Friday, October 24, 2008

धर्म परिवर्तन का मुद्दा

धर्म के नाम पर
राजकिशोर


बौखलाए हुए हिन्दू संगठनों के इशारे पर कंधमाल तथा कुछ अन्य स्थानों पर ईसाइयों के साथ जो जुल्म किया गया, वह कई अर्थों में कायराना था। पहली बात तो यह उपद्रव उन राज्यों में हुआ, जहां भाजपा सत्ता में है। अपने ही द्वारा शासित राज्य में अगर आप उपद्रव करते हैं, तो जाहिर है कि आप सोचते हैं कि आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। बिगाड़ सचमुच कोई कुछ नहीं पाया, क्योंकि केंद्र सरकार भी बहुत-से मामलों में लुंज-पंज है। उसमें यह चाव ही नहीं है कि भारत में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों को रोके। यह हमारे समाज की भी कायरता है कि हम किसी विशेष समुदाय के सदस्यों पर हमला होते हुए देखते रहते हैं, लेकिन किसी को बचाने के लिए आगे नहीं आते। क्या हमारे यहां समाज धर्म नाम की चीज लुप्त हो रही है? फिर तो हममें से कोई भी सुरक्षित नहीं है। हमारे किसी मत या काम से नाराज हो कर कोई भी गुंडा समूह हमें मार कर चला जाएगा और कोई कुछ बोलेगा नहीं। कायरता का तीसरा स्तर सबसे अधिक घातक और चिंताजनक है। अगर कुछ उत्साही हिन्दू यह सोचते हैं कि ऐसा करके वे हिन्दू धर्म की रक्षा कर रहे हैं या हिन्दू धर्म का नाम ऊंचा कर रहे हैं, तो यह हिन्दू धर्म की एक पराजय है। इस तरह की घटनाओं से हिन्दुत्व बदनाम ही होता है। धारणाा यह बनती है कि यह कोई धार्मिक समुदाय नहीं, बल्कि एक अराजक समूह है, जिसे सामान्य नागरिक शिष्टाचार की भी परवाह नहीं है। शुक्र है कि ऐसे उत्साही हिन्दू मुट्ठी भर ही है। लेकिन मुट्ट्ठी भर लोग भी कितना अधिक नुकसान कर सकते हैं, यह बाबरी मस्जिद के विध्वंस से, ईसाइयों के साथ हाल में हुए सलूक से और मुसलमान आतंकवादियों की तैयारियों से भली भांति समझा जा सकता है। सच यही है कि किसी भी देश-काल में कोई भी पूरा का पूरा समुदाय खराब नहीं हो जाता। मुट्ठी भर लोग ही दुष्टता करते हैं, जिसका परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ना है। हिटलर के जर्मनी में भी ऐसे लोगों की संख्या कम न थी जो उसके जुल्मो-सितम के खिलाफ थे।
धर्म परिवर्तन का मामला जितना सीधा है उतना ही पेचीदा भी। इसलिए इस विषय पर कोई भी मत प्रगट करने के पहले बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। संविधान और कानून से ज्यादा यह धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से संबंधित विषय है। कायदे से दुनिया के किसी भी हिस्से में धर्म परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। हर समाज ने अपना ईश्वर या अपना धर्म पैदा किया है। कारण, इसके बिना समाज का काम चल ही नहीं सकता। पिछड़े से पिछड़े आदिवासी समूह में चले जाइए, आप पाएंगे कि वहां भी जीवन और समाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कुछ नियम-कायदा बनाए गए हैं। मुख्तसर में धर्म यही है। जैसे-जैसे जीवन में जटिलता आती है और समाज के चिंतन का स्तर ऊंचा होता जाता है, पुरानी व्यवस्थाएं नाकाफी लगने लगती हैं और धर्म के नए-नए रूपों का जन्म होता जाता है। इन्हें नए-नए धर्म समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। नए से नए धर्म में भी कुछ ऐसा बचा रहता है जो पुराने से पुराने धर्म में मौजूद था। उदाहरण के लिए ईसाइयत ने बहुत-सी ऐसी चीजों को नहीं छोड़ा है जो उसके पहले से चले आ रहे यहूदी धर्म में मौजूद थीं। इसी तरह, भारत में वैदिक धर्म तथा बौद्ध और जैन धर्मों के बीच पूर्ण विपर्यय दिखाने की कोशिश होती है। इस तुलना में द्वेष भाव ज्यादा है। कोई भी समाज अपने को इस तरह उलटते हुए नहीं चलता है। परंपरा और नूतनता उसके दो पैर होते हैं और दोनों के साथ-साथ चलने से ही गति आती है।
चूंकि सभी धर्मों या धर्म के सभी रूपों या प्रणालियों का लक्ष्य एक ही है, चूंकि सभी ईश्वरों के व्यक्तित्व में तमाम तरह के फर्क होने के बावजूद वे मनुष्य का एक ही धर्म प्रतिपादित करते हैं, इसलिए धार्मिक टकराव एक मूर्खतापूर्ण या उद्दंड चीज हो जाती है। मतभेद विकासजन्य भी हो सकता है, लेकिन इस धारणा में काफी सचाई है कि जहां विकास जितना ज्यादा होगा, वहां हिंसा उतनी कम होगी या अहिंसा उतनी ज्यादा होगी। विकसित ईश्वर कम विकसित ईश्वर को समझा-बुझा सकता है, उसे गिरफ्तार कर जेल में डालने की नहीं सोच सकता। इस दृष्टि से हिन्दू अपने को बधाई दे सकते हैं। उन्होंने बहुत पुराने समय से अपने धर्म को सनातन धर्म कहा है -- एषु धर्म: सनातन:। वस्तुत: सनातन धर्म की खोज ही असली धार्मिक खोज है। जो धर्म सिर्फ कुछ दशकों या शताब्दियों तक ही वैध है, क्या वह भी धर्म कहलाने का अधिकारी है? इसीलिए हिन्दू होना एक भौगोलिक संज्ञा थी -- न कि किसी विशेष विचारधारा का नाम। दुख की बात है कि ऐसे हिन्दू भी दिखाई पड़ते हैं जो अपने को किसी धार्मिक चेतना से नहीं, बल्कि कुछ विशेष चिह्नों या किसी उग्रवादी मांगपत्र के आधार पर परिभाषित करते हैं। धर्म और संस्कृति को छोड़ कर कोई ऐसा बंधन नहीं हो सकता जो किसी समूह को सात्विक ढंग से जोड़ सके। कानून, नैतिकता, लोकतंत्र, मानव अधिकार, समाजवाद आदि धर्म के ही विभिन्न प्रकार और विकास हैं। यहां तक कि सच्ची और नैतिक नास्तिकता भी धर्म का ही एक रूप है। इसीलिए सच्चा धार्मिक अपनी अंतरात्मा को छोड़ कर किसी और से डरता नहीं है।
इस तरह, कोई भी देख सकता है कि धर्म परिवर्तन का कोई भी अभियान एक व्यर्थ का और विवाद बढ़ाने वाला उद्यम है। जो लोग धर्म के लिए नहीं, धर्म परिवर्तन के लिए काम करते हैं, वे धर्म और ईश्वर, दोनों की निगाह में गुमराह लोग हैं। इसमें शक किया जाना चाहिए कि वे धार्मिक भी हैं अथवा नहीं। ईसाई मिशनरियों की तारीफ की जानी चाहिए कि वे दुनिया के बीहड़ से बीहड़ इलाकों में जा कर वहां के दीन-दुखी लोगों की सेवा करते हैं। मानव सेवा की यह एक अद्वितीय परंपरा है जिससे सभी समुदायों के सदस्यों को सीखना चाहिए। लेकिन इस सेवा का लाभ उठाते हुए लोगों को नया ईश्वर पकड़ाना या उन्हें यह बताना कि आज से सिर्फ मेरा धर्म ग्रंथ ही तुम्हारा धर्म ग्रंथ है, बुरी बात है। वैज्ञानिक रूप से भी यह गलत है। इस तरह के सतही परिवर्तनों के बगैर भी उनका काम चल सकता है। हां, यह प्रचार करने में कोई हर्ज नहीं है कि कुछ लोगों का ईश्वर ऐसा भी है या कुछ के धर्म ग्रंथों में ऐसा भी कहा गया है, जिसे सबको जानना चाहिए। यह कुछ ऐसी ही बात है जैसे किसी वैज्ञानिक को गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बारे में पता लगे, तो वह सबको बताने को आतुर दिखाई पड़े। इसके बाद किसी का मत बदल जाए, तो अलग बात है। फिर भी, धर्म परिवर्तन के लिए आतुर व्यक्ति को सच्चा धार्मिक व्यक्ति या संगठन पहले यही समझाएगा कि क्यों, तुम्हारे अपने धर्म में क्या कमी है जो तुम धर्म बदलने आए हो या तुम चाहो तो अपने वर्तमान धर्म में रहते हुए भी उतने ही नेक इनसान बन सकते हो। ज्यादा आबादी में या अधिक भूगोल पर फैलने से कोई धर्म बड़ा नहीं हो जाता। वह बड़ा इससे होता है कि उसे मानने वाले लोग कितना ऊंचा जीवन जीते हैं। सच्चे हिन्दू, मुसलमान या ईसाई का लक्ष्य अपने लिए मोक्ष पाना होगा, न कि उसके पहले दूसरों के मोक्ष की चिंता करना।
महात्मा गांधी ने धर्म परिवर्तन के अभियानों का विरोध इसीलिए किया था कि इससे समाज में एक अनावश्यक कलह मचा रहता है। धर्म में प्रतिद्वंद्विता की गुंजाइश नहीं है। अच्छाइयां आपस में झगड़ती नहीं हैं, वे एक-दूसरे का समर्थन करती हैं। इसलिए विभिन्न धार्मिक समूहों को अपने-अपने स्तर पर अच्छा बनने का प्रयास करना चाहिए न कि अपने ईश्वर या धर्म ग्रंथ की अधिक से अधिक मार्केटिंग की फिक्र करनी चाहिए। धार्मिक समूहों में अपनी-अपनी संख्या बढ़ाने की प्रतिद्वंद्विता एक मानसिक विकार है और इसका वास्तविक धार्मिकता से कोई संबंध नहीं है। स्वयं महात्मा गांधी एक बार ईसाई धर्म स्वीकार करने के बहुत करीब आ गए थे, लेकिन उन्होंने विचार करके देखा तो पाया कि ईसाई हो जाने पर ऐसा कुछ भी नया नहीं मिलेगा जो हिन्दू धर्म में पहले से मौजूद न हो। बाद में उन्होंने पाया कि अन्य धर्मों की हकीकत भी यही है। तभी से उन्होंने धर्मों की तुलनात्मक विवेचना छोड़ दी और यह कहने लगे कि मैं जितना हिन्दू हूं, उतना ही मुसलमान भी और उतना ही ईसाई भी। यानी मेरे लिए सभी धर्म एक जैसे अच्छे हैं, क्योंकि सभी तो मनुष्य को अच्छा बनने के लिए प्रेरित करते हैं। मैं इस रास्ते से जा कर अच्छा बनूं या उस रास्ते से जा कर, बात तो एक ही है। फिर आपस में कैसा झगड़ा और कैसी प्रतिद्वंद्विता? तीर्थयात्री क्या एक-दूसरे पर हमला करते हुए आगे बढ़ते हैं?
धर्म परिवर्तन का अभियान चलाना जितना बुरा है, इस अभियान को बलपूर्वक रोकना उससे भी ज्यादा बुरा है। मैं अगर सच्चा हिन्दू हूं, तो मुझे इससे चाहे जितनी परेशानी हो कि मेरे सभी सगे-संबंधी मुसलमान या ईसाई होते जा रहे हैं, इसे रोकने के लिए मैं न तो तलवार या लाठी ले कर निकलूंगा और न ही पेट्रोल के पीपे जमा करूंगा। एक-दूसरे को समझाना-बुझाना सभी का हक है। सच तो यह है कि इस तरह के वैचारिक मंथन की स्वस्थ परंपरा शुरू हो जाए तो सभी धार्मिक प्रणालियों और सब प्रकार के ईश्वरों का पत्ता कट जाएगा और लोग इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि अच्छा होने के लिए हमें किसी मंदिर, मस्जिद, चर्च, धर्मग्रंथ, यज्ञ, परंपरा, रोजा, नमाज आदि की जरूरत नहीं है, किसी काल्पनिक देवता की शरण में जाने की जरूरत नहीं है, किसी परलोक, स्वर्ग-नरक पर यकीन करने की जरूरत नहीं है और अपने को हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि कहने की भी जरूरत नहीं है। ये सब धर्म के छिलके हैं। असली तत्व तो इनके भीतर से झांकता है और पूजा उसी की होनी चाहिए। इसी अर्थ में संत कबीर ने कहा था कि मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान। यहां हालत यह है कि तलवार को तो कोई पूछता नहीं, सारी लड़ाई म्यानों तक सीमित है। ऐसी लड़ाइयों से किस समाज का भला हुआ है या किस समाज का भला हो सकेगा?
इसमें संदेह नहीं कि परीक्षा की घड़ी में ही साबित होता है कि कौन कितना धार्मिक है। अगर ईसाई संगठन किसी खास आबादी को अपने धर्म में दीक्षित करने के लिए प्रयासशील हैं, तो देखने की बात यह हो जाती है कि हम अपनी इस परेशानी का करते क्या हैं। अगर हम सचमुच चाहते हैं कि कोई धर्म परिवर्तन न करे, तो उसके पास विनय के साथ जाएंगे और उसे समझाएंगे-बुझाएंगे न कि धर्म परिवर्तन कराने वाले के घर में आग लगा देंगे। इस तरह का क्रोध किसी को शोभा नहीं देता। यह कानून की निगाह में अपराध तो है ही; ऐसा करके हम अपने को धार्मिक तो क्या, मनुष्य भी साबित नहीं करते। यह बात सही है कि ईसाई संगठन सेवा करके लोगों का दिल जीतते हैं और तब उनके हृदय में अपना ईश्वर स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन इसे प्रलोभन नहीं कहा जा सकता। ज्यादा से ज्यादा यह सेवा का प्रतिफल मांगने जैसा है। ईसाई संगठन इस शर्त के साथ सेवा नहीं करते कि पहले तुम मेरे ईश्वर को अपने दिल में जगह दो, फिर हम तुम्हारी देखभाल करेंगे। वे नि:शर्त सेवा करते हैं, ईश्वरों के विनिमय की बाद बाद में उठती है। इसे कानून बना कर या गुंडागर्दी करके कैसे रोका जा सकता है? आप धर्म की चिंता करें, धर्म परिवर्तन अपनी चिंता खुद कर लेगा। इक्का-दुक्का मामलों की बात और है। उनसे किसी के पेट में दर्द भी नहीं होता। लेकिन सचाई यही है कि किसी अन्याय-मुक्त और न्यायप्रिय समाज में बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन हो ही नहीं सकता। होता भी नहीं है। इसलिए अन्याय से लड़ना ज्यादा जरूरी और महत्वपूर्ण है। धर्म की शक्ति इसी से प्रगट होती है, न कि मारकाट या आगजनी से। 000

4 comments:

Satyajeetprakash said...

मूल लेखक- एल आर फ्रांसिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट (francispclm@yahoo.com)
साभार- विस्फोट

चर्च पर हिन्दू चरमपंथियों द्वारा हमला तो खबर बनती है लेकिन यह खबर कभी क्यों नहीं बनती कि चर्च के अंदर कितना शोषण, अत्याचार और दमन हो रहा है. चर्च संगठन अपने ही कर्मचारियों का शोषण करते हैं, नन्स और पादरी की संदेहास्पद हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आये हैं, जिनमें चर्च प्रशासन से जुड़े लोग ही शामिल पाये गये हैं, फिर भी हमारा प्रबुद्ध समाज चर्च संगठनों के बीच फैली इन कुरीतियों के बारे में कभी अपनी जबान नहीं खोलता.

पिछले दिनों चर्चों से जुड़ी ऐसी कई घटनांए सामने आई हैं जिन्हें साप्रदायिकता की श्रेणी में रखा जा रहा है। अभी हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की रेलवे कंलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दु संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुंरत अतंराष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाया गया। चर्च अधिकारियों और उनके विदेशी आकाओं की भकुटियां तन गई। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार था- नोयल पारे. नोयल पारे ने आक्रोशवश ही चर्च में आग लगाई थी।

चर्च की 86वीं वशZगांठ मनाई जाने वाली थी। बड़े समारोह की तैयारियॉ थी। किंतु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का। जिनसे वह पेट भरने के लिये जरुरी नून-तेल उधार लेता था। चर्च प्रशासन उसे मात्र 1000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर और चर्च प्रषासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच. देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाये जाने वाले अधिक्तर संस्थानों में भी ऐसा ही हाल है, सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते है। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए महीना अर्थात 33 रुपए प्रतिदिन, ऐसी स्थिति में -क्रिया की प्रतिक्रिया - शोषण का परिणाम आक्रोश तो होगा ही. आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है। हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़ मारपीट अगजनी इत्यादि या चोरी चकारी, लूटपाट कुछ भी।

कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के ही झाबुआ में कान्वेंट की ननों (धर्म-बहनों) पर सामूहिक हमला व बलात्कार का मामला भी खूब उछाला गया। लेकिन उस समय भी बात वहीं थी बंदर की बला तबेले के सिर. हिन्दू संगठन ही बदनाम किये गये। इस मामले में भी झाबुआ के धर्मांतरित ईसाइयों का आक्रोश ही था। मलयाली-दक्षिण भारतीय ननें बनाम आदिवासी ईसाई. यहां रतलाम में चर्च जलाने की जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है उसके मूल में भी मलयाली चर्च प्रशासन पादरी जोस मैथ्यू (मलयाली) बनाम नोयल पारे (स्थानीय मराठी मूल का आदिवासी) है. हाल ही में बिजनौर -उतर प्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने `संत मेरी स्कूल´ की नन प्रमिला की 5 नवंबर 2007 को हुई हत्या के मामले में स्कूल के चौकीदार जॉन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुछ दिन पूर्व उतराखंड के रामपुर में एक कैथोलिक पादरी एवं उसकी नौकरानी की हत्या के मामले में भी उक्त आश्रम से जुड़े कुछ लोग पकड़े गये है। आजकल उड़ीसा में एक नन के साथ हुये बलात्कार का मामला राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में छाया हुआ है.उड़ीसा पुलिस ने संदेह के आधार पर चार लोगों को हिरासत में लिया है. पीड़ित नन चर्च अधिकारियों के संरक्षण में अज्ञातवास में चली गई है. चर्च अधिकारियों के मुताबिक पीड़िता को सही समय पर सामने लाया जायेगा। किसी भी महिला के साथ बलात्कार एक घिनौना अपराध है. बलात्कारी शरीर ही नहीं पीड़िता की आत्मा की भी हत्या कर देता है. ऐसा अपराधी कोई भी हो उसे क्षमा नहीं किया जाना चाहिए परन्तु उड़ीसा मामले को लेकर कुछ चर्च अधिकारियों पर ही अगुंली उठ रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सच लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।


मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है.यहीं नहीं उड़ीसा में जो हो रहा है उसमें भी मलयाली मिशनरियों का बड़ा हाथ है। कटक के आर्च बिशप राइट रेव्हण रिफेल चीनथ भी मलयाली ही है। वहां इनकी गलतियों की सजा गरीब एवं सीधे साधे धर्मांतरित वंचितों को मिली। छल, फरेब, धोखाधड़ी के बलबूते अपने साम्राज्य का विस्तार करते `पोप पोषित´ यह मिशनरी हिन्दू दलितों को मतांतरित करने के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में हिन्दू रहने के लिए प्रेरित करते है, ताकि वह इन से नहीं सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और इनकी धर्मांतरण की दुकान बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे।

इन्हें वंचितों एवं आदिवासियों के प्रति कितनी सहनाभूति है यह उड़ीसा के कंधमाल और कर्नाटक में हुए कुछ चर्चों पर हमलों के दौरान विरोध करने के तरीके से भी समझा जा सकता है। जहां उड़ीसा के मामले में कैथोलिक चर्च अधिकारी एक औपचारिकता निभाते दिखाई दिये वहीं मंगलूर में हुई घटनाओं के बाद उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। अंग्रेंजी अखबारों में दो-दो पेज तक की खबरे आनी शुरू हुई। चर्च अधिकारी और उनके राजनीतिक समर्थक ऐसे सक्रिय हुए मानों कर्नाटक में `ईसाइयत´ समाप्त होने को हो। चर्च अधिकारियों की सक्रियता और उग्र तेवरों को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री तुरंत मंगलूर डायसिस के बिषप के यहां सफाई देने वैसे ही पुहचें जैसे राजग के शासनकाल में केन्द्र सरकार अपनी सफाई देती थी। मंगलूर की घटनाओं के बाद चर्च अधिकारियों का उग्र होना स्भाविक था क्योंकि एक तरह से वह चर्च का मिनी वैटिकन जो ठहरा। यदि मराठियों,असामियों, बगालियों, पंजाबियों आदि को अपने अस्तित्व की चिन्ता सता सकती है तो उड़ीसा के मूल निवासियों को भी अपने अस्तित्व की रक्षा की चिन्ता होना स्भाविक है।

मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है। यह दक्षिण भारतीय पादरी - बिशप विदेशी मिशनरियों द्वारा छोड़ी गई अकूत सम्पति को अपने हाथ से निकलने न देने की फिराक में नित नयें हथकंडे अपनाते रहते है। यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि वास्कोडिगामा द्वारा छोड़े गये पुर्तगाली मूल के मिशनरियों के वंशज अब भी मंगलोरियन -गोअन - के रुप में उपस्थित है। उतर प्रदेश के नौ कैथोलिक डायसिसों आगरा, मेरठ, झॉसी, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनाऊ, बनारस, गोरखपुर, बरेली - के बिशपों में से छ: बिशप पुर्तगाली मूल के है - शेष मलयाली (केरल) के है। अभी कुछ माह पूर्व केरल के आर्च बिशप ने केरल के ईसाइयों के नाम एक परिपत्र (फतवा) जारी किया था ``यह कि प्रत्येक दम्पती को चाहिये कि वे `अधिक से अधिक´ संतान उत्पन्न करें. आशय यही था कि चर्च संपदा को हथियाये रखने के लिए केरल के कर्णधारों की अवश्यकता है।

चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं. उनका पूरा व्यावसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है। भारत सरकार का वार्षिक बजट तो आय-व्याय के साथ घाटे के बजट के रुप में जुड़ा होता है मगर इनके घाटे का तो सवाल ही नहीं और साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हित्तों की रक्षा का भार भारत की सरकार पर जिसके तहत इटली की सरकार और वैटिकन भारत के राजदूत को बुलाकर डांट लगाती है। यहीं कारण है कि चर्च अधिकारियों द्वारा शोषित आम ईसाई अनाथ सा विक्षिप्तावस्था में जा पहुंचा है जिसका भविष्य आक्रोश और विरोध की नींव पर खड़ा है.

Satyajeetprakash said...

आपने मिशनरियों की गुंडागर्दी देखी है. अगर देखी होती तो आप इस तरह का सवाल नहीं उठाते. ननों के साथ यौनाचार के दर्जनों मामले दुनिया के विभिन्न चर्चों से आए हैं इसके लिए पोप ने सरेआम माफी भी मांगी है. इसी मिशनरी वालों ने कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या कर दी. पता है कौन थे लक्ष्मणानंद. हजारों हजार आदिवासियों के माता-पिता और गुरू. उनका कसूर धर्मांतरण से रोकने के लिए आदिवासियों की सेवा था और नक्सलियों से सांठ-गांठ करके स्वामीजी की हत्या करा दी गई और जब आदिवासियों का गुस्सा भड़का तो आप उसे हिंदुवादी संगठनों की गुंडागर्दी कह रहे हैं. कहते रहिए क्योंकि इसी से आप सच्चे पत्रकार बनेंगे और धर्मनिरपेक्ष मीडिया आपको जगह देगी.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

धर्म कहाँ है? वह तो वनवासी हो गया है। संप्रदाय उस के घरों में लीला कर रहे हैं।

युग-विमर्श said...

प्रिय राज किशोर जी.
आपके विचार पढ़े. कोई आश्चर्य नहीं हुआ. घिसी-पिटी बातों को शब्दों का नया कलेवर देना भी तो एक कला है. मेरी दृष्टि में धर्म न्याय-प्रियता और उसके द्वारा नियंत्रित कर्तव्य-पालन का नाम है. मज़हब,रेलिजन या प्रचलित अर्थों वाले धर्म का नाम नहीं. स्रष्टा, या परम-सत्ता, या अल्लाह, गाड, ईश्वर इत्यादि उसी परम सत्ता के प्रतीक शब्द हैं. स्पष्ट है कि यह परम सत्ता या स्रष्टा दो-चार-दस नहीं हैं. इस दृष्टि से धर्म या न्याय भी दो नहीं हो सकते. मज़हब या रेलिजन या वर्त्तमान अर्थों में धर्म ईश्वर-प्रदत्त न्याय-विवेक पर चढाये गए स्वार्थ के मुलम्मे हैं. नीर-क्षीर विवेक ही वास्तविक धर्म या दीन है और यही सनातन भी है. वैदिक और औपनिषदिक न्याय पौराणिक युग में आकर अपना अर्थ खो बैठा. शैव, शाक्त और वैष्णव धर्म उठ खड़े हुए. उपनिषदों के दर्शन के भीतर से बौद्ध और जैन विचारधारा की जो कोपलें फूटीं थीं, वह भी पौराणिक युग की साम्प्रदायिक लपेट में आने से नहीं बचीं. बौद्ध धर्म के उन्मूलन में शंकर, कुमारिल और उदयन की भूमिकाएं देखी जा सकती हैं. सातवीं शताब्दी में ही यह मान्यता स्थापित हो चुकी थी कि ब्राह्मण धर्म से इतर सभी धर्म-पद्धतियाँ धर्म-विरोधी हैं. इस कट्टरता ने असहमतिवादियों [ Dissenters ] को जन्म दिया जिन्हें हम सिद्ध, नाथ और संत के नामों से जानते हैं. इंग्लॅण्ड में भी असहमतिवादियों को उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक मुख्य-धरा के ठेकेदारों ने विवाह के पंजीकरण और चर्च के कब्रिस्तानों में मुर्दे दफनाने के अधिकार से वंचित कर रखा था. इस्लामी कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया स्वरुप सूफी विचारधारा सामने आई. लिखा तो बहुत कुछ जा सकता है किंतु फिलहाल इतना ही. धर्म परिवर्तन को पुण्य का कार्य समझकर किए जाने वाले प्रयास घातक हैं. किंतु इतिहास में प्रारम्भ से यही हुआ है. फिर भी स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन का अधिकार तो सभी को मिलना चाहिए. आशा है आप मेरी किसी बात का अन्यथा नहीं लेंगे.
दीपावली की शुभ कामनाओं के साथ
शैलेश जैदी