Saturday, October 25, 2008

गरीब ईसाइयों के एक नेता की प्रतिक्रिया पर


धर्म और पैसा
राजकिशोर


मेरे एक लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पुवर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट के अध्यक्ष एल आर फ्रांसिस ने ईसाई चर्चों की अनेक विसंगतियों की ओर संकेत किया है। जैसे चर्च के अंदर शोषण, अत्याचार और दमन। यहां मैं धर्म और पैसे से जुड़े हुए मामलों तक सीमित रहना चाहता हूं।

फ्रांसिस के अनुसार, इस वर्ग में तीन तरह के सवाल आते हैं -- विदेशी पैसा, चर्च की संपत्ति और चर्च अधिकारियों द्वारा अपने कर्मचारियों का आर्थिक शोषण। ये तीनों ही मामले गौरतलब हैं। इनके बीच आपसी रिश्ता भी है।

फ्रांसिस के अनुसार, 'हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की एक रेलवे कॉलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दू संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुरंत अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया गया। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार -- नोएल पारे। चर्च की 86वीं वर्षगांठ मनाई जानेवाली थी। बड़े समारोह की तैयारियां थीं। किन्तु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का, जिनसे वह पेट भरने के लिए जरूरी नून-तेल उधार लेता था।

'चर्च प्रशासन उसे मात्र 1,000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को ले कर और चर्च प्रशासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच। देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाए जाने वाले अधिकतर संगठनों में भी ऐसा ही हाल है। सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते हैं। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए अर्थात 33 रुपए प्रतिरोज पाता है। ऐसी स्थिति में क्रिया की प्रतिक्रिया अर्थात शोषण का परिणाम आक्रोश होगा ही। आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है -- हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़, मारपीट, आगजनी कुछ भी।'

आंतरिक शोषण का यह मामला ईसाई धर्म की खूबी नहीं है। मेरा अनुमान है कि सभी धार्मिक संगठनों में इस तरह का आर्थिक शोषण होता है। असल में, यह समुचित नौकरी नहीं होती, जिसमें डीए, पीएफ, ग्रेट्युटी आदि का प्रावधान हो। यह चाकरी श्रद्धा की है। श्रद्धा ज्ञान और भक्ति देती है, तो गरीब को भौतिक स्तर पर गुलाम भी बनाती है। इस तरह की गुलामी राजनीतिक संगठनों के तंत्र में भी दिखाई देती है। शायद ही कोई राजनीतिक दल अपने कर्मचारियों को नियम-संगत और जायज पैसे देता हो। इससे यह भी पता चलता है कि जो धर्म या राजनीति ऐसा करते हैं, वे वास्तव में कितने नैतिक हैं। नैतिकता का मूल आधार छोड़ देने के बाद कैसा धर्म और कैसी राजनीति।

फ्रांसिस का दूसरा मुद्दा है चर्च की संपत्ति का। वे लिखते हैं, 'मलयाली मूल और मंगलूर-कर्नाटक-गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की ओर लौटे तो भारत की ईसाई चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों - बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रूप में ही चर्च के सदस्य हैं।' कहने की जरूरत नहीं कि संपत्ति अकसर विषमता पैदा करती है। इसीलिए सभी धर्मों में संपत्ति को हिकारत की निगाह से देखा गया है। जाहिर है, आप या तो कुबेर के दास बन सकते हैं या भगवान के भक्त। दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते। लेकिन सभी धर्म संस्थान ऐश्वर्य की खोज में रहते हैं। वे अपने मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों को आलीशान से आलीशान रूप देना चाहते हैं। इससे इन संगठनों में चरित्र वालों को नहीं, पैसे वालों को महत्व मिलता जाता है। जैसे-जैसे पैसे की आपूर्ति बढ़ती है, धार्मिक संगठन के भीतर तानाशाही का तत्व मजबूत होता है और धर्म धुआं बन कर उड़ने लगता है। इसलिए इस पर विचार होना चाहिए कि धार्मिक संगठनों के पास संपत्ति होनी चाहिए या नहीं और होनी चाहिए तो कितनी तथा उसके प्रबंधन का तरीका क्या हो। इतिहास बताता है कि अकूत संपत्ति पर कब्जा करने के लिए धार्मिक संगठनों में हत्याएं तक हुई हैं। पैसा बारूद की तरह ही खतरनाक चीज है। जीविका के लिए जितना धन चाहिए, उससे अधिक धन-संपत्ति होने से धार्मिक संगठन पूरी तरह धार्मिक नहीं रह जाते। आज जब धर्म की भूमिका पर पुनर्विचार चल रहा है, यह प्रश्न उठाने लायक है कि धार्मिक संगठनों के लोग आर्थिक दृष्टि से परजीवी या उपजीवी क्यों हों। वे भी क्यों न अपनी कमाई हुई रोटी ही खाएं और तब दूसरों को सीख दें कि धर्मपूर्वक जीने का मतलब क्या होता है।

विदेशी पैसे का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं। फ्रांसिस के अनुसार, 'चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं। उनका पूरा व्यवसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है।' इस अथाह दौलत का एक बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से आता है। भारत में या किसी भी लोकतांत्रिक देश में धर्म प्रचार करने का अधिकार सभी को है, लेकिन इस सिलसिले में विदेशी पैसे की खतरनाक भूमिका को नहीं भूलना चाहिए। आप इटली, अमेरिका या इंग्लैंड के पैसे से भारत के आदिवासियों के लिए स्कूल और अस्पताल बनाते हैं, तो उनका भला नहीं करते। पहली बात तो इसमें करुणा का तत्व कहीं नहीं है। यह निवेश की तरह दिखाई देता है। दूसरी और ज्यादा मारक बात यह है कि आप आदिवासियों को आत्मनिर्भर होने का पाठ नहीं पढ़ा रहे होते हैं। धार्मिक व्यक्ति अगर आत्मनिर्भर नहीं है, तो वह धर्म का पालन कर ही नहीं सकता। इसलिए सामाजिक कल्याण के कामों के पीछे भी राष्ट्रीय या सामुदायिक आत्मनिर्भरता होनी चाहिए। लोग अपने श्रम और योगदान से अपना जीवन संवारें। मुफ्त में मिलने वाला विदेशी पैसा कामचोर और लालची बनाता है तथा स्वाभिमान की जड़ खोद देता है। प्रदूषण उन तक भी फैलता है जिनके माध्यम से यह विदेशी पैसा आता है। दलाली की संस्कृति से कोई ऊंची धर्म भावना नहीं पनप सकती।

कुल मिला कर कहना यह है कि धर्म और पैसे के रिश्तों पर गहराई से विचार होना चाहिए। पैसे ने धर्म का बहुत अपकार किया है। पैसे की अधीनता स्वीकार कर लेने के बाद धर्म की मौलिकता नष्ट हो जाती है और वह संपन्न लोगों के निहित स्वार्थों का औजार बन जाता है। अगर भारत की ईसाई मिशनरियां अमीर नहीं होतीं, तो उनसे किसी समुदाय को ईर्ष्या भी नहीं होती। मैं नहीं जानता कि गरीब ईसाइयों के बीच एल आर फ्रांसिस की साख कैसी है, लेकिन उन्होंने जो प्रश्न उठाए हैं, वे महत्वपूर्ण हैं। अन्य धर्मों के लोगों के मन में भी इस तरह के प्रश्न उठने चाहिए।

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