसूल की जाए। ऐसा करने में कोई अन्याय या भेदभाव नहीं है। जिस इफरात से कारों की संख्या बढ़ रही है और ज्यादा तेल पीने वाली गाड़ियाँ बाजार में उतर रही हैं, उसे देखते हुए पेट्रोल के उपभोग पर अंकुश लगाना आवश्यक हो गया है। दोहरी मूल्य प्रणाली का संदेश यह है : या तो पेट्रोल का उपभोग कम करो या उसके लिए ज्यादा कीमत चुकाओ। इस अतिरिक्त कीमत से पेट्रोल की दर में स्थिरता लाने की कोशिश की जाएगी या प्रदूषण कम करने का प्रयास किया जाएगा। दोहरी मूल्य प्रणाली के पक्ष में आर्थिक तर्क हो या न हो, सामाजिक तर्क जरूरी है। सामाजिक तर्क आर्थिक तर्क की तुलना में ज्यादा स्वीकार्य होना चाहिए।

इस प्रणाली का विस्तार रेल या वायु मार्ग से सफर करने वालों तक भी किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इन यात्राओं की सीमा बाँधी जा सकती है। जो लोग इस सीमा से अधिक यात्रा करेंगे, उनसे अतिरिक्त कीमत वसूल की जाएगी। इससे भी सरकार को कुछ आय हो सकती है। साइकिलों के प्रयोग को प्रोत्साहन देने के लिए यह किया जा सकता है कि प्रत्येक साइकिल में ऐसा मीटर लगाया जाए जिससे पता चले कि उसने महीने भर में कितनी दूरी तय की है। जो साइकिल एक निश्चित दूरी से ज्यादा चलेगी, उसे सरकार की ओर से कुछ प्रोत्साहन राशि दी जा सकती है। साइकिल दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सवारी है। उसे चलाने में कोई खर्च नहीं आता, न ही प्रदूषण फैलता है। पश्चिमी देशों में साइकिल का चलन बढ़ रहा है। आश्चर्य है कि हमारे देश में इसे गरीब की सवारी मान लिया गया है। दोहरी मूल्य प्रणाली बिजली के इस्तेमाल पर भी लागू की जा सकती है। प्रति व्यक्ति ज्यादा बिजली खर्च करते हो, तो ज्यादा कीमत चुकाओ।

ऊर्जा संकट के दिनों में इस तरह के नवाचार अपनाना बहुत आवश्यक है। अन्यथा यह संकट गहराता जाएगा – खासकर हमारे जैसे गरीब देशों में। 000

Sunday, October 24, 2010

भारत की राजनीति में परिवारवाद

राजनीति का घरेलूकरण

राजकिशोर

बातचीत का प्रसंग यह था : भारत में साठ वर्षों से लोकतंत्र है। फिर भी क्या बात है कि जिधर देखो, उधर ही नेता लोग राजनीति का घरेलूकरण कर रहे हैं। उनके बेटे-बेटियाँ राजनीति में इस तरह आ रहे हैं जैसे यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। मजे की बात है कि इनमें से ज्यादातर ने आधुनिक शिक्षा पाई है, वे सॉफ्टवेयर इंजीनियर या एमबीए हैं, लेकिन इन पेशों में वे नहीं उतरते। वे सीधे राजनीति में जाते हैं और अपने पिता का उत्तराधिकार संभालते हैं। पति जेल में है, तो उसकी जगह पर पत्नी चुनाव लड़ रही है। क्या इससे हमारी राजनीति दूषित नहीं हो रही है?

यह सुनते ही वे तैश में आ गईं। उन्होंने कहा, आप लोग पागलों की तरह बात कर रहे हैं। जब शिक्षक का बेटा शिक्षक हो सकता है, डॉक्टर का बेटा डॉक्टरी कर सकता है, आईएएस का बेटी आइएस बन सकती है, तो राजनीति में ही क्या खास बात है? बाप नेता है, तो बेटे की शिक्षा-दीक्षा राजनीतिक वातावरण में होती है। वह जन्म से ही राजनीति का कखग समझने लगता है। फिर अगर वह प्रोफेशन के तौर पर राजनीति को अपनाता है, तो इसमें हर्ज क्या है? उसका जन्म पॉलिटिशियन के परिवार में हुआ है, क्या इसलिए पॉलिटिक्स में जाने का उसका हक मारा गया? यह तो सीधे-सीधे भेदभाव है। लोकतंत्र में किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। नहीं तो हमारा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।

उन्हें मैंने ध्यान से देखा। वे मध्य वयस की आकर्षक और आधुनिक महिला थीं। जरूर कॉन्वेंट में पढ़ी होंगी। मन हुआ, पूछूं कि आप किसी राजनीतिक परिवार से तो नहीं हैं। दोस्तों की बैठक थी। इसलिए किसी पर कटाक्ष करना उचित नहीं था।

फिर भी मुझसे रहा न गया। मैंने कहा, डॉक्टर का बेटा यूं ही डॉक्टर नहीं बन जाता। वह पांच साल तक जम कर पढ़ाई करता है। कई-कई इम्तहान पास करता है। तब जा कर उसे रोगी की नब्ज पकड़ने का अधिकार मिलता है। यही बात वकालत, इंजिनियरिंग तथा अन्य पेशों पर भी लागू होती है। इसलिए उनकी तुलना राजनीति से नहीं हो सकती। राजनीति में उतरने के लिए कोई क्वालिफिकोशन तय नहीं की गई है। इसलिए लोगों ने उसे घरेलू बिजनेस बना रखा है। बाप चाहता है कि राजनीति करते हुए उसने जो कुछ भी हासिल किया है, वह सिर्फ उसके बेटे-बेटी को मिले। यह परिवारवाद देश के लिए बहुत खतरनाक है। इससे योग्यता की पूछ घटती है और अयोग्य लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। यह लोकतंत्र नहीं है। उसमें भितरघात है।

मेरे बगल में एक प्रोफेसर बैठे हुए थे। उन्होंने बातचीत में दखल दी, क्या आप कहना चाहते हैं कि राहुल गांधी में योग्यता नहीं है? मनमोहन सिंह तथा दूसरे अनेक नेता राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं, तो क्या यह उनकी बेवकूफी है? आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि देश की जनता भी राहुल गांधी के बारे में यही सोचती है। वे जहां भी जाते हैं, लोग उनकी आरती उतारते हैं।

मुझे जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ी। जिस घर में हम बैठे हुए थे, उसकी मालकिन ने मुसकराते हुए कहा, शुक्ला जी, मेरा ही नहीं, सभी का खयाल यह है कि राहुल गांधी की यह आवभगत इसीलिए होती है कि वे राजीव गांधी के बेटे हैं। अगर उनकी जगह हमारे बगल के वर्मा जी का बेटा होता, तो उसे कोई नहीं पूछता। उसे अपनी पार्टी का जिला सचिव होने में कई साल लगते, जबकि राहुल गांधी को राजनीति में प्रवेश करते ही कांग्रेस पार्टी का महासचिव बना दिया गया। अपनी योग्यता साबित किए बगैर ही उन्हें एमपी का टिकट दे दिया गया और पहली बार में ही वे जीत भी गए। क्या यह सामंतवाद नहीं है ?’

अब फिर उस महिला की बारी थी जो राजनीति में परिवारवाद का समर्थन कर रही थीं। उन्होंने तीखी आवाज में कहा, राजनीति सभी लोग नहीं कर सकते। यह एक विशिष्ट पेशा है। राहुल का परिवार लगातार राजनीति में रहा है। इसलिए वे दूसरों से बेहतर नेता हो सकते हैं।

यह सुनते ही बैठक में हंसी की लहर दौड़ गई। कई आवाजें एक-दूसरे से टकराईं – पेशा ! हा हा ! फिर तो डकैती भी पेशा है। हा हा ! चोरी भी पेशा है।! शायद इलाहाबाद के एक जज ने कहा था कि आजकल खादी अपराधियों की वर्दी बन गई है।

इस मजाक में सभी शामिल थे। कोने में एक सज्जन खादी का कुरता-पाजामा पहने हुए थे। कलाई पर मंहगी-सी घड़ी थी। उंगलियों में तरह-तरह की अंगूठियां भी। वे भी ठहाका लगाने लगे। बैठक में राजनीति के वर्तमान चरित्र के बारे में सर्वसम्मति दिखाई पड़ी।

मुझे लगा कि मेरा तर्क भारी पड़ रहा है। तभी दूसरे कोने में बैठे एक शरीफ-से सज्जन ने शौक फरमाया, राजनीति से लोग चाहे जितना दुखी हों, पर फैक्ट यह है कि आज के नौजवान राजनीति में आना ही नहीं चाहते। वे अमेरिका-यूरोप जाना चाहते हैं, अपने करियर पर ध्यान देना चाहते हैं, अपने-अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं। ऐसी हालत में अगर राजनीतिक परिवारों की नई पीढ़ी राजनीति में आ रही है, तो इसमें बुराई क्या है? आखिर देश को अफसरों के भरोसे तो छोड़ा नहीं जा सकता। पॉलिटिशियन्स के बिना लोकतंत्र नहीं चल सकता।

मैंने कनखी से देखा, उस आकर्षक और आधुनिक महिला के चेहरे की चमक कुछ बढ़ गई थी। वे हलके-हलके मुसकरा रही थीं।

मैंने हस्तक्षेप करने का फैसला किया, नौजवान राजनीति में इसलिए नहीं आना चाहते क्योंकि यह बरदाश्त की सीमा से ज्यादा गंदी हो चुकी है। इस कीचड़ में कौन भला आदमी पैर रखना चाहेगा ? आज का पढ़ा-लिखा नौजवान डीसेंट माहौल में काम करना चाहता है। राजनीति में इसके लिए कोई गुंजायश नहीं रह गई है। यह चापलूसों का बाड़ा बन गया है। यहां कोई स्वाभिमानी आदमी टिक ही नहीं सकता।

मैंने पानी का गिलास हाथ में ले कर कुछ घूंट लिए और आगे कहा, नंबर एक। नंबर दो, किसी भी दल का बॉस नहीं चाहता कि राजनीति में पढ़े-लिखे, समझदार लोग आएं और सचमुच जन सेवा करें। अगर बड़ी संख्या में बेहतर मिजाज के लोग आते हैं, तो पार्टी का कैरेक्टर ही बदल जाएगा। गंदे लोगों के हाथ से पतवार छूट जाएगी। यह किसको गवारा होगा? इसीलिए शरीफ लोग राजनीति से दस हाथ दूर ही रहते हैं।

मेरे पास की एक अपेक्षाकृत युवा महिला बहस में कूद पड़ीं। उन्होंने कहा, आखिर कोई तो बात है कि हम खेलकूद के क्षेत्र में कीर्तिमान बनाते हैं, हमारे उद्योगपति विदेशों में जा कर अपना झंडा गाड़ रहे हैं, हमारे वैज्ञानिक और डॉक्टर अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा कमा रहे हैं, पर भारत के राजनीतिज्ञों के बारे में सोचते ही हम अपनी ही निगाह में गिर जाते हैं। दूसरे क्षेत्रों में देश आगे बढ़ रहा है, पर राजनीति के क्षेत्र में पीछे भाग रहा है।

गृह स्वामी अभी तक चुप थे। शायद शिष्टाचार की मांग थी कि वे दूसरों को बोलने का ज्यादा अवसर दें। लेकिन आखिर उन्हें बोलना ही पड़ गया, दोस्तो, इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला है। सभी राजनीतिक दल गिरोह बन चुके हैं। इसलिए इन तालाबों का पानी सड़ता जा रहा है। जो ताजा खून आता है, वह पुराने खून से भी ज्यादा संक्रामक होता है। इसीलिए राजनीतिक दलों में नीति और कार्यक्रम पर कोई बहस नहीं होती। विचारवान लोगों का तो प्रवेश ही निषिद्ध है। जो समझने-बूझने वाले लोग हैं, वे अपनी इज्जत बचाने की खातिर चुप्पी साधे रहते हैं। बेटे-बेटियों के आगे विद्वान मेढ़क नजर आते हैं। इस राजनीति में साधारण लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। जब लूट-खसोट ही राजनीति का पर्याय हो चुकी हो, तो जनता के हितों के बारे में कोई क्यों सोचे? मेरा तो खयाल है, इस समय हमारे नेता लोग ही देश के विकास में सबसे ज्यादा बाधक हैं। नेताओं के कारण नहीं, बल्कि नेताओं के बावजूद देश आगे बढ़ रहा है।

जन सभा की तरह जोरदार तालियां बजीं। इनमें एक ताली मेरी भी थी। तभी उस आकर्षक और आधुनिक महिला ने लगभग चीखते हुए कहा, अगर हमारे पॉलिटियिशन्स इतने ही बुरे हैं, अगर वे सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में सोचते हैं, तो जनता उन्हें वोट क्यों देती है? जाहिर है, वोट पाए बिना कोई भी नेता ज्यादा दिनों तक अपना कारबार नहीं चला सकता। उसकी फर्म डूब जाएगी।

इसका उत्तर आया मेरे पास की उस अपेक्षाकृत युवा महिला की ओर से, मैडम, जनता इन ललमुंहों को वोट देने के लिए मजबूर है, क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। जब भी कोई साफ-सुधरा विकल्प सामने आता है, जनता उसकी ओर ऐसे लपकती है जैसे बच्चा मां की ओर। पर उसकी भूख नहीं मिटती। नया विकल्प जल्द ही बासी पड़ जाता है। दरअसल, सच्चा और टिकाऊ विकल्प तब तक नहीं पैदा हो सकता जब तक राजनीति रेडिकल सुधार नहीं आता।

बीच की बड़ी मेज पर पकौड़ियों, नमकीन और काजू के साथ-साथ कांच के पतले खूबसूरत गिलास लग चुके थे। फिर बोतलें भी आ लगीं।

तभी गृहस्वामी का आठ साल का बच्चा दौड़ते हुए आया और सभी की ओर देखते हुए बोला, हल्ला-गुल्ला बंद करो। अपना ग्लास खाली करो।

हम मध्य वर्ग के अनुशासन-प्रिय लोग थे। हमने हल्ला-गुल्ला बंद कर दिया और चियर्स कहते हुए अपना-अपना गिलास उठा लिया। 000