Friday, January 28, 2011

विनायक सेन के समर्थन में

राजद्रोह बनाम देशद्रोह

राजकिशोर

बिनायक सेन को राजद्रोह के लिए उम्रकैद की सजा दी गई है। इसके औचित्य पर काफी बहस हुई है और आगे भी होती रहेगी। इस बहस में जो बात उभर कर आ रही है, वह यह है कि देशद्रोह और राजद्रोह एक नहीं हैं। रायपुर की जिस अदालत ने सेन को उम्रकैद की सजा सुनाई है, उसने भी छत्तीसगढ़ राज्य के इस आरोप को निरस्त कर दिया है कि बिनायक सेन ने भारतीय राज्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ा है या इसमें मदद की है। इससे यह साबित होता है कि बिनायक सेन और चाहे जो हों, पर वे देशद्रोही नहीं हैं। लेकिन अदालत ने यह माना है कि वे राजद्रोह के अपराधी हैं।

राजद्रोह क्या है? हमारे कानून में इसकी परिभाषा यह है कि वह व्यक्ति राजद्रोह का अपराधी है जो देश में विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध असंतोष या अस्नेह की भावना फैला रहा हो। बिनायक सेन सरकार के विरुद्ध असंतोष या आक्रोश फैला रहे थे, इसलिए वे राजद्रोही हैं। इस निष्कर्ष को पचा पाना मुश्किल है। सच तो यह है कि जब भारत में आजाद और संप्रभु सरकार की स्थापना हुई, तभी से सरकार के विरुद्ध असंतोष की भावना का इजहार किया जा रहा है। स्वयं महात्मा गांधी नई सरकार से असंतुष्ट थे। नई-नई बनी सरकार की आलोचना करना वे नहीं चाहते थे, जो उनके अपने ही शिष्यों द्वारा ही चलाई जा रही थी। फिर भी उन्होंने तरह-तरह से अपना असंतोष प्रगट किया। पाकिस्तान को उसका 55 लाख रुपया दिलवाने के लिए तो वे अनशन पर ही बैठ गए। कम्युनिस्ट तो इसे आजादी भी मानने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि नेहरू की सरकार पूँजीपतियों की सरकार है। जब तक भारत आर्थिक दृष्टि से आजाद नहीं होता, तब तक सिर्फ राजनीतिक आजादी का कोई मूल्य नहीं है। हिंदूवादी भी इस सरकार के कटु आलोचक थे, क्योंकि इससे हिन्दू राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त नहीं हो रहा था।

क्या ये सभी राजद्रोही थे?

बिहार आंदोलन के दिनों में जयप्रकाश नारायण पर यह आरोप लगाया जाता था कि वे सीआइए के एजेंट हैं और लोकतांत्रिक विधि से चुनी गई सरकारों को बरख्वास्त कराना चाहते हैं। बाद में इतिहास ने साबित किया कि जयप्रकाश ही सही थे, उनके आलोचक नहीं। आज जयप्रकाश को इंदिरा गांधी से बड़ा व्यक्तित्व माना जाता है। क्या जयप्रकाश राजद्रोही थे? सरकारी परिभाषा के अनुसार उन्हें राजद्रोही साबित करना बेहद आसान था। जयप्रकाश की इस सलाह से बहुत-से लोग चौंके भी थे कि अगर किसी राजकीय कर्मचारी को कोई ऐसा आदेश मिले जो संविधान या कानून के विरोध में है, तो कर्मचारी का कर्तव्य है कि वह उसका पालन न करे। यह स्थापना अतिवादी लग सकती है, पर इसमें दम है। कोई भी कर्मचारी सरकार का कर्मचारी नहीं होता, वह राज्य का कर्मचारी होता है। सरकार भी राज्य का ही एक अंग है। उसे कार्यपालिका कहा जाता है। राज्य के अन्य दो महत्वपूर्ण अंग हैं विधायिका और न्यायपालिका। विधायिका और न्यायपालिका के आदेश कार्यपालिका के आदेश से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। इसलिए जब कार्यपालिका का आदेश विधायका और न्यायपालिका के आदेश से मेल न खाता हो, तब राजकीय कर्मचारी अगर उसकी अवज्ञा करता है, तो वह सजा का नहीं, बधाई का पात्र है। अगर यह मान्यता स्वीकार कर ली जाती है, तो सभी सरकारें सचेत हो जाएँगी और वे जन विरोधी आदेश कम से कम देंगी। प्रश्न यह है, क्या इस प्रकार की अवज्ञा को राजद्रोह कहेंगे?

अगर सरकार के विरुद्ध अस्नेह फैलाना राजद्रोह की सीमा में आता है, तो समझ में नहीं आता कि विपक्ष और स्वतंत्र प्रेस की जरूरत क्या है। इनका तो काम ही सरकार के गलत कामों की आलोचना करना है। प्रेस से अगर यह आजादी छीन ली गई, तो उसका व्यक्तित्व क्या रह जाएगा? जहाँ तक विपक्ष का सवाल है, उसके नेता समय-समय पर राष्ट्रपति के पास जाते रहते हैं और सरकार को बरख्वास्त करने की माँग करते रहते हैं। क्या यह राजद्रोह है? विपक्ष विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाता है। इस प्रस्ताव में कहा जाता है कि सरकार ने संसद का विश्वास खो दिया है, इसलिए उसे इस्तीफा दे देना चाहिए। क्या इसे भी राजद्रोह कहा जाएगा?

हमें यह समझने में पता नहीं कितना समय लगेगा कि सरकार और राज्य एक नहीं हैं और सरकार तथा देश एक नहीं हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं, राज्य बना रहता है। देश की सत्ता राज्य से भी बढ़ कर है। राज्य संविधान, कानून और फौज से चलता है, जबकि देश एक भावना है, जिसके मूल में राष्ट्रीयता का भाव होता है। माओवादी भी यह नहीं कहते कि हम एक देश के रूप में भारत का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। वे यह भी नहीं कहते कि हम सत्ता में आएँगे, तो भारतीय राज्य को विघटित कर देंगे। माओवादी सरकार की सत्ता को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। विपक्ष के सभी दल ऐसा ही चाहते हैं। माओवादी इस आधार पर इनसे अलग हैं कि वे हिंसा के द्वारा देश की राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं। यह जरूर आपत्तिजनक है, क्योंकि हिंसा के बल पर राज्य की सत्ता पर कब्जा करने की नीति से न राज्य रह जाएगा न देश। उच्छृखलता और हिंसावाद किसी भी देश के अस्तित्व के लिए सतत खतरा हैं।

कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि राजद्रोह देशभक्ति के लिए आवश्यक हो जाए। महात्मा गांधी महान देशभक्त थे। पर उन्हें राजद्रोह के अपराध में सजा दी गई थी। बाल गंगाधर तिलक को भी राजद्रोह के मुकदमे का सामना करना पड़ा था। क्या स्वतंत्र भारत में लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी नहीं हो सकते? बल्कि आज तो उनकी ज्यादा जरूरत है। जो अन्यायी और शोषणकारी व्यवस्था का विरोध करता है, उसे देशभक्त माना जाना चाहिए। उसे राजद्रोही वही कहेगा जो देश को सरकार का पर्याय मानता है। 000

तारीख

पेट्रोल की कीमतें

दोहरी मूल्य प्रणाली के समर्थन में

राजकिशोर

पिछले साल भर में पेट्रोल तथा डीजल की कीमतों में जिस तेजी से वृद्धि की गई है, वह आश्चर्यजनक है। पहले की बात और थी। जब विश्व बाजार में क्रूड तेल की कीमतें बढ़ती थीं, तो इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ता था। झटके का कुछ हिस्सा सरकार सँभाल लेती थी। यूपीए सरकार ने तय किया कि हम पेट्रोल उत्पादों पर सब्सिडी जारी नहीं रखेंगे। पेट्रोल उत्पादों की कीमतें बाजार द्वारा निर्धारित होंगी। इसी का नतीजा है कि सभी तेल कंपनियाँ अपने उत्पादों की कीमतें लगातार बढ़ाती रही हैं। जब कोई दल पेट्रोल की कीमत वृद्धि का विरोध करता है, तो सरकार का जवाब होता है – इस मामले में हम कुछ नहीं कर सकते। जब विश्व बाजार में कीमत बढ़ जाती है, तो हमें भी कीमत बढ़ानी पड़ती है।

सरकार के इस तर्क से युद्ध नहीं किया जा सकता। वाकई कोई भी चीज अपनी कीमत पर ही बिकनी चाहिए। आम तौर पर सब्सिडी देना कोई अच्छी बात नहीं है। यह एक तरह से खैरात देना है, जिसे किसी को स्वीकार भी नहीं करना चाहिए। मुश्किल यह है कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जिसमें आर्थिक स्तर पर भयावह विषमता है। ऐसे समाज में एक ही कीमत किसी को जरा भी बोझ नहीं लगती, तो दूसरे का जेब खाली कर देती है। जब आय में भयावह विषमता है, तो खर्च में भी भयावह विषमता होना अनिवार्य है। इसलिए कोई भी कीमत वृद्धि समाज के सभी वर्गों को समान रूप से प्रभावित नहीं करती। दाल-चावल या सब्जियों की कीमत बढ़ती है, तो उच्च वर्ग में इनकी खपत कम नहीं हो जाती, लेकिन जिनके पास कम पैसा है, उन्हें इन वस्तुओं का उपभोग कम करना पड़ जाता है। जब शक्कर का दाम बढ़ा था, तब बहुत-से परिवारों ने फीकी चाय पीना शुरू कर दिया था। इसी तरह, अब जब कि सब्जियों की कीमतें आग उगल रही हैं, साधारण लोग जहाँ तक संभव है, सब्जी के उपभोग में कटौती कर रहे हैं।

पेट्रोल के साथ ऐसा नहीं है। जब पेट्रोल की कीमत बढ़ाई जाती है, तब उसका उपभोग कम नहीं हो जाता। कोई स्कूटर वाला बस से चलना शुरू नहीं कर देता, हालाँकि आजकल बसों या मेट्रो रेल की दरें कोई आरामदेह नहीं हैं। कुछ लोगों की कमाई का बीस से तीस प्रतिशत तक घर से कार्य स्थल तक जाने और वहाँ से लौटने में खर्च हो जाता है। तिस पर समय से पहुँचने की कोई गारंटी नहीं है। इसीलिए निजी वाहनों का चलन बढ़ता जा रहा है। महानगरों में तो फिर भी सार्वजनिक वाहनों की व्यवस्था है – वह चाहे जैसी हो, पर छोटे शहरों और कस्बों में सार्वजनिक वाहन खरगोश के सींग की तरह अदृश्य हैं। इसलिए वहाँ जिसके पास भी साधन हैं, वह स्कूटर, मोटरसाइकिल या सेकंड हैंड कार खरीद कर ही रहता है। इससे भी पेट्रोल की खपत तेजी से बढ़ रही है। अगर इन रिहायशों में उचित संख्या में बसें चला दी जाएँ या ट्राम गाड़ी की शुरुआत कर दी जाए, तो इस दुर्लभ ईंधन की काफी बचत हो सकती है।

तो किस्सा यह है कि पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर वाहन रखने वाले साधारण लोगों की जेब पर तुरंत असर होता है। ईंधन पर उनका खर्च बढ़ जाता है। इसमें कटौती भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह वर्ग वैसे भी अंधाधुंध वाहन नहीं चलाता। इसके विपरीत, संपन्न वर्ग को कोई दिक्कत नहीं होती, क्योंकि पेट्रोल का बजट उसकी आय का बहुत मामूली प्रतिशत होता है। अधिकतर की कारें तो नियोक्ता के पैसे से चलती हैं। पेट्रोल पर खर्च की इस विषमता से बचने का कोई तरीका निकालना चाहिए। मेरी सम्मति में, इसका एक तरीका पेट्रोल की दोहरी मूल्य प्रणाली है। यानी पेट्रोल का ज्यादा उपभोग करने वालों से अधिक कीमत वसूल की जाए और इससे जो रकम उपलब्ध होती है, उसका प्रयोग पेट्रोल की कीमत गिराने में किया जाए।

यह कैसे किया जाए, इस पर जानकार लोगों को अपनी राय रखनी चाहिए। मेरे खयाल से, एक सहज उपाय यह है कि पेट्रोल की राशनिंग कर दी जाए। प्रत्येक वाहन के लिए पेट्रोल की एक निश्चित मात्रा तय कर दी जाए। जिस वाहन पर इस निश्चित सीमा से ज्यादा पेट्रोल खर्च किया जाता है, उसके स्वामी को उस निश्चित सीमा से अधिक पेट्रोल खरीदने पर ज्यादा कीमत वसूल की जाए। ऐसा करने में कोई अन्याय या भेदभाव नहीं है। जिस इफरात से कारों की संख्या बढ़ रही है और ज्यादा तेल पीने वाली गाड़ियाँ बाजार में उतर रही हैं, उसे देखते हुए पेट्रोल के उपभोग पर अंकुश लगाना आवश्यक हो गया है। दोहरी मूल्य प्रणाली का संदेश यह है : या तो पेट्रोल का उपभोग कम करो या उसके लिए ज्यादा कीमत चुकाओ। इस अतिरिक्त कीमत से पेट्रोल की दर में स्थिरता लाने की कोशिश की जाएगी या प्रदूषण कम करने का प्रयास किया जाएगा। दोहरी मूल्य प्रणाली के पक्ष में आर्थिक तर्क हो या न हो, सामाजिक तर्क जरूरी है। सामाजिक तर्क आर्थिक तर्क की तुलना में ज्यादा स्वीकार्य होना चाहिए।

इस प्रणाली का विस्तार रेल या वायु मार्ग से सफर करने वालों तक भी किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इन यात्राओं की सीमा बाँधी जा सकती है। जो लोग इस सीमा से अधिक यात्रा करेंगे, उनसे अतिरिक्त कीमत वसूल की जाएगी। इससे भी सरकार को कुछ आय हो सकती है। साइकिलों के प्रयोग को प्रोत्साहन देने के लिए यह किया जा सकता है कि प्रत्येक साइकिल में ऐसा मीटर लगाया जाए जिससे पता चले कि उसने महीने भर में कितनी दूरी तय की है। जो साइकिल एक निश्चित दूरी से ज्यादा चलेगी, उसे सरकार की ओर से कुछ प्रोत्साहन राशि दी जा सकती है। साइकिल दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सवारी है। उसे चलाने में कोई खर्च नहीं आता, न ही प्रदूषण फैलता है। पश्चिमी देशों में साइकिल का चलन बढ़ रहा है। आश्चर्य है कि हमारे देश में इसे गरीब की सवारी मान लिया गया है। दोहरी मूल्य प्रणाली बिजली के इस्तेमाल पर भी लागू की जा सकती है। प्रति व्यक्ति ज्यादा बिजली खर्च करते हो, तो ज्यादा कीमत चुकाओ।

ऊर्जा संकट के दिनों में इस तरह के नवाचार अपनाना बहुत आवश्यक है। अन्यथा यह संकट गहराता जाएगा – खासकर हमारे जैसे गरीब देशों में। 000

Sunday, October 24, 2010

भारत की राजनीति में परिवारवाद

राजनीति का घरेलूकरण

राजकिशोर

बातचीत का प्रसंग यह था : भारत में साठ वर्षों से लोकतंत्र है। फिर भी क्या बात है कि जिधर देखो, उधर ही नेता लोग राजनीति का घरेलूकरण कर रहे हैं। उनके बेटे-बेटियाँ राजनीति में इस तरह आ रहे हैं जैसे यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो। मजे की बात है कि इनमें से ज्यादातर ने आधुनिक शिक्षा पाई है, वे सॉफ्टवेयर इंजीनियर या एमबीए हैं, लेकिन इन पेशों में वे नहीं उतरते। वे सीधे राजनीति में जाते हैं और अपने पिता का उत्तराधिकार संभालते हैं। पति जेल में है, तो उसकी जगह पर पत्नी चुनाव लड़ रही है। क्या इससे हमारी राजनीति दूषित नहीं हो रही है?

यह सुनते ही वे तैश में आ गईं। उन्होंने कहा, आप लोग पागलों की तरह बात कर रहे हैं। जब शिक्षक का बेटा शिक्षक हो सकता है, डॉक्टर का बेटा डॉक्टरी कर सकता है, आईएएस का बेटी आइएस बन सकती है, तो राजनीति में ही क्या खास बात है? बाप नेता है, तो बेटे की शिक्षा-दीक्षा राजनीतिक वातावरण में होती है। वह जन्म से ही राजनीति का कखग समझने लगता है। फिर अगर वह प्रोफेशन के तौर पर राजनीति को अपनाता है, तो इसमें हर्ज क्या है? उसका जन्म पॉलिटिशियन के परिवार में हुआ है, क्या इसलिए पॉलिटिक्स में जाने का उसका हक मारा गया? यह तो सीधे-सीधे भेदभाव है। लोकतंत्र में किसी भी वर्ग के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। नहीं तो हमारा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा।

उन्हें मैंने ध्यान से देखा। वे मध्य वयस की आकर्षक और आधुनिक महिला थीं। जरूर कॉन्वेंट में पढ़ी होंगी। मन हुआ, पूछूं कि आप किसी राजनीतिक परिवार से तो नहीं हैं। दोस्तों की बैठक थी। इसलिए किसी पर कटाक्ष करना उचित नहीं था।

फिर भी मुझसे रहा न गया। मैंने कहा, डॉक्टर का बेटा यूं ही डॉक्टर नहीं बन जाता। वह पांच साल तक जम कर पढ़ाई करता है। कई-कई इम्तहान पास करता है। तब जा कर उसे रोगी की नब्ज पकड़ने का अधिकार मिलता है। यही बात वकालत, इंजिनियरिंग तथा अन्य पेशों पर भी लागू होती है। इसलिए उनकी तुलना राजनीति से नहीं हो सकती। राजनीति में उतरने के लिए कोई क्वालिफिकोशन तय नहीं की गई है। इसलिए लोगों ने उसे घरेलू बिजनेस बना रखा है। बाप चाहता है कि राजनीति करते हुए उसने जो कुछ भी हासिल किया है, वह सिर्फ उसके बेटे-बेटी को मिले। यह परिवारवाद देश के लिए बहुत खतरनाक है। इससे योग्यता की पूछ घटती है और अयोग्य लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। यह लोकतंत्र नहीं है। उसमें भितरघात है।

मेरे बगल में एक प्रोफेसर बैठे हुए थे। उन्होंने बातचीत में दखल दी, क्या आप कहना चाहते हैं कि राहुल गांधी में योग्यता नहीं है? मनमोहन सिंह तथा दूसरे अनेक नेता राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं, तो क्या यह उनकी बेवकूफी है? आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि देश की जनता भी राहुल गांधी के बारे में यही सोचती है। वे जहां भी जाते हैं, लोग उनकी आरती उतारते हैं।

मुझे जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ी। जिस घर में हम बैठे हुए थे, उसकी मालकिन ने मुसकराते हुए कहा, शुक्ला जी, मेरा ही नहीं, सभी का खयाल यह है कि राहुल गांधी की यह आवभगत इसीलिए होती है कि वे राजीव गांधी के बेटे हैं। अगर उनकी जगह हमारे बगल के वर्मा जी का बेटा होता, तो उसे कोई नहीं पूछता। उसे अपनी पार्टी का जिला सचिव होने में कई साल लगते, जबकि राहुल गांधी को राजनीति में प्रवेश करते ही कांग्रेस पार्टी का महासचिव बना दिया गया। अपनी योग्यता साबित किए बगैर ही उन्हें एमपी का टिकट दे दिया गया और पहली बार में ही वे जीत भी गए। क्या यह सामंतवाद नहीं है ?’

अब फिर उस महिला की बारी थी जो राजनीति में परिवारवाद का समर्थन कर रही थीं। उन्होंने तीखी आवाज में कहा, राजनीति सभी लोग नहीं कर सकते। यह एक विशिष्ट पेशा है। राहुल का परिवार लगातार राजनीति में रहा है। इसलिए वे दूसरों से बेहतर नेता हो सकते हैं।

यह सुनते ही बैठक में हंसी की लहर दौड़ गई। कई आवाजें एक-दूसरे से टकराईं – पेशा ! हा हा ! फिर तो डकैती भी पेशा है। हा हा ! चोरी भी पेशा है।! शायद इलाहाबाद के एक जज ने कहा था कि आजकल खादी अपराधियों की वर्दी बन गई है।

इस मजाक में सभी शामिल थे। कोने में एक सज्जन खादी का कुरता-पाजामा पहने हुए थे। कलाई पर मंहगी-सी घड़ी थी। उंगलियों में तरह-तरह की अंगूठियां भी। वे भी ठहाका लगाने लगे। बैठक में राजनीति के वर्तमान चरित्र के बारे में सर्वसम्मति दिखाई पड़ी।

मुझे लगा कि मेरा तर्क भारी पड़ रहा है। तभी दूसरे कोने में बैठे एक शरीफ-से सज्जन ने शौक फरमाया, राजनीति से लोग चाहे जितना दुखी हों, पर फैक्ट यह है कि आज के नौजवान राजनीति में आना ही नहीं चाहते। वे अमेरिका-यूरोप जाना चाहते हैं, अपने करियर पर ध्यान देना चाहते हैं, अपने-अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं। ऐसी हालत में अगर राजनीतिक परिवारों की नई पीढ़ी राजनीति में आ रही है, तो इसमें बुराई क्या है? आखिर देश को अफसरों के भरोसे तो छोड़ा नहीं जा सकता। पॉलिटिशियन्स के बिना लोकतंत्र नहीं चल सकता।

मैंने कनखी से देखा, उस आकर्षक और आधुनिक महिला के चेहरे की चमक कुछ बढ़ गई थी। वे हलके-हलके मुसकरा रही थीं।

मैंने हस्तक्षेप करने का फैसला किया, नौजवान राजनीति में इसलिए नहीं आना चाहते क्योंकि यह बरदाश्त की सीमा से ज्यादा गंदी हो चुकी है। इस कीचड़ में कौन भला आदमी पैर रखना चाहेगा ? आज का पढ़ा-लिखा नौजवान डीसेंट माहौल में काम करना चाहता है। राजनीति में इसके लिए कोई गुंजायश नहीं रह गई है। यह चापलूसों का बाड़ा बन गया है। यहां कोई स्वाभिमानी आदमी टिक ही नहीं सकता।

मैंने पानी का गिलास हाथ में ले कर कुछ घूंट लिए और आगे कहा, नंबर एक। नंबर दो, किसी भी दल का बॉस नहीं चाहता कि राजनीति में पढ़े-लिखे, समझदार लोग आएं और सचमुच जन सेवा करें। अगर बड़ी संख्या में बेहतर मिजाज के लोग आते हैं, तो पार्टी का कैरेक्टर ही बदल जाएगा। गंदे लोगों के हाथ से पतवार छूट जाएगी। यह किसको गवारा होगा? इसीलिए शरीफ लोग राजनीति से दस हाथ दूर ही रहते हैं।

मेरे पास की एक अपेक्षाकृत युवा महिला बहस में कूद पड़ीं। उन्होंने कहा, आखिर कोई तो बात है कि हम खेलकूद के क्षेत्र में कीर्तिमान बनाते हैं, हमारे उद्योगपति विदेशों में जा कर अपना झंडा गाड़ रहे हैं, हमारे वैज्ञानिक और डॉक्टर अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा कमा रहे हैं, पर भारत के राजनीतिज्ञों के बारे में सोचते ही हम अपनी ही निगाह में गिर जाते हैं। दूसरे क्षेत्रों में देश आगे बढ़ रहा है, पर राजनीति के क्षेत्र में पीछे भाग रहा है।

गृह स्वामी अभी तक चुप थे। शायद शिष्टाचार की मांग थी कि वे दूसरों को बोलने का ज्यादा अवसर दें। लेकिन आखिर उन्हें बोलना ही पड़ गया, दोस्तो, इसका सबसे बड़ा कारण राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला है। सभी राजनीतिक दल गिरोह बन चुके हैं। इसलिए इन तालाबों का पानी सड़ता जा रहा है। जो ताजा खून आता है, वह पुराने खून से भी ज्यादा संक्रामक होता है। इसीलिए राजनीतिक दलों में नीति और कार्यक्रम पर कोई बहस नहीं होती। विचारवान लोगों का तो प्रवेश ही निषिद्ध है। जो समझने-बूझने वाले लोग हैं, वे अपनी इज्जत बचाने की खातिर चुप्पी साधे रहते हैं। बेटे-बेटियों के आगे विद्वान मेढ़क नजर आते हैं। इस राजनीति में साधारण लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। जब लूट-खसोट ही राजनीति का पर्याय हो चुकी हो, तो जनता के हितों के बारे में कोई क्यों सोचे? मेरा तो खयाल है, इस समय हमारे नेता लोग ही देश के विकास में सबसे ज्यादा बाधक हैं। नेताओं के कारण नहीं, बल्कि नेताओं के बावजूद देश आगे बढ़ रहा है।

जन सभा की तरह जोरदार तालियां बजीं। इनमें एक ताली मेरी भी थी। तभी उस आकर्षक और आधुनिक महिला ने लगभग चीखते हुए कहा, अगर हमारे पॉलिटियिशन्स इतने ही बुरे हैं, अगर वे सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में सोचते हैं, तो जनता उन्हें वोट क्यों देती है? जाहिर है, वोट पाए बिना कोई भी नेता ज्यादा दिनों तक अपना कारबार नहीं चला सकता। उसकी फर्म डूब जाएगी।

इसका उत्तर आया मेरे पास की उस अपेक्षाकृत युवा महिला की ओर से, मैडम, जनता इन ललमुंहों को वोट देने के लिए मजबूर है, क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। जब भी कोई साफ-सुधरा विकल्प सामने आता है, जनता उसकी ओर ऐसे लपकती है जैसे बच्चा मां की ओर। पर उसकी भूख नहीं मिटती। नया विकल्प जल्द ही बासी पड़ जाता है। दरअसल, सच्चा और टिकाऊ विकल्प तब तक नहीं पैदा हो सकता जब तक राजनीति रेडिकल सुधार नहीं आता।

बीच की बड़ी मेज पर पकौड़ियों, नमकीन और काजू के साथ-साथ कांच के पतले खूबसूरत गिलास लग चुके थे। फिर बोतलें भी आ लगीं।

तभी गृहस्वामी का आठ साल का बच्चा दौड़ते हुए आया और सभी की ओर देखते हुए बोला, हल्ला-गुल्ला बंद करो। अपना ग्लास खाली करो।

हम मध्य वर्ग के अनुशासन-प्रिय लोग थे। हमने हल्ला-गुल्ला बंद कर दिया और चियर्स कहते हुए अपना-अपना गिलास उठा लिया। 000

Sunday, October 17, 2010

आधी शुद्ध आधा बेशुद्ध

राजकिशोर

एक लड़का था। मध्य वर्ग में भी जो मध्य वर्ग होता है, उसी वर्ग का। जब वह बड़ा होने लगा, तो अंग्रेजी माध्यम के एक नजदीकी स्कूल में उसका दाखिला करा दिया गया। स्कूल में फीस तगड़ी ली जाती थी, पर वह सांस्कृतिक मुफलिसी का शिकार था। वहां न अंग्रेजी अच्छी पढ़ाई जाती थी न हिन्दी। लड़के में प्रतिभा थी। एक शाम, जब नीम के पत्ते गिरने लगे और मन की उदासी बढ़ने लगी, उसकी कवि-प्रतिभा फूट पड़ी। उसने एक छोटी-सी कविता लिखी -

कितने अच्छे हैं मेरे पेरेंट्स

उन्होंने दिया मुझे बर्थ

मुसकाया स्काइ नाच उठी अर्थ

नाउ आइ एम टेन एंड वन

अपने पेरेंट्स का प्राउड सन

वे हैं मेरे बेस्ट फ्रेंड्स

जानते हैं लेटेस्ट ट्रेंड्स

उनकी कृपा से एव्रीथिंग आइ गॉट

जब मैं पूरा ग्रो कर जाऊंगा

आइ विल अर्न ए लॉट

अपनी कविता को कॉपी पर सजावटी अक्षरों में उतार कर वह सातवें आसमान की ओर उड़ चला। रात भर आधा सोता आधा जागता रहा। अगले दिन उसने अपनी अंग्रेजी शिक्षिका को अपनी कविता दिखाई। वह हंसने लगी। फिर संजीदा हो कर बोली, - बेटे, तुम्हें पूरी पोएम इंग्लिश में ही राइट करनी चाहिए थी। शिक्षिका ने पहली पंक्ति को इस तरह सुधारा - हाउ ग्रेट आर माइ पेरेंट्स और लड़के से कहा, बाकी तुम देख लेना। वहां से निराश हो कर लड़का हिन्दी शिक्षक के पास गया। वह भी हंसने लगा। बोला, अटेम्प्ट तो अच्छा है, पर तुम्हें पूरी कविता को हिन्दी में ही कंपोज करना चाहिए था।। हिन्दी शिक्षक ने पहली पंक्ति को इस तरह सुधारा - कितने भले हैं मेरे माता-पिता ।

वहां से भी दुखी हो कर लड़का टिफिन की घंटी के बाद ही, पेट दर्द का बहाना कर, घर लौट आया। अब वह अपनी कविता को कभी पूरी अंग्रेजी में तो कभी पूरी हिन्दी में लिखने की कोशिश करने लगा। लेकिन सब बेकार। अंत में उसने पाया कि न उसकी अंग्रेजी इतनी अच्छी है कि वह अपनी कविता को पूरी तरह अंग्रेजी में लिख सके, न उसकी हिन्दी इतनी अच्छी है कि वह उसे पूरी तरह हिन्दी में लिख सके। थक कर वह उस रात बिना खाए ही सो गया। अगले कई महीनों तक उसने कोई कविता नहीं लिखी।

जिस हिंग्लिश को बातचीत की भाषा के स्तर पर स्वीकार करने की तर्क-सम्मत-सी दिखती हुई वकालत सुरेश कुमार ने (जनसत्ता, 10 अक्टूबर 2010) की है, उसका एक नतीजा यही होने वाला है। यह सिर्फ मेरी कल्पना नहीं है, सुरेश जी भी संजीदा हो कर भविष्य की कल्पना करेंगे, तो उनके हाथ भी यही लगेगा। मैं जानता हूं कि वे भाषा के मामले में सक्षम और सुरुचि-संपन्न व्यक्ति हैं, तभी इतनी प्रांजल भाषा में उन्होंने यह टिप्पणी लिखी है। वे हिंग्लिश के बढ़ते हुए असर से खुद भी चिंतित हैं। वे बहुत साफ-साफ कहते हैं, 'हां, यह ठीक है कि हिंग्लिश की यह वकालत आधा सच है। बाकी आधा सच नकारात्मक ही है। शिक्षा विशारदों के अनुसार यह सामान्यतया "हिन्दी पर अधिकार, न अंग्रेजी पर अधिकार" की स्थिति है। इसे शिक्षा-व्यवस्था का अंग नहीं बनाया जा सकता - ऐसी हिन्दी सीखने-सिखाने का आदर्श नहीं बन सकती।' फिर भी, उनकी मान्यता यह है कि 'जिस प्रकार समाज में प्रचलित व्यवहारों में कुछ ही अनुकरणीय होते हैं, शेष अन्य को हम बर्दाश्त करते हैं, इस प्रकार हिंग्लिंश को भी हम बर्दाश्त करेंगे, करना पड़ेगा, पर उसके अनुकरण को भाषा सौष्ठव की दृष्टि से सब प्रयोजनों के लिए संस्थागत आधार पर प्रोत्साहित न करना ही उचित होगा।'

जाहिर है, सुरेश कुमार के इरादे में कोई खोट नहीं है। वे हिन्दी के शुभचिंतक हैं। वे उन लोगों के भी शुभचिंतक हैं जो परिस्थितिवश हिंग्लिश का प्रयोग कर रहे हैं। इस दुहरी प्रतिबद्धता की वजह से ही वे एक क्षेत्र हिन्दी को देते हैं जहां कोई भी समझौता उन्हें मंजूर नहीं है और एक क्षेत्र हिंग्लिश को, जहां कोई भी समझौता मान्य है। अगर सुरेश कुमार इस उदाहरण का आनंद ले सकें, तो मैं कहना चाहूंगा कि यह बंटवारा कुछ-कुछ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले की तरह है जिसे मान लेने पर विवादग्रस्त भूमि पर न मंदिर बन सकेगा न मस्जिद खड़ी की जा सकेगी। कई बार समाज न्यायालय से अधिक बुद्धिमान होता है। हिन्दी के इसी समाज का आग्रह है कि अगर बीस करोड़ लोगों की इस भाषा ने इस रपटीली राह पर चलना स्वीकार कर लिया, तो अंततः वह खत्म हो जाएगी, उसकी गिनती क्रियोल भाषाओं में होने लगेगी, जिसका मतलब यह है कि वह न इधर की रहेगी न उधर की, और शायर कहेंगे, सुनते हैं कि हिन्दी भी थी अच्छी-सी इक जुबान

मुद्दा साधु भाषा और जन भाषा का नहीं है। दोनों में हमेशा अंतर रहा है। मुद्दा सिद्धांत और व्यवहार का भी नहीं है। दोनों में फर्क जितना ज्यादा हो, जीवन उतना ही प्रदूषित होता है। मुद्दा यह है : क्या यह संभव है कि शिक्षित समाज में कुछ लोग हिन्दी लिखते और बोलते रहें तथा कुछ लोग हिंग्लिश का प्रयोग करते रहें ? द्वंद्व का यह दौर पढ़े-लिखों और कम या गैर-पढ़े-लिखों के बीच नहीं, बल्कि पढ़े-लिखों और पढ़े-लिखों के बीच है। यही, एक ही, वर्ग हिंग्लिश का जनक है। इस वर्ग की झूठी तारीफ में 'द्विभाषी संस्कृति' नामक एक विचित्र चीज की कल्पना की गई है। मैं नहीं जानता कि यह चिड़िया देश के किस भाग में पाई जाती है। अशोक वाजपेयी और कृष्ण कुमार जैसे विशिष्ट अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो जो लोग मुख्यतः अंग्रेजी में काम करते हैं, उनकी हिन्दी हांफती रहती है और जो मुख्यतः हिन्दी में काम करते हैं, उनकी अंग्रेजी को हिचकी आती रहती है। क्या हम उस दौर की असहाय प्रतीक्षा करते रहें जब हिन्दी 'द्विभाषी संस्कृति' की नकली आभा से चमकने लगेगी और अंत में खोटा सिक्का असली सिक्के को बाजार से बाहर कर देगा?

सुरेश कुमार व्यावहारिक समस्याओं का हल निकालने के लिए यह व्यावहारिक सुझाव देते हैं, 'अगर हम पाठ्य पुस्तकों की हिन्दी में विशिष्ट तकनीकी शब्दावली अंग्रेजी में (रोमन लिपि का प्रयोग करते हुए) रखें और सामान्य शब्दावली (बहुप्रचलित तकनीकी शब्दों के साथ) और वाक्य रचना हिन्दी में ही रहे तो क्या हमारे प्रशिक्षुओं का ज्ञान, व्यवहार की दृष्टि से अधिक कार्यसाधक न होगा? ... बोलें 'ग्लोबल वार्मिंग' और पढ़े-लिखें 'वैश्विक तापमान वृद्धि' तो क्या उनकी उलझन और बोझ नहीं बढ़ेंगे?' बढ़ेंगे, जरूर बढ़ेंगे। लेकिन यह बढ़ना वैसा ही होगा जैसे पहले तो किसी की टांग तोड़ दी जाए और जब डॉक्टर उसके लिए बैसाखी बनाने लगे, तो शिकायत की जाए कि इससे उस आदमी की उलझन और बोझ नहीं बढ़ेंगे? बेशक टूटे हुए पैरों को बैसाखी अच्छी लगती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बैसाखी का प्रचलन बढ़ाने के लिए लोगों की टांगें तोड़ना शुरू कर दिया जाए। फिर तो बाजार में बैसाखी ही बैसाखी दिखने लगेगी। अंत में बैसाखी उद्योग के हित में यह राष्ट्रीय नीति बनाई जाएगी कि जन्म लेते ही बच्चों के दोनों पैर काट दिए जाएं।

जाहिर है, सुरेश कुमार जैसे सुधी लोग इस दृश्य की कल्पना कर कांप उठेंगे। लेकिन हिंग्लिश को थोड़ी भी मान्यता मिल गई, तो वह बीस-तीस साल में ही हिन्दी को चट कर जाएगी। भाषा पहले बोली जाती है, फिर लिखी जाती है। लिखे जाने पर उसके मानक रूप स्थिर होते हैं। इसी मानक रूप से भाषा का विकास होता है। उसमें साहित्य और दर्शन की सृष्टि होती है। जब बोली जाने वाली भाषा आक्रामक रूप से अशुद्ध होने लगती है, तब समाज में शुद्ध भाषा की रक्षा वैसे ही की जाती है जैसे संस्कृत भाषा की रक्षा की गई है - उसके हाथ-पांव बांध कर। इसी प्रक्रिया में संस्कृत जानने वालों की संख्या कम होती गई और अब वह पोथियों में ही मिलती है। हिंग्लिशीकरण के बाद भी हिन्दी रहेगी, क्यों नहीं रहेगी, पर कुछ किताबों तक महदूद हो कर।

अंग्रेजी राज में हिंग्लिश की शुरुआत नहीं हुई, जब इसकी गुंजायश बहुत ज्यादा थी। यह शुरुआत आजादी के कई दशकों के बाद हुई, क्योंकि भारत का शासक वर्ग हिन्दी सीखने और उसका प्रयोग करने के लिए राजी नहीं था। यही दुर्दशा अन्य भारतीय भाषाओं की भी हुई। वे साधन-संपन्न लोगों द्वारा मजा लेने के लिए नौकरानियों से पैदा हुई संतानें हो गईं। अगर शुरू से ही भाषा नीति और शिक्षा नीति को आमूलचूल बदल कर उनका भारतीयकरण करने का व्यवस्थित प्रयास किया गया होता, तो आज हिन्दी के शिक्षित समाज में 'ग्लोबल वार्मिंग' जैसे शब्द नहीं सुने जाते। आखिर कोई तो बात होगी कि भारत के दस बड़े फिल्मी सितारों, दस बड़े खिलाड़ियों, दस बड़े उद्योगपतियों और दस बड़े मीडिया व्यक्तित्वों में आधे भी ऐसे नहीं हैं जो अपनी मातृभाषा में दस शुद्ध वाक्य बोल या लिख सकें। यही वे डॉक्टर बंधु हैं जो पहले आदमी की टांग तोड़ते हैं और फिर कहते हैं, बैसाखी का इस्तेमाल करने में बुराई क्या है; देखो, हम भी तो बैसाखी पर ही चल रहे हैं। 000