Tuesday, November 10, 2009
क्रांति अब भी संभावना है
राजकिशोर
रूस की साम्यवादी क्रांति मानवता की एक महान विरासत है। इस विरासत की उपेक्षा इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि यह क्रांति टेढ़े-मेढ़े रास्तों से चलती हुई विफल हुई और रूस को पूंजीवादी नीतियों के साथ समझौता करना पड़ा। अगर विफलताएं ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती हैं, तो रूसी क्रांति से भी सीखने के लिए बहुत कुछ होना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि वाश टब से नहाने के पानी के साथ-साथ बच्चे को भी फेंक दिया गया है। यह वास्तव में अपने साथ भी अन्याय है, क्योंकि वर्तमान समस्याओं से निजात पाने के लिए हम इतिहास के जिन प्रयोगों की तरफ आशावादी निगाहों से देख सकते हैं, उनमें रूसी क्रांति का अहम स्थान है।
दुनिया में जब से विषमता का सूत्रपात हुआ, तभी से समानता की भूख मनुष्य के मन में कुलबुलाती रही है। इसकी एक अभिव्यक्ति धर्म के रूप में हुई जो मानता है कि हम सब एक ही ईश्वर की संतानें हैं और इसलिए हम सभी का दर्जा बराबर है। लेकिन इस शिक्षा का पालन धार्मिक प्रतिष्ठान भी नहीं कर सके जिन पर धर्म का प्रसार करने की जिम्मेदारी रही है। ईश्वर के दरबार में राजा-रंक सभी की हैसियत बराबर होगी, पर धरती पर ईश्वर का राज्य तरह-तरह की विषमताओं से भरपूर है। यहां तक कि विचार करने की आजादी भी, जो मनुष्य को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है, सभी को नहीं है। जो धार्मिक क्षेत्र स्वयं प्रदूषित रहा है, वह समाज और राजनीति में गैरबराबरी का समर्थन और पोषण क्यों न करता?
इसलिए धर्म के बाहर समानता की खोज अनिवार्य हो उठी। समाजवाद का विचार इसी लंबी खोज का परिपाक है। भारत में समता का विचार आध्यात्मिक स्तर पर ज्यादा फैला। यूरोप ने इसे भौतिक स्तर पर लागू करने के ठोस तरीके खोजे। इसका एक नतीजा लोकतंत्र के रूप में आया, जिसमें, कम से कम सिद्धांत के स्तर पर, हर आदमी की राजनीतिक हैसियत बराबर होती है। लेकिन हम जानते हैं कि ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के आधार पर बने लोकतांत्रिक ढांचे में कितनी तरह की विषमताएं होती हैं। इनमें से अधिकांश का संबंध पूंजीवाद से है, जिसका प्रेरणा-स्रोत ही विषमता के अधिक से अधिक स्तर पैदा करना है। वस्तुओं के उत्पादन और वितरण का एक निश्चित तरीका किस तरह समाज के सभी संबंधों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है, पूंजीवाद इसका सबसे प्रबल उदाहरण है। इसलिए समाजवाद की पहली शर्त यह बनी कि उत्पादन के संबंधों में परिवर्तन हो। पूंजी की मुक्ति में सभी चीजों की मुक्ति निहित है।
पूंजी की मुक्ति का पहला बड़ा प्रयोग रूस की जमीन पर हुआ। इससे दुनिया भर में यह संदेश फैला कि जो एक देश में संभव है, वह दूसरे देशों में भी संभव है। आशा की यह लहर कितनी जबरदस्त थी और कितनी व्यापक, आज हम इसकी सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। लेकिन रूसी क्रांति के अलमबरदारों ने जिस तरह की नीतियों का अनुसरण किया, उससे साम्यवाद की चादर पर खून के बड़े-बड़े धब्बे दिखाई देने लगे। स्टालिन और उसके अनुयायी भूल गए कि उनका काम पूंजीवादी लोकतंत्र को शुद्ध करना तथा जनवादी बनाना है, न कि लोकतंत्र को ही खत्म कर देना। असहमति के दमन पर टिकी कोई भी व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। रूस का समाजवादी प्रयोग पचास-साठ साल में ही अपने अंतर्विरोधों से भरभरा कर गिर गया, यह मानव इतिहास के करुण अध्यायों में एक है। आज का रूस अपने इस लाल-काले अध्याय के एक-एक अवशेष को मिटाने के लिए उतावला है, तो कल्पना की जा सकती है कि किस तरह की स्मृतियां रूस के लोगों को पीड़ित कर रही होंगी।
इसके बावजूद साम्यवादी रूस में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो दुनिया में कहीं और नहीं हो सका है। वहां जमींदार नहीं थे, न पूंजीपति थे। न भिखारी थे, न वेश्याएं। विषमता थी, पर उसके बहुत ज्यादा स्तर नहीं थे। बच्चों के विकास पर पूरा ध्यान दिया जाता था। बूढ़ों को समय पर पेंशन मिलती थी। काम-काज में सामूहिकता को प्रोत्साहित किया जाता था। मेहनत करनेवाले पुरस्कृत किए जाते थे। बेशक इनके साथ-साथ यह भी हुआ कि मानव अधिकारों की कोई प्रतिष्ठा नहीं थी, स्वतंत्र रूप से सोचनेवाले प्रताड़ित किए जाते थे, अखबार झूठ के पुलिंदे बन गए, ईमानदार लेखकों और कवियों के लिए जेल के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे और हर तरफ षड्यंत्र का वातावरण बन गया। उपर्युक्त उपलब्धियों और इन दुरवस्थाओं के बीच तालमेल बैठा पाना मुश्किल है।
आज रूसी क्रांति को गर्व के बजाय डर की निगाह से देखा जाता है, तो इसका कारण मार्क्सवाद के साथ विश्वासघात ही है। दुख की बात यह है कि इसकी तरफ मार्क्सवादियों का ही ध्यान सबसे अधिक जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। मार्क्सवादियों का एक बड़ा वर्ग, भारत में भी, रूसी क्रांति के विपथगामी होने का जिक्र करता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उसका यह हाल क्यों हुआ और आज के मार्क्सवादियों ने रूसी क्रांति की दुर्गति से क्या-क्या सीखा है। इसीलिए लाल झंडे के प्रति आम जनता में प्रेम तो देखा जाता है, पर कोई देश नहीं चाहता कि वह लाल रूस की तरह बने। समकालीन नेपाल में इस तरह की एक तरंग आई थी, क्योंकि वहां के मार्क्सवादियों ने सामंतशाही के खिलाफ कठोर संघर्ष किया था। लेकिन अब वहां भी मोहभंग का वातावरण है।
आज हमारे यहां मार्क्सवाद पंगु है। वह सामंती तौर-तरीकों से अपने को जीवित रखने की कोशिश कर रहा है। मार्क्सवाद की जगह माओवाद है। माओवाद ने कुछ खास तरह के इलाकों में सफलता प्राप्त की है, पर अपनी पोशीदा और डर पर आधारित कार्य प्रणाली के कारण वह वन आंदोलन बन कर रह गया है, जन आंदोलन नहीं बन पाया है। जन आंदोलन वह होता है जिसका राज्य की बुनियादी नीतियों पर दबाव पड़े और जिससे सत्ता के नए दावेदार पैदा हो सकें। आश्चर्य की बात यह है कि आज देश में सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी मार्क्सवादी ही हैं, किन्तु वे जन संघर्ष का कोई ऐसा मॉडल खोजने में असमर्थ हैं जिसके प्रति जनता में बड़े पैमाने पर आकर्षण पैदा हो सके। संकट की इस घड़ी में रूसी क्रांति के सही सबक बहुत काम के हो सकते हैं, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है।
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Friday, November 6, 2009
प्रभाष जोशी
राजकिशोर
किसी भी लेखक के लिए सबसे बड़ी बात यह होती है कि वह अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन जाए। जैसे निराला जी या रामविलास शर्मा हिन्दी जगत के लीजेंड थे और आज भी उनकी यह हैसियत बनी हुई है। हिन्दी पत्रकारिता में प्रभाष जोशी का स्थान ऐसा ही है। वे बालमुकुंद गुप्त, विष्णुराव पराड़कर और गणेशशंकर विद्यार्थी की महान परंपरा की अंतिम कड़ी थे। भारत में पत्रकारिता जिस दिशा में जा रही है, आनेवाले समय में यह विश्वास करना कठिन होगा कि कभी प्रभाष जोशी जैसा पत्रकार भी हुआ करता था।
पत्रकारिता की ऊंचाई इस बात में है कि वह रचना बन जाए। प्रभाष जी पत्रकारों के बीच रचनाकार थे। उन्होंने जो कुछ लिखा जल्दी में ही लिखा, जो पत्रकारिता की जरूरत और गुण दोनों है, पर उनकी लिखी एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है जिसमें विचार या भाषा का शैथिल्य हो। वे जितने ठोस आदमी थे, उनका रचना कर्म भी उतना ही ठोस था। सर्जनात्मकता का उत्कृष्टतम क्षण वह होता है जब रचना और रचनाकार आपस में मिल कर एक हो जाएं। प्रभाष जोशी का व्यक्तित्व और लेखन, दोनों में ऐसा ही गहरा तादात्म्य था। वे जैसे थे, वैसा ही लिखते थे। इसीलिए उनकी पत्रकारिता में वह खरापन आ सका जो बड़े-बड़े पत्रकारों को नसीब नहीं होता।
पत्रकार अपने समय की आंख होता है। बदलते हुए परिदृश्य पर सबकी नजर जाती है, लेकिन पत्रकार अपने हस्ताक्षर वहां करता है जहां उसके समय का मर्म होता है। इस मायने में प्रभाष जोशी ने अपने पढ़नेवालों या सुननेवालों को कभी निराश नहीं किया। उन्होंने हमेशा अपने वक्त के सबसे मार्मिक बिन्दुओं को चुना और उन पर अपनी निर्भीक और विवेकपूर्ण कलम चलाई। अपने अंतिम बीस वर्षों में उनके दो केंद्रीय सरोकार थे – सांप्रदायिकता और बाजारवादी अर्थव्यवस्था। इन दोनों ही धाराओं में वे महाविनाश की छाया देख रहे थे। सांप्रदायिकता से उन्होंने अकेले जितने उत्साह और निरंतरता के साथ बहुमुखी संघर्ष किया, वह ऐतिहासिक महत्व का है। यह उनकी सनक नहीं थी, भारतीय समाज के साथ उनके प्रेम का विस्फोट था। गहरी सामाजिक संलग्नता की अनुपस्थिति में वह प्रखरता नहीं आ सकती थी जो प्रभाष जी के सांप्रदायिकता-विरोधी लेखन में दिखाई पड़ती है। उनके लिए यह मानो धर्मयुद्ध था, जिसमें उन्हें जीतना ही था।
नई अर्थनीति के खतरों को उन्होंने तभी देख लिया था जब आधुनिकीकरण के नाम पर कंप्यूटर युग की शुरुआत हुई थी और मनुष्य को मानव संसाधन माननेवाली विचारधारा अपने पैर जमा रही थी। आर्थिक सुधारों के नाम पर किए जानेवाले सभी फैसलों को उन्होंने शक की निगाह से देखा और आम आदमी के हितों को ध्यान में रख कर उनकी समीक्षा की। स्वच्छंद पूंजी की धमक से वे बहुत बेचैन रहते थे और उसके सर्वनाशी नतीजों से बराबर आगाह करते रहे। उनके इस आग्रह में गांधीवाद को ढूंढ़ना बेकार है। यह उनके प्रखर राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति थी। यह वही राष्ट्र प्रेम था जो उनके अन्य सामाजिक सरोकारों में प्रगट होता था। उनके कर्मकांडी हिन्दू होने के बावजूद उनका विवेक कभी मलिन नहीं होता था। उनके कुछ विचार अंत तक विवादास्पद बने रहे, लेकिन अपनी प्रामाणिकता में उनका गहरा विश्वास था। यह वैसा ही विश्वास है जो किसी प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी में दिखाई पड़ता है। ऐसे मामलों में हमें ‘संदेह का लाभ’ देने में संकोच नहीं करना चाहिए।
मीडियम इज द मेसेज – यह पंक्ति लाखों बार दुहराई जाने के बावजूद अर्थहीन नहीं हुई है। यह कुछ वैसा ही वाक्य है, जैसे गांधी जी की यह धारणा कि साध्य और साधन में पूर्ण एकता होनी चाहिए। पत्रकारिता का मुख्य औजार है भाषा। इसलिए यह संभव नहीं था कि जो व्यक्ति समाचार और विचार, दोनों क्षेत्रों में क्रांति कर रहा हो, वह भाषा के क्षेत्र में परिवर्तन की जरूरत के प्रति उदासीन रहे। अगर भारतेंदु के समय में हिन्दी नई चाल में ढली, तो प्रभाष जोशी ने उसे एक बार फिर नई चाल में ढाला। हिन्दी पत्रकारिता के विकास में उनका यह योगदान असाधारण है और इसके लिए उन्हें युग-युगों तक याद किया जाएगा।
पत्रिकाओं के क्षेत्र में जो काम ‘दिनमान’ और ‘रविवार’ ने किया, अखबारों की दुनिया में प्रभाष जोशी द्वारा स्थापित ‘जनसत्ता’ ने उससे कहीं बड़ा और टिकाऊ काम किया। पत्रकारिता की समूची भाषा को आमूलचूल बदल देना मामूली बात नहीं है। यह काम कोई ऐसा महाप्राण ही कर सकता है जिसमें संस्था बनने की क्षमता हो। ‘जनसत्ता’ एक ऐसी ही संस्था बन गई। यह कहना अर्धसत्य होगा कि प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की तत्कालीन निर्जीव और क्लर्क टाइप भाषा को आम जनता की भाषा से जोड़ा। यह तो उन्होंने किया ही, उनका इतने ही निर्णायक महत्व का योगदान यह है कि उन्होंने जन भाषा को सर्जनात्मकता के संस्कार दिए। हिन्दी की शक्ति उसके तद्भव व्यक्तित्व में सबसे अधिक शक्तिशाली रूप में प्रगट होती है। प्रभाष जी का व्यक्तित्व खुद भी तद्भव-जन्य था। वे खांटी देशी आदमी थे। उनकी अपनी भाषा भी ऐसी ही थी। आश्चर्यजनक यह है कि उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता से अपने पूरे अखबार को ऐसा ही बना दिया। इस क्रांतिकारी रूपांतरण में उनके संपादकीय सहकर्मियों की भूमिका को कम करके नहीं आंकना चाहिए।
मीडियम के इस परिवर्तन में मेसेज का परिवर्तन अनिवार्य रूप से समाहित था। सो ‘जनसत्ता’ की पत्रकारिता एक नई संवेदना ले कर भी आई। यह संवेदना शोषित और पीड़ित जनता के पक्ष में और सभी प्रकार के अन्याय के विरुद्ध थी। भारत की जनता के दुख और पीड़ा के जितने भी पहलू हो सकते थे, इस नए ढंग के अखबार ने सभी को अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया। दुख की बात यह है कि बाद की पीढ़ी ने इस भाषा को तो अपनाया, पर उसकी पत्रकारिता में वह संवेदना नहीं दिखाई देती जिसे प्रभाष जी ने ‘जनसत्ता’ के माध्यम से विस्तार दिया।
प्रभाष जोशी का व्यक्तित्व बहुमुखी और समग्रता लिए हुए था। उसमें साहित्य, संगीत, कला – सबके लिए जगह थी। इस गुण ने उनकी पत्रकारिता में चार चांद लगा दिए। ‘जनसत्ता’ ने हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य का पुनर्वास किया। ऐसे समय में, जब पत्रकारिता साहित्य से कटने में गर्व का अनुभव कर रही थी, यह एक साहसिक घटना थी। इसी तरह, संस्कृति के अन्य रचनात्मक पक्षों को भी प्रभाष जोशी ने पूरा महत्व दिया। खेल में तो जैसे उनकी आत्मा ही बसती थी। कुल मिला कर, हिन्दी प्रदेश में प्रभाष जोशी एक समग्र बौद्धिक केंद्र थे और ऐसा ही वातावरण बनाने के लिए अंतिम समय तक सक्रिय रहे। प्रभाष जी को आधुनिक भारत का सबसे बड़ा पत्रकार कहा जाए, तो इसमें अतिशयोक्ति का एक कतरा भी नहीं है। 000
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Tuesday, September 1, 2009
अपने को परिभाषित करने का समय
राजकिशोर
भारतीय जनता पार्टी अब उस बिन्दु पर आ गई है जहां उसे अपने को परिभाषित करना ही होगा। पार्टी की सारी समस्याएँ उसकी अस्पष्ट दिशा और नीति की वजह से हैं। अगर कोई यह समझता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक के हस्तक्षेप से भाजपा की समस्याएं सुलझ गई हैं, तो यह उसका भ्रम है। हुआ यह है कि अंदरूनी लड़ाई सिर्फ भीतर चली गई है। विचारधारा के स्तर पर कुछ भी सुलझा नहीं है। इसलिए भाजपा आगे भी बहुत दिनों तक ब्रेकहीन कार की तरह भटकती रहे तो हैरानी की कोई बात नहीं होगी।
इसलिए मुझे लगता है कि भाजपा के उद्धार के लिए अरुण शौरी ने जो रास्ता सुझाया है, वही ठीक है। भाजपा को या तो अपने आपको विघटित कर देना चाहिए या बचे रहने की तबीयत है तो अपने आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हवाले कर देना चाहिए। इस बारे में वह जितना पसोपेश दिखाएगी, अपना उतना ही ज्यादा नुकसान करेगी। सच पूछिए तो भाजपा आज जिस संकट की गिरफ्त में है, वह पैदा ही इसलिए हुआ है कि पार्टी ने उन लक्ष्यों को बिलकुल ताक पर रख दिया है जिनके लिए उसका गठन किया गया था। वह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी विचारधारा बताती है, लेकिन उसके चरित्र में न संस्कृति के दर्शन होते हैं, न राष्ट्रवाद के। अरुण शौरी ठीक कहते हैं, भाजपा की हालत कटी पतंग जैसी हो चुकी है।
भाजपा कांग्रेस या सपा-बसपा की तरह कोई सामान्य पार्टी नहीं है। इसके साथ न तो जन आंदोलन का कोई इतिहास है न यह किसी नेता की महत्वाकांक्षा की उपज है। यह कहना भी सत्य नहीं है कि भाजपा भारत के सवर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती है। उसके गठन के पीछे एक खास उद्देश्य था। उसका काम यह था कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए राजनीतिक स्तर पर सक्रिय रहे। शुरू में उसने अपना यह कर्तव्य मोटे तौर पर निभाया भी। इससे उसका जनाधार बना। पर धीरे-धीरे लोभ डसने लगा। राजनीतिक सफलता राजनीतिक लक्ष्यों पर हावी हो गई। इसी प्रक्रिया में पार्टी बरबाद होती गई। अब वह ‘xÉ खुदा ही मिला न विसाले ºÉxɨɒ की हालत में है। रोगी की समझ में नहीं आ रहा है कि वह कुछ दिन अस्पताल में भर्ती हो कर अपना इलाज कराए या बदपरहेजी करते हुए अपनी सेहत और खराब कर ले। दूसरी ओर झुकाव अधिक प्रबल जान पड़ता है।
कहना न होगा कि भाजपा के पतन के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी कम जिम्मेदार नहीं है। संघ ने जब तय किया कि उसे राजनीति में भी घुसना है, तो उसे सोचना चाहिए था कि वह अपने मानस पुत्र का सार-संभाल कैसे करेगी। बगैर देखभाल के लड़के अकसर आवारा हो जाते हैं। भाजपा में जब आवारगी के लक्षण दिखाई देने लगे, तभी संघ को सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए थे। ऐसा लगता है कि संघ को भाजपा की जितनी चिंता करनी चाहिए थी, उसने नहीं की। इससे हालत धीरे-धीरे बिगड़ती गई। इतने बिगाड़ के बाद जो भी हस्तक्षेप होगा, वह कारगर होगा या नहीं, इसमें शक है।
उदाहरण के लिए दो मुद्दे लिए जा सकते हैं - गोवध और अंग्रेजी। साठ के दशक में भाजपा का पूर्वावतार जनसंघ हमेशा गोवध पर पाबंदी लगाने के पक्ष में रहता था। इसके लिए उसने आंदोलन भी किया। लेकिन अब उसे गोवध रोकने को सार्वजनिक मुद्दा बनाने से शरम आती है। गोविंदाचार्य का यह सवाल अनुत्तरित है कि भाजपा के शासन में गोमांस के निर्यात में वृद्धि क्यों हुई। चरित्रगत दृढ़ता की मांग यह थी कि भाजपा के नेता साफ-साफ कहते कि गोवध और गोमांस भोजन के बारे में हमारी राय बदल चुकी है। पर वे ऐसा कह नहीं सकते। दरअसल, उनकी राय बदली नहीं है। पर सत्ता की मजबूरियों के कारण उन्होंने इसकी परवाह करना छोड़ दिया था कि गायों का क्या होता है। कायदे से भाजपा के नेतृत्व की संवेदना का विकास होना चाहिए था और उन्हें गाय के साथ-साथ सभी जीव-जंतुओं के जीवित रहने के अधिकार का कायल हो जाना चाहिए था। भाजपा के गोमांस की बिक्री में वृद्धि के लिए नहीं, बल्कि शाकाहार आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए जाना जाना चाहिए था। मेरा अनुमान है, संघ के लोग शाकाहारी ही होंगे।
जहां तक अंग्रेजी विरोध का प्रश्न है, भाजपा ने इसे छोड़ कर अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारी है। एक जमाने में जनसंघ का मतलब था, ‘ʽþxnùÒ, हिन्दू, ʽþxnÖùºiÉÉxÉ’* आज भाजपा का कोई भी नेता हिन्दी का नाम तक नहीं लेता। उसके तथाकथित नायक अपनी किताबें अंग्रेजी में लिखते हैं। भाजपा ने हिन्दी का साथ इसलिए छोड़ा क्योंकि उसे हिन्दी प्रदेश के बाहर अपने पांव फैलाने थे। हिन्दी प्रदेश के बाहर फैलने की तमन्ना में कुछ भी गलत नहीं था, पर भाजपा को वहां अपने विचारों के साथ जाना चाहिए था -- अपने विचारों को छोड़ कर नहीं। वह दक्षिण भारत में हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ाने का उद्यम करती, तो उसे वोट पाने में समय लगता, पर लोग पार्टी को उसके वैचारिक आग्रहों के लिए जानते। फिलहाल तो उसे अवसरवाद के लिए जाना जाता है, जिसने केंद्र में सत्ता पाने के लिए कश्मीर, समान सिविल कानून आदि पर अपने मूल विश्वासों के साथ भी समझौता कर लिया। स्पष्ट है कि भाजपा जनादेश का तो क्या सम्मान करेगी, वह संघादेश को भी भूल-बिसरा चुकी है।
बहुत-से विचारक भाजपा को यह सलाह देते रहे हैं कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नकेल से अपने को छुड़ा ले और अपने द्वारा चुने हुए स्वतंत्र रास्ते पर चले। यही एक तरीका है जिससे देश की नंबर दो (श्लेष के लिए क्षमा करें) पार्टी सेकुलर बन सकती है। मेरी समझ में नहीं आता कि भाजपा के पुनर्निर्माण में सिर्फ एक ही अपेक्षा क्यों। सेकुलर होना तो एक न्यूनतम बात है। पर असली मामला चरित्र का है। चरित्ररहित हो जाने के बाद क्या तो सेकुलर और क्या तो नॉन-सेकुलर। वास्तविकता यही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मुक्त हो कर दिखाना भाजपा के लिए असंभव है। उसका सारा मजमा तो इसीलिए जुटा है कि वह सेकुलर नहीं है। सेकुलर होने का फैसला करनेवाली भाजपा में कितने नेता, कितने कार्यकर्ता रह जाएंगे? जब भैंस ही पानी में डूब जाएगी, तब उसकी दुम बचा कर क्या होगा?
यथार्थ और आदर्श, दोनों की मांग यह है कि भाजपा जैसी तंगदिल, तंगदिमाग पार्टियों का अस्तित्व होना ही नहीं चाहिए। इसलिए भाजपा को जो सर्वोत्तम सलाह दी जा सकती है, वह यह है कि वह अपने को सुपुर्दे-खाक कर दे। अगर उसमें यह हिम्मत नहीं है, तो उसके लिए दूसरा सर्वोत्तम विकल्प यह है कि वह अपने जन्मदाताओं की इच्छाओं का ध्यान करे और उनके अनुसार चलने की कोशिश करे। लेकिन क्या यह कोशिश सफल होगी? सफल इसलिए नहीं होगी कि संघ के जो आदर्श हैं, उनके आधार पर कोई जनतांत्रिक दल चलाना संभव नहीं है। 000
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चिरंतन प्रश्न
राजकिशोर
बलात्कार के हरजाने पर श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी और सुश्री मायावती के बीच जो कर्कश विवाद हुआ, वह चाहे कितना ही दुर्भाग्यपूर्ण हो, पर एक वास्तविक मुद्दे को सामने लाता है। कैसे? यह स्पष्ट करने के लिए मैं एक छोटी-सी कहानी सुनाना चाहता हूं। संभव है, यह एक लतीफा ही हो, पर है बहुत मानीखेज। एक अमीर आदमी ने किसी व्यक्ति पर जूता चला दिया था। उस पर अदालत में मुकदमा चला। जज ने जूता फेंकने वाले पर सौ रुपए का जुर्माना किया। इस पर उस अमीर आदमी ने अदालत में दो सौ रुपए जमा कर दिए और शिकायतकर्ता को वहीं खड़े-खड़े एक जूता और रसीद किया। फर्ज कीजिए कि जज ने अगर उसे हफ्ते भर जेल की सजा सुनाई होती, तब भी क्या उस धनी व्यक्ति ने शिकायतकर्ता को एक और जूता लगाया होता और अदालत से प्रार्थना की होती कि अब आप मुझे दो हफ्ते की जेल दे दीजिए?
हमारे देश में बलात्कार, सामूहिक हत्या, दुर्घटना आदि के बाद सरकार द्वारा रुपया बांटने की जो नई परंपरा शुरू हुई है, वह गरीब या दुर्घटनाग्रस्त लोगों में पैसे बांट कर अपना अपराधबोध कम करने और पीड़ितों के कष्ट को कम करने का तावीज बन कर रह गया है। दिल्ली में सिखों की सामूहिक हत्या के बाद भी पीड़ित परिवारवालों के लिए कुछ सुविधाओं की घोषणा की गई थी। लेकिन इससे उनके मन की आग शांत नहीं हुई है। हर साल उनकी ओर से जुलूस-धरने का आयोजन होता है कि हमें न्याय दो। पैसा देना न्याय नहीं है। यह आंसू पोंछना भी नहीं है। यह किसी की जुबान को खामोश करने के लिए उसे चांदी के जूते से मारना है।
पैसा लेना भी न्याय नहीं है। इंडियन पीनल कोड की बहुत-सी धाराओं में लिखा हुआ है कि इस अपराध के लिए कारावास या जुर्माना या दोमों से दंडित किया जाएगा। यहां तक कि बलात्कार, हत्या करने की चेष्टा, राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन, पूजा स्थल पर किए गए अपराध, मानहानि, अश्लील कार्य और गाने तथा ऐसे दर्जनों अपराधों के लिए भी कैद के अलावा या उसके साथ-साथ जुर्माने का भी प्रावधान है। यह कानून सन 1860 में बनाया गया था। इस पर सामंती न्याय प्रणाली की मनहूस छाया है। सामंती दौर में राजा जिससे कुपित हो जाता था, उसकी सारी संपत्ति जब्त कर लेता था, ताकि वह दर-दर का भिखारी हो जाए। ब्रिटिश भारत में और स्वतंत्र भारत में दंडित व्यक्ति से धन छीनने पर यह सामंती आग्रह बना रहा। अरे भाई, किसी ने अपराध किया है तो उसे सजा दो, उसके पैसे क्यों छीन रहे हो? राजाओं और सामंतों का पैसे के लिए लालच समझ में आता है। लूटपाट करने के लिए वे कहां से कहां पहुंच जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भी ऐसा ही किया। पर स्वतंत्र और लोकतांत्रिक भारत अपराधी से पैसे क्यों वसूल करता है?
जुर्माना लेने के पीछे जो भावना है, वही भावना आर्थिक हरजाना देने के पीछे है। किसी कारवाले ने धक्का दे कर मुझे गिरा दिया और फिर मेरी मुट्ठी में पांच सौ रुपए रख कर चल दिया। क्या इसे ही इनसाफ कहते हैं? ज्यादा संभावना यह है कि अदालत भी कारवाले को यही सजा देगी। यह कुछ ऐसी ही बात है कि एक भाई किसी लड़की के साथ बलात्कार करे और दूसरा भाई उसकी मुट्टी में कुछ नोट रखने के लिए वहां पहुंच जाए। यह शर्म की बात है कि अनुसूचित जातियों से संबंधित एक कानून में अनेक अपराधों के लिए सरकार द्वारा पैसा देने का प्रावधान है। यह गरीबी का अपमान है। कोई भी स्वाभिमानी आदमी ऐसे रुपए को छूना भी पसंद नहीं करेगा। जो रुपया दुनिया में अधिकांश अपराधों का जन्मदाता है, उसे ही अपराध-मुक्ति का औजार कैसे बनाया जा सकता है? हरजाना देने का मुद्दा तब बनता है जब अपराध के परिणामस्वरूप पीड़ित पक्ष की कमाने की क्षमता प्रभावित हो रही है। किसी व्यक्ति की हत्या हो जाने के बाद उसकी पत्नी, बच्चों तथा अन्य प्रभावित परिवारियों को आर्थिक सुरक्षा देना न्याय व्यवस्था तथा राज्य व्यवस्था दोनों का कर्तव्य है। दूसरी ओर, बलात्कार की वेदना और उससे जुड़े कलंक का कोई हरजाना नहीं हो सकता।
पुस्तकालय में किताब देर से लौटाना, देर से दफ्तर आना, गलत जगह गाड़ी पार्क कर देना – ऐसी छोटी-मोटी गड़बड़ियों के लिए जुर्माना ठीक है। इसका लक्ष्य होता है ऐसी चीजों को निरुत्साहित करना। लेकिन जिस हरकत से किसी को या सभी को नुकसान पहुंचता है या नुकसान पहुंच सकता है, उसके लिए तो कारावास ही उचित दंड है। दिल्ली में कानून द्वारा निर्धारित स्पीड से ज्यादा तेज गाड़ी चलाने की सजा पांच सौ रुपए या ऐसा ही कुछ है। यह न्याय व्यवस्था सड़क पर चलनेवालों का अपमान है। जिस कृत्य से एक की या कइयों की जान जा सकती है, उसके लिए तो कुछ दिनों के लिए जेल की मेहमानी ही उचित पुरस्कार है। जब बलात्कार या ऐसे किसी अपराध अथवा दुर्घटना के लिए सरकार पीड़ितों में पैसा बांटती है, तो वह दरअसल अपने पर ही जुर्माना ठोंकती है। कायदे से सराकार को अपने को दंड़ित करना चाहिए यानी जिस सरकारी कर्मचारी की गफलत से ऐसा हुआ है, उसके खिलाफ मुकदमा चलाना चाहिए। यह एक मुश्किल काम है, क्योंकि हर सरकार अपने कर्मचारियों का बचाव करने की कोशिश करती है। इससे आसान है जनता के खजाने से थोड़ी रकम निकाल कर पीड़ित को दे देना। यह रकम अगर मंत्रियों और अफसरों की जेब से वसूल की जाती, तब भी कोई बात थी। 000
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Sunday, August 30, 2009
चलो नास्तिक बनें
नास्तिकों की बस
राजकिशोर
दोस्तोएवॉस्की ने कहा था कि अगर ईश्वर नहीं है, तो हमें उसका आविष्कार करना होगा, नहीं तो हर कोई हर कुछ करने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। इस महान रूसी लेखक की मृत्यु के 130 साल बाद भी नास्तिक इससे सहमत नहीं हो पाए हैं। बल्कि पिछले कुछ वर्षों से उनकी गतिविधियां कुछ तेज हुई हैं। इसके पीछे रिचर्ड डॉकिन्स की पुस्तक ‘द गॉड डेल्यूजन’ नाम की अत्यंत पठनीय किताब की भी कुछ भूमिका हो सकती है। यह किताब पहली बार 2006 में प्रकाशित हुई थी और तब से लगातार इंटरनेशनल बेस्टसेलर बनी हुई है। यह ईश्वर के अस्तित्व को आदमी की खामखयाली साबित करनेवाली दर्जनों पुस्तकों की सिरमौर है। मेरे पास पैसा होता, तो मैं इस पुस्तक का अनुवाद संसार की हर भाषा में करवाता और आधी कीमत पर लोगों को उपलब्ध करवाता। दिलचस्प यह है कि इस पुस्तक की एक प्रति मुझे इंग्लैंड के एक पादरी ने उपहारस्वरूप भिजवाई थी। उन्हें पता है कि मैं नास्तिक हूं। फिर भी उन्होंने मेरे लिए यही किताब चुनी तो इसे उनकी विनोद वृत्ति का ही उदाहरण मानना चाहिए। इससे उनकी यह आश्वस्ति भी झलकती है कि ऐसी किताबें ईश्वर का क्या बिगाड़ लेंगी!
नास्तिक भी इस बात को जानते हैं। इसलिए वे नास्तिकता का प्रचार-प्रसार करने के लिए दूसरे रास्ते खोजने लगे हैं। ब्रिटेन में नास्तिकों की एक संस्था ने शहर भर की बसों में यह नारा पेंट करवा दिया है -- ईश्वर शायद नहीं है। इसलिए चिंता करना छोड़ें और अपने जीवन का आनंद लें। (यहां शायद अंग्रेजी के परैप्स का नहीं, प्रोबेबली का अनुवाद है।) इस अभियान के लिए जितने चंदे की उम्मीद की गई थी, उससे ज्यादा पैसा आया। लंदन में यह अभियान इतना जबरदस्त साबित हुआ कि यूरोप के दूसरे देशों जर्मनी, इटली, फिनलैंड, स्पेन आदि तथा में भी नास्तिक बसें दिखाई देने लगीं। संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ शहरों में भी ये बसें चलीं, पर कनाडा की सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। अब नास्तिकों की यह संस्था इस अभियान के लिए चंदा नहीं ले रही है। उसने एक व्यापक मानववादी अभियान की योजना बनाई है, जिसके लिए 50,000 पाउंड चंदा जमा करने का लक्ष्य तय किया गया है। अभी तक करीब 10,000 पाउंड प्राप्त हो चुका है।
हो सकता है, भारत के कुछ उदार लोग भी इन चंदादाताओं में हों। ऐसे लोगों से और उनसे जिनके पास सार्वजनिक कामों पर खर्च करने के लिए पैसा है, मैं निवेदन करूंगा कि वे भारत में भी ऐसे विज्ञापन प्रकाशित करने की ओर ध्यान दें। भारत में नास्तिकता की बहस एक जमाने में बहुत गंभीरता से शुरू हुई थी। तब के कम्युनिस्ट सचमुच नास्तिक होते थे और यह साबित करने के लिए वे बहुत कुछ करते थे तथा कुछ और भी करने के लिए तैयार रहते थे। पर अब वे अपने वोटरों को नाराज नहीं करना चाहते और मूर्ति पूजा के धार्मिक आयोजनों में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं। ध्यान देने की बात है कि मूर्ति पूजा का विरोध ऐसे लोग भी करते आए हैं जो परम आस्तिक थे। जैसे स्वामी दयानंद। स्वयं महात्मा गांधी ने न कभी मूर्ति पूजा में दिलचस्पी दिखाई और न इसे प्रोत्साहित किया। यह हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू घोषित रूप से नास्तिक थे। लेकिन स्वयं उनके परिवार में भी यह परंपरा नहीं बन पाई। भगत सिंह एकमात्र क्रांतिकारी थे, जिन्होंने हिम्मत के साथ ‘¨मैं नास्तिक क्यों हूं’ जैसी ताकतवर पुस्तिका लिखी। यह पुस्तिका पिछले तीस सालों से बार-बार छापी जाती रही है। दुख इस बात का है कि भगत सिंह के इस घोषणापत्र का जैसा असर होना चाहिए था, वह दिखाई नहीं पड़ रहा है। भारत जैसे-जैसे परिपक्व हो रहा है, उसके प्रबुद्ध नागरिक धार्मिक कर्मकांडों में उतना ही ज्यादा शामिल हो रहे है। इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रक्रिया को चुनौती देने के लिए नास्तिकता के पक्ष में कैंपेन चलना आवश्यक लगता है।
जब यूरोपीय समाज जैसे तर्कशील और जाग्रत समुदाय में ईश्वर का बोलबाला बना हुआ है और वहां के लोगों को नास्तिकता की बस जैसे अभियान चलाने की जरूरत महसूस हो रही है, तो भारत की तो बात ही क्या है! यहां तो लोग आज भी अपने ‘ दैहिक, दैविक, भौतिक’ ताप शांत करने के लिए धर्मगुरुओं के सुझाव पर बंदरों को केला और गायों को गुड़ खिलाते हैं, शनि महाराज की पूजा करते हैं और दरगाहों पर चादर चढ़ाते हैं। मजे की बात है कि इस वर्ग में शिक्षित, बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक भी शामिल हैं। मकान की नींव रखते समय तो शिला पूजन और कोई बड़ा वैज्ञानिक प्रयोग करने के पहले नारियल फोड़ना वगैरह तो सरकार के तत्वावधान में भी होता है। इस समय भारतीयों के जीवन में पंचांग और ज्योतिष का दखल जितना बढ़ गया है, उतना शायद पहले कभी नहीं रहा होगा। ऐसी स्थिति में वास्तविक रूप से शिक्षित तथा चिंतनशील वर्ग का कर्तव्य क्या है, क्या यह दुहराने की जरूरत है?
मेरा अपना मानना यह है कि ईश्वर है या नहीं, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर वह है भी, तो उससे हमें कोई सहायता नहीं मिलती, क्योंकि दी हुई परिस्थिति का सामना तो हमें अपनी बुद्धि और संसाधनों से ही करना होता है। ईश्वर नहीं हो, तो अपने पुरुषार्थ पर हमारा भरोसा अपने आप बढ़ जाता है। जहां तक ईश्वर को प्रसन्न करके कुछ प्राप्त करने या अपने कर्मों के परिणामों से बचने की जुगत का सवाल है, तो इस मामले में हमारे समय के सबसे महान आस्तिक महात्मा गांधी की राय मुझे बहुत भाती है। उनका कहना था कि मैं कभी नहीं चाहूंगा कि मुझसे खुश हो कर ईश्वर मुझे मेरे कर्मों की सजा न दे। जो भक्ति से प्रसन्न हो कर अपने नियम तोड़ने के लिए जाना जाता हो, ऐसे ईश्वर से यह उम्मीद कौन कर सकता है कि वह सृष्टि का संचालन न्यायपूर्वक कर रहा होगा? 000
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प्रेम की विडंबनाएँ
राजकिशोर
जैसे उत्तर भारत के समाज को समझने के लिए प्रेमचंद को बार-बार पढ़ने की जरूरत है, वैसे ही स्त्री-पुरुष संबंध के यथार्थ पर विचार करने के लिए शरत चंद्र को बार-बार पढ़ना चाहिए। हाल ही में शरत बाबू का अंतिम उपन्यास शेष प्रश्न पढ़ने का अवसर मिला, तो मेरे दिमाग में तूफान-सा आ गया। स्त्री-पुरुष संबंध का शायद ही कोई आयाम हो जिस पर इस विचार-प्रधान, पर अत्यंत पठनीय उपन्यास में कुछ न कुछ नहीं कहा गया हो। और, जो भी कहा गया है, वह इतना ठोस है कि आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना 1931 में, जब यह पहली बार प्रकाशित हुआ था। हैरत होती है कि हिन्दी की स्त्रीवादी लेखिकाएँ शरत चंद्र को उद्धृत क्यों नहीं करतीं। क्या इसलिए कि वे स्त्री नहीं, पुरुष थे ?
जिस एक बिन्दु पर शरत चंद्र की स्थापना सबसे ज्यादा उत्तेजक है, वह है एकनिष्ठता का मुद्दा। लगभग सारी संस्कृतियाँ स्त्री-पुरुष संबंधों में एकनिष्ठता की कायल रही हैं। ईसाई समाजों ने तो इसे कानून की शक्ल भी दे दी, जिसका अनुकरण दूसरे समाज कर रहे हैं। बहरहाल, एकविवाह प्रणाली और एकनिष्ठता में फर्क है। एकविवाह प्रणाली एक समय में एक ही संबंध की पक्षधर है। लेकिन इसमें एक संबंध के टूट जाने पर नया संबंध करने पर रोक नहीं है। इस तरह, कोई स्त्री या पुरुष, हर विवाह में वफादारी निभाते हुए भी, एक के बाद एक असंख्य विवाह कर सकता है। इसीलिए इसे क्रमिक बहुविवाह कहा जाता है। एकनिष्ठता कुछ अलग ही चीज है। इसका सहोदर शब्द है, अनन्यता। कोई स्त्री या पुरुष जब अपने प्रेम पात्र के साथ इतनी शिद्दत से बँध जाए कि न केवल उसके जीवन काल में, बल्कि उसके गुजर जाने के बाद भी कोई अन्य पुरुष या स्त्री उसे आकर्षित न कर सके, तो इस भाव स्थिति को अनन्यता कहा जाएगा। यही एकनिष्ठता है। आज भी इसे एक महान गुण माना जाता है और ऐसे व्यक्तियों की पूजा होती है।
हैरत की बात यह है कि शेष प्रश्न की नायिका कमल, जो लेखक की बौद्धिक प्रतिनिधि है, एकनिष्ठता के मूल्य को चुनौती देती है। उसकी नजर में, यह एक तथ्यहीन, विचारहीन, मूर्खतापूर्ण, जड़ परंपरा का अवशेष है जिसे प्लेग के चूहे की तरह तुरंत घर से बाहर फेंक देना चाहिए। यह प्रसंग उठता है शेष प्रश्न के एक प्रमुख पात्र आशुतोष गुप्त की अपनी मृत पत्नी के प्रति एकनिष्ठता की तीव्र भावना से। जब कमल यह घोषित करती है कि नर-नारी के प्रेम व्यापार में अनन्यता को मैं न आदर्श मानती हूं और न ही इसे अतिरिक्त महत्व देती हूँ, तो वयोवृद्ध आशु बाबू विचलित हो जाते हैं। वे कमल से कहते हैं, ‘कमल, तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो। मैं पाप-पुण्य की बात नहीं करता, फिर भी सत्य यह है कि मेरे लिए मणि की माँ के स्थान पर किसी दूसरी स्त्री को अपनाने की सोचना तक संभव नहीं।’ कमल का उत्तर चौंकानेवाला है। वह कहती है, इसका कारण यह है कि आप बूढ़े हो गए हैं।
आशु बाबू बूढ़े हो चुके हैं ? हाँ, वे आज बूढ़े जरूर हैं, पर उस समय तो वे बूढ़े नहीं थे, जब उनकी हृदयेश्वरी चल बसी थी। कमल का कहना है कि दरअसल, वे उस समय भी तन से भले ही बूढ़े न रहे हों, मन से पक्के बूढ़े थे। कमल की नजर में बुढ़ापे की परिभाषा यह है : ‘मेरी दृष्टि में ‘सामने की ओर न देख पाना ही मन का बुढ़ापा है। हारे-थके मन द्वारा भविष्य के सुखों, आशाओं, और आकांक्षाओं की उपेक्षा करके अतीत में रमने को, कुछ पाने की इच्छा न रखने को, वर्तमान को एकदम नकारने को और भविष्य को निरर्थक समझने को मैं मन का बुढ़ापा मानती हूँ। अतीत को सब कुछ समझना, भोगे हुए सुख-दुखों की स्मृति को ही अमूल्य पूँजी मान कर उसके सहारे शेष जीवन जीना ही मन का बुढ़ापा है। ’ उपन्यास के आखिरी पन्ने तक आशु बाबू अपने बारे में इस विश्लेषण से सहमत नहीं हो पाते। कमल से उनके अंतिम शब्द ये हैं : ‘कमल, तुम मणि की माँ के प्रति मेरे आज तक चल रहे अविच्छिन्न बंधन को मोह का नाम दोगी, इसे मेरी दुर्बलता का नाम दे कर मेरा उपहास करोगी, किन्तु जिस दिन यह मोह जाता रहेगा, उस दिन मनुष्य का और भी बहुत कुछ नष्ट हो जाएगा। इस मोह को भी तपस्या का फल समझना, बेटी। ’
ऐसा लगता है कि खुद शरत चंद्र एकनिष्ठता की पहली को सुलझा नहीं सके थे। यह आदर्श उन्हें उलझन में डालता था तो कहीं से मोहित भी करता था। शेष प्रश्न में दो अनन्य प्रेमी युगल अपना पार्टनर बदल लेते हैं। लेकिन आशु बाबू के अदम्य प्रेम का दीपक पूरी पुस्तक में जलता रहता है। कमल के लिए यह कितना ही अस्वाभाविक हो, आशु बाबू के लिए यही स्वाभाविक है। जब उसका पुराना साथी शिवनाथ उसे छोड़ देता है और दूसरी स्त्री को अपना लेता है, तो वह दुखी होती है, पर सती होना उसे कबूल नहीं है। वह अपने हृदय की खाली जगह एक अन्य पुरुष से भर लेती है।
इस मंथन से निष्कर्ष यह निकलता दिखाई देता है कि किसी से एकनिष्ठता की माँग करना नैतिक नहीं है। प्रेम पैदा होता है, तो मर भी सकता है। लेकिन अगर किसी ने एकनिष्ठता का जीवन चुना है, तो उसे बौड़म या ठहरा हुआ क्यों मान लिया जाए? सबको अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है। एक तरीका किसी को ठीक लगता है, तो इससे दूसरा तरीका अपने आप बुरा नहीं हो जाता। 000
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Wednesday, June 24, 2009
माओवादियों पर पाबंदी
लालगढ़ के बाद क्या
लालगढ़ को सशस्त्र बल द्वारा मुक्त कराना मेरी एक पुरानी धारणा की पुष्टि करता है। बहुत दिनों से मुझे यह लग रहा है कि अगर देश के भीतर कोई क्षेत्र मुक्तांचल बन जाता है, जहां न पुलिस की चलती है न प्रशासन की, तो इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य और केंद्र सरकारें उस क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहतीं। यह मुक्तांचल चाहें नक्सलवादियों द्वारा स्थापित किया गया हो, चाहे गुंडा तंत्र द्वारा अथवा किसी डकैत गिरोह द्वारा। राज्य चाहे तो ऐसे किसी भी क्षेत्र को दो-चार दिनों से ले कर महीने-दो महीने तक की गंभीर कार्रवाई में भारतीय संविधान के दायरे में ला सकता है। इस धारणा के समर्थन में सबसे पहले वीरप्पन का नाम लिया जाना चाहिए, जो लंबे समय तक कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में बिना किसी चुनौती के अपना राज चलाता रहा। जब उसकी उपस्थिति राज्य के लिए सचमुच असह्य हो गई, तो उसे मारने में महीना भर भी नहीं लगा। हाल में हुई इस तरह की घटना चित्रकूट में बहुत समय से मनमानी कर रहे डाकू घनश्याम केवट को घेर कर उसका एनकउंटर है। केवट वीरप्पन जैसा महाबली नहीं था। फिर भी उसे तब तक बरदाश्त किया जाता रहै जब तक राज्य सरकार के लिए वह असह्य नहीं हो गया। चाहे जिस कारण से भी हो, लालगढ़ की स्वायत्तता के तब तक सहन किया गया जब तक यह राजनीतिक नजरिए से ठीक था। जब मामला जीरो टॉलरेंस के दायरे में आ गया, तब राज्य सरकार ने केंद्रीय बलों की सहायता से कई दिनों में ही वारा-न्यारा कर दिया।
सवाल लाजिम है कि सरकारों में हिंसा और आतंकवाद द्वारा स्थापित मुक्तांचलों के प्रति यह उदासीनता क्यों देखी जाती है। जब कुछ सौ प्रदर्शनकारी अपनी लोकतांत्रिक मांगों के समर्थन में छोटा-मोटा जुलूस निकालते हैं, तो यह राज्य को अपने लिए एक बड़ी चुनौती प्रतीत होती है और क्रूर दमन का फैसला करते हुए उसे कुछ मिनट भी नहीं लगते। वरुण गांधी जैसा छोटा-मोटा और नया-नया खिलाड़ी जब कुछ उत्तेजक भाषण देता है, तो राज्य सरकार को वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक लगने लगता है। बताते हैं कि देश का एक उल्लेखनीय हिस्सा नक्सलवादी प्रभाव में है। पर इस प्रभाव को खत्म करने के लिए न तो राज्य सरकारें परेशान हैं और न केंद्र सरकार। माजरा क्या है?
माजरा यह है कि ये सभी इलाकें भारतीय राज्य के लिए फालतू इलाके हैं जहां से न तो कुछ राजस्व मिलता है और न इससे कुछ फर्क पड़ता है कि इन इलाकों पर किसका कब्जा है। ये इलाके दरअसल राज्य के लिए एक बोझ हैं, क्योंकि वहां की जावन स्थितियों को बेहतर करने के लिए राज्य को सिर्फ खर्च ही खर्च करना है। जो गाय दूध नहीं देती, उसे फालतू में एक्स्ट्रा चारा खिलाते रहने में कौन-सी बुद्धिमानी है? इसलिए राज्य का नजरिया यह रहा है कि यहां चाहे जिसका राज हो, हमें क्या मतलब? राज्य तब थोड़ी-बहुत कार्रवाई करने के लिए विवश हो जाता है जब हिंसा की चिनगारियां उसके खास लोगों तक पहुंचने लगती हैं। लालगढ़ भी ऐसा ही इलाका है, जहां भूख और वस्त्रहीनता का स्थायी वातावरण रहा है। जब लालगढ़ की चिनगारियां दूर तक पहुंचीं और प. बंगाल के मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री को बारूदी सुरंगों के ऊपर से गुजरना पड़ा, तब कुछ करना जरूरी हो गया। लालगढ़ की एक खूबी यह भी थी कि वहां मार्क्सवाद की ही एक और धारा प्रभावशाली होने लगी थी और सवाल यह पैदा हो गया था कि आज लालगढ़ तो कल बंगालगढ़। यह ओम (ऑफिशियल मार्क्सवाद) को कैसे बर्दाश्त हो सकता था?
लालगढ़ के बाद उचित कदम यह था कि देश के अन्य नक्सल-प्रभावित इलाकों को भी आजाद कराने का उपक्रम शुरू कर दिया जाता। छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और बिहार की सरकारें, अपनी-अपनी बुद्धि और आवश्यकता के अनुसार इस दिशा में कोशिश करती आ रही हैं। इस कोशिश के चलते आंध्र प्रदेश सरकार को थोड़ी शाबाशी मिली है, छत्तीसगढ़ सरकार को काफी बदनामी झेलनी पड़ी है और बिहार सरकार के बारे में कोई धारणा नहीं बनाई जा सकी है, क्योंकि वहां नक्सलवाद का दमन अभी शैशवावस्था में है। उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड, मध्य प्रदेश आदि की सरकारें अभी भी उदासीनता के उसकी स्टेज में हैं जिसका जिक्र उपर किया गया है। यह केंद्र सरकार का राजनैतिक और नैतिक, दोनों प्रकार का कर्तव्य था कि वह देश भर में राजनीतिक चेतना जाग्रत कर और प्रभावित राज्यों की सरकारों से संवाद कर एक बृहत कार्रवाई प्रारंभ कर देती। राष्ट्रपति जी ने मनमोहन सिंह की इस सरकार की प्राथमिकताओं की घोषणा करते हुए पहले सौ दिनों का जो कार्यक्रम बताया था, उसमें नक्सलवाद की चुनौती का सामना करना भी था।
लालगढ़ में केंद्र सरकार की सशस्त्र कार्रवाई की सफाई देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बताया कि प. बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को केंद्रीय बलों की मांग के लिए पत्र लिखे जाने पर अर्धसैनिक बलों को रवाना किया गया। तो क्या जब तक कोई राज्य सरकार नक्सलवाद का सफाया करने के लिए केंद्र से अर्धसैनिक सहयोग नहीं मांगेगी, तब तक केंद्र इस समस्या से मुंह मोड़े रहेगा? क्या नक्सल-प्रभावित इलाके सिर्फ राज्य सरकार की जिम्मेदारी हैं ? वहां केंद्र की कोई संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है? क्या केंद्र इन राज्य सरकारों से यह नहीं कह सकता कि अगर आप इन इलाकों में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते, तो मजबूर हो कर हमें यह काम करना पड़ेगा?
नहीं, केंद्र ऐसा नहीं करेगा, क्योंकि उसे इस तरह की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। उसके लिए इतना ही काफी है कि नक्सल-प्रभावित इलाके उसके लिए कोई चुनौती न बनें। लेकिन केंद्र को यह दिखाना पड़ता है कि हम किसी राज्य विशेष के साथ पक्षपात नहीं करते। हमारे लिए तो सभी राज्य सरकारें बराबर हैं। यह साबित करने के लिए ही माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया गया है। माओवादियों को या उनसे राजनीतिक सहानुभूति रखनेवालों को इससे बहुत चिंतित होने की जरूरत नहीं है। यह तो सिर्फ एक कानून है। अगर कानून बनाने से ही सब कुछ हो जाता, तो देश भर में दलित उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, वेश्यागमन, दहेज हत्याएं, बलात्कार, तस्करी, भिक्षावृत्ति, गुंडागर्दी, रंगदारी, टैक्स चोरी आदि कभी के रुक जाते। इस नए प्रतिबंध से होगा यह कि राज्य सरकारों को कुछ और अधिकार मिल जाएंगे, जिनका इस्तेमाल बिनायक सेन जैसे भले आदमियों को परेशान करने में हो सकता है। राज्य सरकारें चाहतीं, मेरा मतलब है सचमुच चाहतीं, तो इस प्रतिबंधक कानून के बगैर भी माओवादियों को संविधान के दायरे में ला सकती थीं। इसलिए अगर कोई पूछता है कि लालगंज के बाद क्या, तो जवाब हाजिर है, ठेंगा!
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बिजनेस में बेईमानी
उनके हिस्से का झूठ
राजकिशोर
पैसा, पैसा, पैसा। बिजनेस, बिजनेस, बिजनेस। और कोई चाह नहीं, और किसी चीज की फिक्र नहीं, और कोई बढ़त नहीं। सरकार तटस्थ, निष्क्रिय और बेपरवाह। कोई देखने-भालनेवाला नहीं। कोई सुननेवाला नहीं। जो बोलेगा, वह मारा जाएगा।
यही सबक है हमारी शिमला यात्रा का। जब मेरी मसें नहीं भीगी थीं, हाई स्कूल में अंग्रेजी के परचे के लिए एक निबंध खूब पढ़ा-पढ़ाया जाता था - ट्रैवेल एज ए पार्ट ऑफ एडुकेशन। पर्यटन -- शिक्षा के अंग के रूप में। तब तो नहीं, पर पिछले कई सालों से जब भी यात्रा करता हूं, देश और समाज के बारे में कुछ न कुछ नया जानने को जरूर मिलता है। पिछली बार मुजफ्फरपुर गया था, तो एक ऐसे टीटी से टकरा गया जो रोज हजार-दो हजार एक्स्ट्रा कमा कर घर लौटने के लिए प्रतिबद्ध था। लौट कर उसके व्यवहार के बारे में एक अखबार में लिखा, तो वह सस्पेंड हो गया। अभी जो लिखने जा रहा हूं, उसके बारे में ऐसा कोई भरोसा नहीं है।
शिमला के पास कुफ्री नाम की एक जगह है, जहां पहाड़ की चोटी पर जा कर चारों ओर का दृश्य देखने के लिए घोड़े पर जाना पड़ता है। वहां मैं पिटते-पिटते बचा (ऐसे मौके कई बार आ चुके हैं, इसलिए मैं उत्तेजित नहीं हुआ।) हुआ यह कि एक घोड़ेवाला एक दक्षिण भारतीय जोड़े को घोड़े के एक ट्रिप की कीमत तीन सौ रुपए बता रहा था। मेरी बेटी अस्मिता ने दो सौ रुपए पर घोड़े की सेवाएं ली थीं। यह बात मैंने उस युगल को इसलिए बता दी, ताकि उसका शोषण न हो सके। इस पर आसपास मंडरा रहे सभी घोड़ेवाले बिदक गए और मुझे शर्मिंदा करने और धमकाने लगे – तू बीच में क्यों बोलता है? हमारा बिजनेस क्यों खराब करता है? अपना-सा मुंह ले कर किराए पर ली गई कार में आ बैठा, तो एक घोड़ेवाला मेरे पास आया और बोला -- आपको दखल देने की जरूरत क्या थी? अगर आप बुजुर्ग नहीं होते, तो जरूर पिट जाते। फिर कभी ऐसा मत करना। हमारे ड्राइवर के साथी एक ड्राइवर ने बिन मांगी सीख दी -- आखिर उनके बिजनेस का सवाल है। आप भी कोई बिजनेस करते होंगे। बिजनेस में झूठ तो बोलना ही पड़ता है। आप भी अपने बिजनेस में झूठ बोलते होंगे। मुझे एक बार फिर शर्मिंदा होने का अवसर मुहैया कराया गया।
कुफ्री से लौटते हुए मेरे मन में खयाल आया कि सरकार ने अगर वहां एक तख्ती टांग दी होती कि एक घोड़े का उपयोक्ता शुल्क दो सौ या ढाई सौ रुपए है, तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होती। जिसको जाना होता, वह निश्चित शुल्क अदा करता और उचक कर घोड़े पर बैठ जाता। कुफ्री में जहां यह सौदा होता है, जगह बहुत कम है और गाड़ियां एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था होती रहती हैं। इस अराजकता को नियंत्रित करने के लिए वहां कई पुलिसवाले तत्पर रहते हैं। पर यात्रियों का शोषण न हो और घोड़ों के हर ट्रिप के लिए संकोची और स्मार्ट, दोनों को एक ही किराया देना पड़े, यह देखने के लिए सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं था। जाहिर है, सरकार भी इस सिद्धांत से सहमत है कि बिजनेस के मामले में दखल नहीं देना चाहिए। इस पर राष्ट्रीय सर्वसहमति है।
दिल्ली के महाराणा प्रताप बस अड्डे पर, जिसे सभी अज्ञानवश अभी भी आईएसबीटी कहते हैं, लौटना रात के चार बजे हुआ। जैसे तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं (यह मुझ पर हिन्दी अखबारों की भाषा पर असर है) के उतरते ही पंडों में युद्ध छिड़ जाता है कि यह शिकार मेरा है, वैसे ही बस से उतरते ही ऑटोवालों में हमें ले कर प्रतिद्वंद्विता शुरू हो गई। यह देख कर खुशी हुई कि रात के इतने बजे भी ऑटोवाले यात्रियों को अपनी सेवा प्रदान करने के लिए इंतजाररत (संपादक जी, कृपया न बदलें) रहते हैं। पर इस संसार का अकाट्य नियम यह है कि हर खुशी क्षणिक होती है। अगले कुछ क्षणों में पता चला कि कोई हमें साढ़े तीन सौ रुपए में हमारे घर पहुंचाने के लिए व्यग्र था, तो किसी को इसके लिए सिर्फ तीन सौ रुपए की मुद्रा चाहिए थी। युवा बेटी ने फैसला सुनाया कि हमें प्री-पेड बूथ से ही ऑटो करना चाहिए। हम पांच थे, असलिए हमें दो ऑटो करने थे। यह सुनते ही एक ऑटोवाले ने बताया कि प्री-पेड में एक ऑटो के एक सौ पचहत्तर लगते हैं। मेरी जिज्ञासा वृत्ति प्रबल हो गई। मैंने पूछा -- अगर इससे कम रकम पर वहां ऑटो मिलता हो, तो? आप कहीं झूठ तो नहीं बोल रहे हैं? इस पर उस समकालीन इतिहासकार ने कहा – झूठ कौन नहीं बोलता? हर धंधे में झूठ बोलना पड़ता है। प्री-पेड बूथ पर इसके साक्ष्य मिल गए। एक ऑटो के लिए मात्र एक सौ बीस रुपए का त्याग अपेक्षित था।
क्या यहां भी किसी पुलिसवाले को तैनात नहीं किया जा सकता था, ताकि वह थाने में बलात्कार वगैरह करने के बदले ऑटोवालों को मीटर पर चलने का कानून याद दिलाता रहे? 000
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Friday, June 12, 2009
आज का मुद्दा
राजकिशोर
गिरे हुए घोड़े को पीटना न तो साहस की बात है और न बुद्धिमानी की। मार्क्सवाद की आलोचना पढ़ते समय अकसर मुझे यही मुहावरा याद आता है। सोवियत संघ में साम्यवादी व्ययस्था के भंग होने और स्वयं संघ के छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद मार्क्सवाद दुर्गति को प्राप्त एक विचार-व्यवस्था है। उसके बाद लोगों को चीन से थोड़ी उम्मीद रह गई थी, लेकिन उसने भी सर्वग्रासी पूंजीवाद के सामने घुटने टेक दिए। साम्यवादी व्यवस्था के अन्य छोटे-मोटे केंद्रों में तानाशाही बची है, साम्यवाद गायब है। जहां तक भारत के मार्क्सवादियों का सवाल है, उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत ही नहीं पड़ी। स्वयं उनका ऐसा कोई आग्रह नहीं था। अगर होता, तो पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार, जो व्यवहार में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ही सरकार है, इतने दिनों तक टिकी नहीं रह सकती थी। केरल और त्रिपुरा पर भी यही तर्क लागू होता है। जब मार्क्सवादियों से खतरा महसूस होता था, तब केरल में उनकी पहली सरकार को कुछ ही महीनों बाद, बिना किसी लोकतांत्रिक ग्लानि के, गिरा दिया गया था। उससे हमारे मार्क्सवादियों ने यह सीख ली कि सिद्धांत और सत्ता के बीच चुनाव हो, तो सत्ता को ही चुनना चाहिए। इसके पहले उन्होंने तेलंगाना में सरकारी दमन का थोड़ा-सा अनुभव होते ही ‘क्रांति के लिए हिंसा’ का सिद्धांत त्याग दिया था।
अब नक्सलवादी समूह ही इस नीति पर टिके हुए हैं। लेकिन उनका प्रभाव चाहे जितने जिलों में बढ़ जाए, किसी को भी यह विश्वास नहीं है कि वे कभी भारत की केंद्रीय सत्ता पर या किसी राज्य पर नियंत्रण हासिल कर सकते हैं। अपने प्रभाव क्षेत्रों में भी उन्होंने कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई है जिससे साम्यवाद के बुनियादी मूल्यों की झलक मिल सके। नेपाल में, सुनते हैं, कम्युनिज्म का बहुत जोर है। लेकिन हाल ही में उसके सबसे बड़े या काफी बड़े नेता प्रचंड के बारे में जो कुछ पढ़ने को मिला – कि उनकी कलाई में दो लाख रुपए की राडो घड़ी बंधी होती है, कि वे एक बहुत मंहगी कार में चलते हैं, कि उनकी कार के पीछे कारों का एक काफिला चलता है, कि उनका वजन कुछ ही समय में बीस किलोग्राम बढ़ गया है, कि वे रोज शाम को महंगी शराब पीते हैं -- उससे यह यकीन नहीं होता कि नेपाल में साम्यवादी व्यवस्था कायम हो सकती है। या, जो साम्यवादी व्यवस्था कायम होगी, वह साम्यवादी ही होगी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार आदि देशों में तो कम्युनिज्म का सपना देखनेवाले भी कुछ हजार की संख्या में ही होंगे। इस तरह, दूर देखें या नजदीक साम्यवाद का कोई भविष्य नजर नहीं आता। और, यह अच्छा ही है। जिस तरह के साम्यवादों से हमारा पाला पड़ता रहा है, उसका कोई भविष्य होना मानव अधिकारों का कोई भविष्य नहीं होना है। साम्यवाद रहे या जाए, मानव अधिकारों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। कोई भी वाद मनुष्य से बड़ा नहीं है।
भारत में या शायद दुनिया भर में ही समाजवादियों और मार्क्सवादियों के बीच आपसी व्यर्थ का झगड़ा चलता रहा है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ बहुत बड़े समाजवादी थे। लेकिन मार्क्सवादियों के साथ उनकी कभी नहीं पटी। राममनोहर लोहिया एशियाई देशों के सबसे ऊंचे समाजवादी थे, पर साम्यवाद को वे हमेशा संदेह की निगाह से देखते रहे। दूसरी ओर, मार्क्सवादी समाजवादियों पर लगातार हमला करते रहे हैं। इसकी शुरुआत मार्क्स के समय में ही हो गई थी। वे अपने समाजवाद को छोड़ कर, जो उनकी निगाह में एकमात्र वैज्ञानिक समाजवाद था, समाजवाद की बाकी विचारधाराओं को यूटोपियाई मानते थे। आज तक यह परंपरा चली आ रही है। मेरा प्रस्ताव है कि बदली हुई परिस्थिति में अब तो दोनों को ही आपसी भेदभाव का त्याग कर देना चाहिए। विश्वीकरण के परिणामस्वरूप आज दुनिया भर में समता के प्रत्येक विचार पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। आर्थिक तथा अन्य प्रकार की विषमताओं को ही मानवता के लिए वरेण्य माना जा रहा है। समता की अवधारणा किसी भी प्रकार के सामंतवाद या पूंजीवाद को स्वीकार या बर्दाश्त नहीं कर सकती।
दुख की बात यह है कि समाजवादी शायद इस प्रकार के गंठबंधन या संयुक्त मोर्चा को स्वीकार भी कर लें, मार्क्सवादी ऐसा नहीं होने देंगे। वे एक ऐसी श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित रहते हैं जो उन्हें किसी भी वैचारिक समुदाय में अलग-थलग बनाए रखती है। वे सोचते हैं कि दुनिया की आधी बुद्धि उनके पास है और बाकी आधी में दूसरों का साझा है। या शायद, वे ही बुद्धिमान और नि:स्वार्थ हैं और बाकी सब मूर्ख और निहित स्वार्थवाले हैं। सभी पंडितों ने कहा है कि ज्ञानी को विनम्र होना चाहिए – विद्या ददाति विनयं। मेरा खयाल है, आधुनिक विद्वान भी इससे असहमत नहीं होंगे। वे जान गए हैं कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और कोई भी ज्ञान संदिग्ध हो सकता हैै। मेरा ज्ञान ही अंतिम तथा परम वैज्ञानिक है, यह भ्रम मार्क्स तथा उनके साथियों को भी था। लेकिन वे क्षम्य हैं, क्योंकि वे अभियानी या आंदोलनी लोग थे और सभी अभियानियों और आंदोलनी लोगों में ऐसा ही तगड़ा आत्मविश्वास होता है। यहां तक कि यह महात्मा गांधी और गांधीवादियों में भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसके कारण दुनिया की अपार क्षति हुई है। ज्ञानियों में एक ही राह का पथिक होने की समझदारी और सहयोगिता होनी चाहिए।
लेकिन सिंगूर या नन्दीग्राम के कारण जो नए मार्क्सवाद की तलाश पर जोर दे रहे हैं, उन्हें अपने आग्रह पर पुनर्विचार करना चाहिए। नंदीग्राम में जो दिखाई पड़ रहा है, क्या वह मार्क्सवाद ही है? कौन-सा मार्क्सवादी दल या शासन सिंगूर की जमीन किसी उद्योगपति को उपहार में दे सकता है? ध्यान देने की बात है कि भारत के ही अनेक मार्क्सवादियों और मार्क्सवादी संगठनों ने सीपीएम के इस आचरण की घोर निंदा की है। इस सिलसिले में अशोक मित्र का लेख एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम के बाद जिन मार्क्सवादियों की आंख खुली है, वे या तो बहुत भोले लोग हैं या फिर छंटे हुए बदमाश हैं। सच यह है कि सीपीएम ने सत्ता का उपयोग (उपभोग) करते हुए एक भी काम ऐसा नहीं किया है, जिससे मार्क्सवादी अंत:करण को थोड़ा भी तोष मिल सके। मार्क्सवाद के नाम पर ज्यादातर समझौतापरस्ती दिखाई गई है या तानाशाही के प्रयास हुए हैं। इसीलिए लाल झंडा अब न्याय या आशा का प्रतीक नहीं रह गया है। फिर भी लाल झंडे के प्रति मजदूर वर्ग की श्रद्धा काफी हद तक कायम है, तो इसका कारण वे बुनियादी प्रतिबद्धताएं हैं जिनका वह प्रतीक बन चुका है। सूरज के डूब जाने के बाद भी उसकी आभा काफी समय तक बनी रहती है।
लेकिन यह पाप किसका है? पुजारी और भक्त अगर मदमत्त और व्यभिचारी हो गए है, तो क्या इसके लिए देवता को ही दोषी ठहराया जाएगा? क्या गांधीवाद के ऑफिशियल उत्तराधिकारियों में गांधी के तेज का कोई चिह्न दिखाई पड़ता है? क्या जवाहरलाल को भी गांधीवादी मानना पड़ेगा, जिनकी नीतियों ने राष्ट्रीय बरबादी का श्रीगणेश किया? क्या इस सब की जिम्मेदारी महात्मा के खाते में ही डाली जाएगी? आज मुलायम सिंह और जार्ज फर्नांडिस को जिन निकृष्ट चीजों का सशक्त प्रतीक माना जाता है, उनके लिए लोहिया को ही गिरफ्तार किया जाएगा? हम यहां सामान्य पतन की बात नहीं कर रहे हैं जो किसी भी महापुरुष या श्रेष्ठ विचार के उत्तराधिकारियों या अनुयायियों में देखा जाता है। आकाश से गिरा हुआ जल धरती पर आ कर कुछ मटमैला हो ही जाता है। पर अद्वैतवाद को माननेवाला समुदाय जातिवादी या अछूतवादी हो जाए या महावीर के पुजारियों को सिर्फ उनके धन से जाना जाए या बैद्ध धर्म को माननेवाले देश भौतिकवाद के कीचड़ में डूबे हुए पाए जाएं, तो यह सामान्य पतन नहीं, विशेष पतन है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को इसी श्रेणी में रखने का लोभ होता है, लेकिन यह एक सामान्य और लालची महिला की महत्वाकाक्षाओं की संक्षिप्त कथा है, यह बड़े से बड़ा दलितवादी भी जानता है। वैसे भी, हमें अपनी निगाह व्यक्तियों पर नहीं, प्रवृत्तियों और प्रक्रियाओं पर केंद्रित रखनी चाहिए। इसी में आनंद है। व्यक्ति हमेशा इतिहास के औजार नहीं होते, वे अपने स्वभाव और इच्छाओं के भी शिकार होते हैं। यह बात लेनिन, स्टालिन, माओ और कास्त्रो पर भी लागू होती है।
सच यह भी है कि पुजारी अगर होशियार हुआ, तो वह अपने देवता की भी परिशुद्धि कर सकता है। राम के भक्त के लिए यह कतई जरूरी नहीं कि वह अपनी पत्नी को अपहरणकर्ताओं के हाथ से छुड़ाने के बाद उसे अपने घर से निर्वासित कर दे। कृष्ण का भक्त यह कभी नहीं चाहेगा कि उसके मुहल्ले में उसकी छवि बहुगामिता या विवाहिताओं के साथ रासलीला रचानेवाले व्यक्ति की बने। शिवभक्त यह दावा कर सकता है कि भूत-प्रेत में उसका कतई विश्वास नहीं है। आज की राधा आज के कृष्ण से कहेगी कि हे मनमोहन, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन मुझे दांपत्य मूल्यों की रक्षा करनी है, इसलिए हम दूर-दूर रहें, यही उचित है। मार्क्सवाद के प्रैक्टिशनर न केवल ऐसा करने में विफल रहे, बल्कि उन्होंने मार्क्सवाद के मूल गुणों का भी त्याग कर दिया, इसीलिए उन्हें लात-घूंसों से दो-चार होना पड़ रहा है। लेकिन मार्क्सवादियों की सारी बुराइयां मार्क्सवाद का ही परिणाम है, ऐसा मानना परिपक्वता का चिह्न नहीं है। मार्क्सवाद के अलावा इस समय और कौन-सी व्यवस्थित विचारधारा है जो शोषित-उत्पीड़ित लोगों के बारे में सततता के साथ सोचती है?
मार्क्स की बहुत-सी भविष्यवाणियां गलत साबित हो गईं, इससे उसका सारा अवदान व्यर्थ नहीं हो गया। पूंजीवाद के मर्म और शोषण की प्रक्रिया को समझने के लिए हर किसी को मार्क्स के पास जाना पड़ता है। इतिहास की बहुत-सी व्याख्या मार्क्सवादी तरीकों का इस्तेमाल किए बिना संभव नहीं है। और भी कई क्षेत्रों में मार्क्स तथा मार्क्सवाद की विशिष्ट भूमिका है। इसलिए जरूरत नए मार्क्सवाद को खोजने की नहीं, पुराने मार्क्सवाद को ही अद्यतन बनाने की है। यह काम मार्क्स की मृत्यु के तत्काल बाद ही शुरू हो जाना चाहिए था। कुछ हद तक यह हुआ भी है, लेकिन राजनीतिक दलों ने पूरी कोशिश की है कि उन्हें इसकी भनक न लगने पाए। वे मार्क्स के कूपमंडूक अनुयायी इसलिए हैं कि कुएं का जल ही उन्हें रास आता है। लघुमानव जो ठहरे। इसलिए उनसे पहली मांग तो यह होनी चाहिए कि वे ओरिजनल मार्क्स का आविष्कार करें। यह मार्क्स उन्हें कभी यह सलाह नहीं देगा कि वे किसानों पर गोली चलाएं। मार्क्स मानते थे कि किसानों का कोई भविष्य नहीं है। लेकिन यह तो गांधी भी जानते थे। इसीलिए उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि किसानों को साल में छह महीने काम करना चाहिए और छह महीने निकम्मा बने रहना चाहिए। गांधी की सलाह थी कि किसानी के साथ घरेलू उद्योग-धंधों को जोड़ना चाहिए। यही बात मशीनरी, उद्योगवाद आदि पर लागू होती है। सच्चा मार्क्सवादी हर चीज के मर्म में जाने का प्रयास करेगा और औद्योगिक संस्कृति में बुराई ही बुराई दिखती है, तो वह उसे प्लेग की तरह की बीमारी समझेगा। वह मानव अधिकारों का भी सम्मान करेगा और कहेगा कि इन अधिकारों का अधिकाधिक विस्तार ही समाजवाद है। इस तरह के आग्रह तभी संभव हैं जब पुराने मार्क्सवाद की बुनियादी आस्थाओं को स्वीकार करके चला जाए।
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Thursday, June 11, 2009
सोशल इंजीनियरिंग
राजकिशोर
अब हर कोई यह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया। जब इस फार्मूले के बल पर मायावती उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गईं, उस वक्त कहा जा रहा था कि मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला चल निकला। उन दिनों बसपा नेता की कुशाग्र बुद्धि की जम कर प्रशंसा की जा रही थी और यह उम्मीद की जाने लगी थी कि जल्द ही वे भारत की प्रधानमंत्री बन जाएं, तो यह हैरत की बात नहीं होगी। बहन जी खुद भी ऐसा सोचती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि बहन जी खुद ऐसा सोचती थीं, इसलिए हमारे विद्वान लोग भी ऐसा ही सोचने लगे थे। हमारे विद्वान देखते तो हैं – पर उधर नहीं जिधर सत्य होता है, बल्कि उधर जिस तरफ हवा चल रही होती है। अब हवा मायावती के उलटी दिशा में चल रही है, तो कहा जाने लगा है कि उन्होंने अपनी बनती हुई इमारत को अपने ही पैरों से धक्का दे कर नेस्तनाबूद कर दिया। विद्वानों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सोशल इंजिनियरिंग क्या चीज है, यह कैसे काम करती है और इसका संचालन कैसे करना चाहिए।
अनाड़ी हाथों में पड़ कर अच्छा से अच्छा फार्मूला भी फेल हो सकता है। लेकिन मूल बात यह नहीं है। मूल बात यह है कि फार्मूले गणित और विज्ञान में ही गुल खिला सकते हैं, जहां दो और दो हमेशा चार होते हैं तथा दस में से पांच निकाल दो तो हमेशा पांच ही बचेगा। जिंदगी में ऐसा नहीं होता। यहां चार करो तो नतीजा आठ भी हो सकता है और दो भी हो सकता है। इसी में जिंदगी का रोमांच है। नहीं तो वह एकरस हो जाती। इसीलिए जब से जिंदगी की पेचीदगी बढ़ी है, दुनिया भर में ऐसी किताबों की बाढ़ आ गई है जो सुख से जीने और सफलता पाने के गुर सिखाती हैं। ऐसी किताबों की एक पीढ़ी लोकप्रिय हो जाने के बाद जब बाजार में दम तोड़ देती है, तो उनकी दूसरी पीढ़ी जन्म लेती है। इस तरह सुख-शांति-सफलता-समृद्धि-नेतृत्व देने के फार्मूले पानी के बुलबुलों की तरह पैदा होते रहते हैं और उन्हीं की तरह शीघ्रमृत्यु के शिकार हो जाते हैं। पर जिंदगी इतनी पेचीदा चीज है कि समस्याओं का पैदा होना बंद नहीं होता। बताते हैं कि चुनाव प्रचार के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी को जब भी थोड़ा-सा वक्त मिलता था, वे डेल कार्नेगी की एक समय बहुत बिकनेवाली पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लुएंस पीपल’ पढ़ने लगते थे। इसमें दी गई शिक्षाओं के आधार पर आडवाणी ने कितने मित्र बनाए और कितने लोगों को प्रभावित किया, यह कोई नहीं जानता। अगर फार्मूलों पर अमल करने से हर विवाह सफल हो जाता, हर संबंध सरस हो जाता, हर व्यवसाय प्रगति करने लगता और हर क्षेत्र में सफलता मिलती होती, तो धरती पर इतना दुख-दैन्य दिखाई नहीं देता।
फिर भी फार्मूलाबाजी चलती रहती है तो इसीलिए कि सभी लोग सफलता का शॉर्टकट खोजते रहते हैं। पैदल, साइकिल या मोटरगाड़ी के लिए शॉर्टकट हो सकते हैं, पर जिंदगी का सफर इतना सीधा नहीं है। यहां कोई भी फार्मूला काम नहीं करता। हर आदमी को हर चीज की खोज अपने ढंग से करनी होती है। टाटा घराना अपने ढंग से सफल हुआ तो अंबानी ग्रुप अपने ढंग से। बिड़ला परिवार का तरीका कुछ और था। बीआर चोपड़ा और हृषीकेश मुखर्जी, दोनों की फिल्में हिट होती थीं, पर दोनों का फिल्म बनाने का तरीका अलग-अलग था। अमिताभ बच्चन अगर राजेश खन्ना की तरह अभिनय करते और गुलजार आनंद बख्शी की तरह गीत लिखते, तो वे आज इतिहास के डस्टबिन में होते।
मायावती ने जब अवर्ण-सवर्ण एकता तथा सद्भाव की खोज की – किसी नई राजनीति की पीठिका के तौर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक सफलता के शॉर्टकट के रूप में, तो वे एक फार्मूले की रचना कर रही थीं – न उनका निजी परिप्रेक्ष्य बदल रहा था, न उनकी राजनीति में परिवर्तन आ रहा था, न उनके कामकाज के तरीके बदल रहे थे। वे जानती थीं कि ओबीसी उनके साथ आएँगे नहीं, मुसलमान उनके बाएं बाजू की तरह जाना शुरू कर चुके हैं, इसलिए दलितों के साथ चलने के लिए ऊंची जातियों को ही लुभाया जा सकता है, जो अब तक की अपनी उपेक्षा से संतप्त थे। यही मायावती ने किया -- अपनी बुद्धि से किया या किसी सवर्ण सलाहकार की बात मान कर किया, यह मायावती के जीवनीकार जानें। फार्मूला हिट हो गया और उत्तर प्रदेश का मुकुट उड़ते हुए बहन जी के सिर पर आ बैठा। दुर्भाग्यपूर्ण घटना यह हुई कि इसके नतीजे में, इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, बहन जी का दायित्व बोध तो नहीं जागा, उनकी महत्वाकांक्षा के पटाखे में दियासलाई जरूर लग गई। अब उनके पैर उत्तर प्रदेश नामक अभागे राज्य के जूते से बहुत बड़े हो गए और वे प्रशासन तथा विकास की चुनौतियों को भुला कर दिल्ली का सिंहासन खरीदने के लिए रुपयों का हिमालय खड़ा करने में लग गईं। वे अपनी पार्टी के हर सांसद, विधायक और कार्यकर्ता को, सरकार के हर विभाग को, हर विभाग के हर अफसर को अपने ‘प्रधानमंत्री सहायता कोष’ का चलता-फिरता एटीएम समझने लगीं। यहीं से उनके पैर डगमगाने लगे।
सत्ता महत्वाकांक्षा का बोझ सहन करती है, लेकिन एक हद तक ही। जब उसने एक समय इंदिरा गांधी की आदमकद से बड़ी महत्वाकांक्षाओं का बोझ वहन करने से इनकार कर दिया और उत्तर भारत में कांग्रेस की एक भी सरकार न रहने दी, तो मायावती किस खेत की मूली हैं। अब वे कार्यकर्ताओं और अफसरों को डांट-फटकार रही हैं कि तुम्हीं लोगों के कारण मेरी हार हुई। इसके बजाय अगर वे किसी आदमकद आईने के सामने खड़ी हो जातीं, तो उन्हें अपनी हार के लिए जिम्मेदार एकमात्र व्यक्ति तुरंत दिख जाता। पर यह प्रकृति की माया है कि आंखें खुद को देखने के लिए बनाई ही नहीं गई हैं और आईने के सामने हर आदमी को अपना चेहरा प्यारा लगता है।
सड़क सभी को चाहिए – चाहे वह दलित हो, या पिछड़ा या मुसलमान या बाभन-ठाकुर। बिजली भी सभी को चाहिए। अच्छा प्रशासन किसी एक जाति का जीना सुगम नहीं करेगा, इससे सभी को राहत मिलेगी। यही हाल शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से संबंधित संस्थानों का है। गुंडागर्दी सभी के लिए दुखमय है। संक्षेप में यह कि सुशासन का कोई विकल्प नहीं है। मायावती को दिल्ली ले जाने का रास्ता सुशासन से हो कर ही जाता था -- अब भी जाता है, पर उन्होंने सोचा कि नीति, कार्यक्रम और अमल की त्रयी के स्थान पर तिकड़म का अद्वैतवाद ही काफी है। यह सोशल इंजिनियरिंग नहीं, राजनीतिक इंजिनियरिंग थी। इसका फेल होना उतना ही निश्चित था जितना नीम के पेड़ पर आम के उगने की उम्मीद का फेल होना। विधान सभा चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ पर तो अवर्ण-सवर्ण एकता हो गई थी, पर इससे सत्ता की जो मदांध राजनीति पैदा हुई, उसने उस अवर्ण समूह के बीच भी दरारें पैदा कर दीं जिसे मायावती अपना फिक्स्ड अकाउंट मानती रही हैं। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों से मायावती के उम्मीदवारों का हारना और क्या बताता है? बहरहाल, मई 2009 का सवाल यह है कि एक फार्मूले के फेल होने के बाद दलित की बेटी कोई और फार्मूला खोजने का यत्न करेगी या कांशीराम के वचन याद करते हुए यह समझने की कोशिश कि राजनीति की नौटंकी क्या होती है और असली राजनीति क्या होती है।
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वह एक व्यक्तित्व
राजकिशोर
बिहार के उस छोटे-से कस्बे में रामजी से मुलाकात क्या हुई, मेरी जिंदगी में तूफान आ गया। मैं एक छोटी-सी बैठक के लिए वहां गया हुआ था। आयोजक मारुति आठ सौ के एक वृद्ध और बीमार संस्करण में ले जा रहे थे। तभी मुझे यह एहसास हुआ कि मेरे एक पांव की चप्पल बहुत ढीली है। वैसे तो चप्पल की कसी हुई गिरफ्त से मुक्ति के बाद उस पांव को उस सुख का अनुभव हो रहा था जो किसी पिंजरे के पक्षी को अनंत आकाश में वापसी से मिलता है, पर समस्या यह थी कि कार से उतरने के बाद बैठक की जगह तक घिसटते हुए जाना पड़ेगा। सो फुटपाथ पर एक जूता-चप्पल ठीक करने वाले को देख कर गाड़ी रुकवाई और अपनी सिलाई खुली चप्पल को उसके हवाले कर दाएं-बाएं नजर घुमाने लगा।
सड़क (उसे सड़क कहना अपने भीतर की सारी उदारता को उड़ेल देना है) के इस पार मुआयना पूरा कर लेने के बाद उस पार नजर दौड़ाई तो एक आकृति को धुंधली नजर से देख कर मन एक ही छलांग में चालीस साल पीछे भाग चला। कहीं यह वही रामजी तो नहीं है जो मेरे साथ एमए तक पढ़ा था? हम पढ़ाकुओं और लद्धड़ों के बीच वह एक अलग ही जीव था। पढ़ाई-लिखाई में जितना प्रखर उतना ही लोकप्रिय। वह हर किसी का और हर कोई उसका चहेता था। खासकर चपरासियों, चाय की दुकानवालों, मजदूरों आदि से उसकी खूब पटती थी। एक बार उसके घर गया था, तो वह मुहल्ले के सारों बच्चों के साथ खेल रहा था। रामजी न केवल हमेशा अच्छे नंबरों से पास होता, बल्कि उसे दुनिया भर की इतनी जानकारियां थीं कि हम दोस्तों में से हरएक चकित रह जाता। एक बार वह इस ब्रह्मांड की विराटता का वर्णन करने लगा जो हम सकते में आ गए। हम अपनी नजर में पहले चूहे, फिर मक्खी और आखिर में भालू के एक बाल से भी नीचे आ गिरे। वह गाता बहुत अच्छा था और फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था।
जब तक मेरी चप्पल मेरे पांव को कस कर दबाए रखने योग्य बन गई, मैं नंगे पांव रामजी से मिल आया। हां, यह वही था - अपनी मस्त हंसी, समझदार भाव भंगिमा और आवयविक फुर्ती के साथ। दर्जी की दुकान में कपड़ा सिल रहा था। मैंने उससे कहा कि बैठक पूरी होने के बाद मैं आता हूं। एक दराज से एक सफेद रूमाल निकाल कर मेरे हाथ पर रखते हुए वह बोला - जेब में रख लो, पसीना पोंछने के काम आएगा।
रामजी का रूमाल वाकई काम आया। बैठक इतनी बेहूदा थी कि मुझे अपने आने पर पछतावा होने लगा। लग रहा था कि देश में अब स्वस्थ चर्चा की कोई गुंजाइश नहीं है। सो बैठक खत्म होने की घोषणा होते ही ऐसा महसूस हुआ जैसा किसी बच्चे को उस वक्त महसूस होता है जब किसी बौड़म और सख्त ट्यूटर के जाने का समय हो जाता है। लंच यह बता कर छोड़ दिया कि मुझे एक मित्र के साथ खाना खाना है।
दोपहर के दो बज चुके थे। रामजी ने पास के ‘पवित्र हिन्दू होटल’ से दो थालियां मंगवाईं और हम खाते-खाते बात करने लगे। मेरे बारे में उसे थोड़ा-बहुत मालूम था। उसकी रामकहानी सुनते हुए मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि हंसी या रोऊं। रामजी के ही शब्दों में, ‘राज, पढ़ाई से मेरा मन तब एकदम उचट गया जब मुझे पीएचडी के लिए इस तरह के विषय सुझाए जाने लगे -- रामचरितमानस के पात्रों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन, कामायनी में शैव दर्शन का स्वरूप, प्रयोगवाद के सांस्कृतिक आयाम...। मैंने सोचा, इससे बेहतर है चाय की दुकान खोल कर बैठ जाना। फिर डॉक्टरेट करके होगा भी क्या? लेक्चरर बन जाऊंगा और भविष्य के लेक्चरर पैदा करूंगा। यह तो किसी प्रजाति की निरंतरता बनाए रखने का पेशा है। स्कॉलरशिप मिलने का पूरा चांस था, पर मुझे लगा, यह खेत मेरे लिए नहीं है। असली खेती यानी किसानी इससे बेहतर है। पर इसके लिए खेत चाहिए था। सो मैंने दर्जीगीरी सीखी और यहां आ कर जम गया।’
आगे का किस्सा यों है, ‘राज, तुमसे कोई तुलना नहीं है, पर बहुत मौज में हूं। यहां हम दो दर्जी हैं। बारी-बारी से काम करते हैं। एक दिन उसकी, दूसरे दिन मेरी छुट्टी। वह शायरी करता है। मैं अखबार और किताबें, जो भी मिल जाती हैं, पढ़ता हूं, संगीत सुनता हूं, बीस-पचीस घरों में आता-जाता हूं और जब कुछ भी अच्छा नहीं लगता, तो सो जाता हूं।’
‘और शादी?’ मेरी इस जिज्ञासा पर वह ठठा कर हंस पड़ा। बोला, ‘शादी वह करे जिसमें थोड़े-से सुख के बदले अपार दुख सहने की क्षमता हो।’
रामजी से हाथ मिला कर विदा लेने के बाद से मैं सुख-दुख की परिभाषा तय करने में मशगूल हूं। 000
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फेंको मत, प्रयोग करो
राजकिशोर
लेखकों और पत्रकारों को कलम का सिपाही, कलम का मजदूर, कलमजीवी, कलमवीर आदि-आदि कहा जाता है। पत्रकार विनम्रतावश अपने को कलमघसीट कहते हैं, जो अंग्रेजी के पेन-पुशर का सटीक अनुवाद है। अब कम्प्यूटर तेजी से कलम का स्थान लेता जा रहा है। अनेक पत्रकार कबीर की तरह, लेकिन एक भिन्न अर्थ में, यह दावा कर सकते हैं कि मसि-कागद छूओ नहिं, कलम गही नहिं हाथ। लेकिन बहुत से लेखक-पत्रकार अभी भी कलम ही चलाते हैं। साथ ही, अभी भी बहुत-से काम कलम से ही होते हैं। कंप्यूटर का प्रयोग कितना ही व्यापक क्यों न हो जाए, कलम तो रहेगी। कुछ लेखकों को सुंदर और महंगी कलमों का शौक होता है। कई बड़े गर्व से बताते हैं कि उन्हें पहली पारकर कलम किस उम्र में मिली थी। ऐसा लगता है कि लैपटॉप, पामटॉप और कोई नया टॉप आने के बाद भी अच्छी और महंगी कलमों का, जैसे खूबसूरत और महंगी घड़ियों का, शौक हमेशा बना रहेगा। कुछ ऐसे भी होंगे जो कपड़े साधारण पहनेंगे, खाना भी साधारण खाएंगे, लेकिन जेब में रखेंगे कोई महंगी कलम ही। लेकिन यह दूसरी बात है। मैं यहां जिस चीज की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, वह कलम की तकनीक के बारे में है, जिसके साथ उसका अर्थशास्त्र भी जुड़ा हुआ है।
निबवाली कलम की उम्र लंबी रही है। उसके पहले सरकंडे की कलम का इस्तेमाल होता था। गणेश जी की कलम शायद मोरपंखी की थी। लेकिन गांधी जी ने जिस कलम से हजारों या शायद लाखों चिट्ठियां लिखीं, वह कलम-दावातवाली कलम ही थी। हम सभी ने बचपन में इसी कलम का इस्तेमाल किया है। यह कलम सस्ती पड़ती थी और निब बदलते हुए एक कलम को साल-साल भर या उससे ज्यादा भी चलाया जा सकता था। उसके बाद आया फाउंटेनपेन। यह एक दर्जा बेहतर था। अब कलम के साथ दावात रखने की मजबूरी खत्म हो गई। मेरा खयाल है, फाउंटेनपेन सभ्यता का एक सुंदर उपहार है। उससे हस्तलिपि भी अच्छी बनती है। लेकिन बॉल पेन ने उसका जनाजा निकाल दिया। इस कमबख्त ने हमारे जीवन में उत्सव की तरह प्रवेश किया और दैनंदिनी की तरह छा गया। बॉल पेन में सुविधा भी बहुत है। फर्राटे से लिखो और रिफिल खत्म हो जाए, तो उसे निकाल कर फेंक दो और उसकी जगह नई रिफिल डाल दो। बॉल पेन अभी भी अपनी उसी मस्ती के साथ चल रहा है। लेकिन इस बीच तरह-तरह की कलमें आ गई हैं, जैसे जेल पेन, रोलर पेन आदि। ये सभी बॉल पेन की ही भाई-बहनें हैं। इनकी रिफिल भी लगातार बदलनी पड़ती है। कुछ कलमों की तो रिफिल मिलती भी नहीं। लिखते रहो, स्याही खत्म हो जाए तो फेंक दो। यूज एंड थ्रो। आजकल दुकान में जाओ, तो निबवाली कलम मुश्किल से दिखाई पड़ती है। गनीमत यह है कि वह अभी भी बची हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट लिखी जा चुकी है, पर रोगी जिंदा है, अगरचे वह लंबी-लंबी सांसें ले रहा है। मेरा प्रस्ताव यह है कि इस रोगी को जीवन दान मिलना चाहिए। नहीं तो कलमों के कचरे से ही एक दिन इस धरती का आंगन भर जाएगा और दिनकर के कुरुक्षेत्र के एक पात्र की तरह हम पछताएंगे कि नर का बहाया रक्त, हे भगवान मैंने क्या किया।
आजकल हम जिन कलमों का इस्तेमाल करते हैं, वे स्वयं कचरा नहीं हैं, पर कचरा जरूर पैदा करती हैं। जिंदगीरहित रिफिल, जो फेंक दिए जाने पर दशकों या शताब्दियों तक जमींदोज होने के लिए तैयार दिखाई नहीं देते। प्लास्टिक या लोहे की खपत मांगनेवाली कलम की बॉडी, जो अपनी उपयोगिता खो देने के बाद भी निश्चिह्न होना नहीं चाहती। प्लास्टिक की हुई, तो उसके साथ भी वही खतरा है जो प्लास्टिक की थैलियों के साथ है। यह विचित्र है कि प्लास्टिक की थैलियों के प्रति तो जागरूकता पैदा हो गई है और कई राज्यों में नहीं तो कई शहरों में उन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन प्लास्टिक की कलमों तथा अन्य उत्पादों के प्रति मोह बना हुआ है। कल्पना कीजिए, जब पूरा भारत शिक्षित हो जाएगा (हे ईश्वर, वह दिन कब आएगा? आएगा भी कि नहीं?) तब देश भर में कितनी कलमों की जरूरत पड़ेगी? उनमें कितना प्लास्टिक लगेगा, उनके लिए कितनी रिफिलें लगेंगी और इन सबको कहां दफनाया जाएगा? दफनाए जाने के बाद ये पंचभूत में कब विलीन होंगे? अंतिम संस्कार के इस महंगे खेल में यूरोप के छोटे-छोटे और समृद्ध देश तो हिस्सा ले सकते हैं, पर हम भारतवासियों को तो नानी याद आ जाएगी। क्या अभी से इसका कुछ उपचार करना आवश्यक नहीं है? या, जब तक प्यास नहीं लगेगी, कुएं नहीं खोदे जाएंगे?
कोई कह सकता है कि यह आशंका अतिरंजित है। मेरा अपना अनुभव यह है कि बहुत-से मामलों में अतिरंजना के जरिए ही सत्य का साक्षात्कार होता है। बहरहाल, यदि यह अतिरंजना है, तब भी इसका उपयोग है। सौ-पचास झीलों का सूख जाना दुनिया के सभी झीलों के सूख जाने की भविष्यकथा हो सकती है। न भी हो, तो हम ऐसा काम करें ही क्यों जिससे एक झील भी सूख सकती है? खास तौर से तब जब वह काम कतई जरूरी न हो। इस आशंका के विरुद्ध एक और तर्क दिया जा सकता है। यह तर्क है पुनर्चक्रण का। यह पुनर्चक्रण एक यूरोपीय बीमारी का नाम है। हम किसी चीज का बार-बार और नए-नए तरीके से इस्तेमाल तो कर सकते हैं जैसे त्यागी हुई धोतियों और साड़ियों का बहुविध इस्तेमाल हमारी मांएं-दादियां-नानियां करती थीं। बड़ों के उतारे हुए कपड़े छोटे पहनते थे। स्वयं गांधी जी ने अपने जीवन में इसके दर्जनों प्रयोग किए। वे अनेक चिट्ठियां इस्तेमालशुदा लिफाफों की खाली जगह पर लिखा करते थे। धोती को फाड़ कर रूमाल बना लेते थे। पर आधुनिक सभ्यता का यह कबूल नहीं है। वह चीज नई और ताजा देखना चाहता है। साधन सीमित हैं और वे हमेशा सीमित ही रहेंगे। इसलिए उसने पुनर्चक्रण की टेक्नोलॉजी निकाली है। लेकिन यह टेक्नोलॉजी इतनी महंगी है कि इसका इस्तेमाल अमीर समाज ही कर सकते हैं। गरीब देश ऐसा करने का प्रयास करेंगे, तो उनका भट्टा बैठ जाएगा। भारत में जहां जहां कचरे, पानी आदि के पुनर्चक्रण के प्लांट लगे हैं, उनमें से ज्यादातर फेल हो चुके हैं। इसलिए हमें एक चक्र से ही संतुष्ट रहना चाहिए। ज्यादा बहादुरी नहीं दिखानी चाहिए।
कलम के मामले में भी यह उतना ही सच है। आखिर बॉल पेन, जेल पेन या रोलर पेन से वही काम होता है जो निबवाली कलम से हो सकता है। यह कलम किफायती भी है -- स्याही चुक जाए तो फिर डाल दो और लिखते रहो। अगर इस कलम की बॉडी प्लास्टिक की भी हो, तो दीर्घजीवी होने के कारण पर्यावरण का नाश करनेवाला कचरा कम पैदा करेगी। हम चाहें तो इसका नाम गांधी पेन रख सकते हैं। गांधी पेन इसलिए कि यह किफायत की राह दिखाती है और कम से कम में काम चलाने के दर्शन की ओर ले जाती है। मूल सवाल इस या उस कलम का नहीं है। मूल सवाल यह है कि हम उपभोक्तावाद (इस्तेमाल करो और फेंको --यह दृष्टि चीजों पर इस्तेमाल होते-होते जब स्त्री-पुरुषों पर लागू होने लगती है, तब हम इस आधुनिक सभ्यता को ही कोसने लगते हैं। एक समय अरुण शौरी ने कहा था कि संपादकों की स्थिति निरोध जैसी हो गई है। उनका अनुकरण करते हुए हम कह सकते हैं कि कलम की हैसियत भी निरोध जैसी हो गई हैे), का शिकार होना पसंद करेंगे या छोटी से छोटी चीज की तरफ ध्यान देते हुए उसके निर्दय पंजों से बाहर निकलने की सोचेंगे? उत्पादनकर्ता तो यह चाहेगा ही कि उसका माल ज्यादा से ज्यादा बिके। यूज एंड थ्रो की संस्कृति का राज इसी में छिपा हुआ है। यह उत्पादकता नहीं, उत्पादन बढ़ाने का रास्ता है। ज्यादा उत्पादन यानी ज्यादा आय यानी अधिक जीडीपी। इसी को आर्थिक संवृद्धि कहा जाता है – बिना इस पर विचार किए कि अच्छी चीज वह है जिसका इस्तेमाल ज्यादा दिनों तक और किफायतशारी के साथ किया जा सकता है। गांधी कलम यही काम करेगी।
कोई लेखक अपने पूरे जीवन काल में (यहां उनकी बात नहीं की जा रही है जो चंद्रधर शर्मा गुलेरी की तरह तीन-चार कहानियां लिख कर अमर हो जाना चाहते हैं) अगर निबवाली बीस कलमों का इस्तेमाल करता है, तो वह उतने ही पन्ने रंगने के लिए रिफिलवाली दो सौ कलमों का इस्तेमाल करेगा। हो सकता है, और ज्यादा ही, क्योंकि सभी रिफिलें अच्छी नहीं होतीं और आठ-दस पन्नों के बाद ही टें बोल जाती हैं। विचारणीय यह भी है कि रिफिल या जेलवाली कलमों के लिए उच्चतर टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है, जब कि निबवाली कलमों का उत्पादन मामूली टेक्नोलॉजी से भी किया जा सकता है। वैज्ञानिकता (और आधुनिकता भी, अगर बुद्धि से इसका संबंध पूरी तरह से टूट नहीं गया है) इसमें नहीं है कि जो काम पांच रुपए से हो सकता है, वही काम पचीस रुपए में किया जाए। जो बेवजह ज्यादा खर्च करता है, उसे मंद-अकल नहीं तो और क्या कहा जाएगा? जितनी जल्द हम इस बात को पकड़ लें कि उद्योगपति वही होशियार है जो ग्राहकों को बेवकूफ बना कर अपनी जेब भरता जाए, उतनी ही जल्द हम भी अपनी बुद्धि का इस्तेमाल शुरू कर देंगे और उद्योगपति के झांसे में न आ कर अपना चुनाव स्वयं करेंगे।
आजकल हिन्द स्वराज्य की बड़ी चर्चा है। जिसे देखो, वही गांधी जी के संदेश की चिरंतन प्रासंगिकता का चारण गान किए जा रहा है। इस सिलसिले में गांधी का यह वाक्य भुला दिया जाता है कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। गांधीवाद को गांधी के बाहर खोजना नादानी है। यह विद्वत्ता की चीज नहीं, बरतने की चीज है। गांधी की प्रशंसा इस बात में नहीं है कि उनके जीवन या विचारों पर कितने सफेद पन्ने स्याह किए गए। जो गांधी की राह पर चलने की यथासाध्य कोशिश करेगा, वही गांधीवादी होने का यत्किंचित दावा कर सकता है। गांधी पेन इसका एक उदाहरण है। अगर हम गांधी पेन के पीछे कार्यरत विचार से सहमत हैं, तो गांधी सड़क, बस, गांधी रेल, गांधी घर, गांधी ऑफिस, गांधी सभागार, गांधी सिनेमाघर, गांधी कार, गांधी अखबार आदि की भी कल्पना कर सकते हैं। यह विचार आग की तरह फैलता है तो भारत में न अतिशय गरीबी रहेगी न अतिशय अमीरी। 000
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Wednesday, June 10, 2009
राजनीति में फुरसत
राजकिशोर
केंद्र में सरकार गठन का काम पूरा हो गया। मंत्रियों ने अपने-अपने विभाग की जिम्मेदारी संभाल ली है। अभी वे अपने-अपने कमरों की साज-सजावट पर ध्यान दे रहे हैं। आशा है, इसके बाद विभागीय जिम्मेदारियों के निर्वाह का नंबर आएगा। जो पांच साल तक मंत्री बने रहेंगे, उनके पास काम ही काम रहेगा। जो करेंगे, उनकी वाहवाही होगी। जो नहीं करेंगे, वे पछताएंगे। इस बार के चुनाव से साफ हो गया है कि अब मतदाता आंख मूंद कर वोट नहीं देता। उसकी प्रतिबद्धता पार्टी या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस के प्रति है। करोगे तो पाओगे, नहीं तो जाओगे।
लेकिन सभी सत्ताधारी सांसद मंत्री नहीं बन सकते। उनकी एक-चौथाई संख्या भी मंत्री नहीं बन सकती। फिर बाकी सांसद क्या करेंगे? बेशक इनमें से कुछ की सांगठनिक जिम्मेदारियां होंगी। कुछ की व्यस्तता अन्य प्रकार की हो सकती है, जैसे पार्टी का छात्र या मजदूर संगठन संभालना। लेकिन अन्य सांसद पांच वर्ष का यह लंबा समय किस तरह बिताएंगे? क्या वे पर्यटन पर निकल जाएंगे या तीर्थयात्रा करेंगे? क्या वे तरह-तरह की दलाली में लग जाएंगे जो आजकल राजनीतिकारों का एक प्रिय पेशा बन चुका है?
सांसदों को एक काम सरकार ने दिया हुआ है। वह है हर साल दो करोड़ रुपए खर्च करना। इसे स्थानीय क्षेत्र विकास कोष या एमपी फंड कहते हैं। पिछली लोक सभा के रिकॉर्ड देखा जाए, तो शायद ही किसी सांसद ने पांच साल में पूरे दस करोड़ रुपए खर्च किए। किसी-किसी ने तो पंद्रह-बीस प्रतिशत रकम ही खर्च की। यानी जो रुपया लौट गया, वह जनता का काम में लग सकता था, पर नहीं लगा। किसी गरीब देश में यह जन द्रोह से कम नहीं है। जनता का पैसा, जनता के लिए दिया गया पैसा सिर्फ इसलिए जनता के काम नहीं आ सका, क्योंकि बीच में एक निठल्ला सांसद था। आशा है, इस बार ऐसे निठल्ले सांसदों की संख्या में कमी आएगी या उनका निठल्लापन कम होगा।
लेकिन साल भर में दो करोड़ रुपयों के प्रोजेक्ट बनाना और जिला प्रशासन के माध्यम से उन्हें लागू कराना कोई इतना बड़ा काम नहीं है जो सांसद महोदय को दिन भर में कम से कम आठ घंटे व्यस्त रख सके। इसके लिए तो दिन भर में एक घंटा भी जरूरत से बहुत ज्यादा है। फिर बाकी बचे हुए घंटों का क्या होगा?
यह सवाल अकसर हमारे सांसदों के सामने अपनी प्रश्नवाचकता के साथ उपस्थित नहीं होता, तो इसका एक बड़ा कारण हमारी संसदीय राजनीति का चरित्र है। इस राजनीति का मुख्य लक्ष्य है मंत्री बनना और पार्टी के किसी महत्वपूर्ण पद पर काबिज होना। इसके अलावा किसी के पास कोई काम नहीं होता। न पार्टी उन्हें कोई काम सौंपती है, न वे अपने लिए कोई काम निकाल पाते हैं। पांच वर्ष की इस निष्क्रियता से सांसद तथा पार्टी और जनसाधारण के बीच कोई संपर्क सूत्र बन नहीं पाता। इसीलिए यह मुहावरा रूढ़ हो चुका है कि चुनाव का मौसम आया, तो नेताजी अपने चुनाव क्षेत्र में दिखाई पड़ने लगे। बाकी समय तो वे गधे की सींग की तरह गायब रहते हैं।
मेरा विनम्र सुझाव है कि यह सूरत अब बदलनी चाहिए। लोक सभा चुनाव के पहले तक लोगों में राजनीतिकारों के प्रति गुस्सा ही गुस्सा था। सभी को लग रहा था कि हम इस विलासी और निकम्मी फौज को बेवजह पाल रहे हैं। ये किसी काम के नहीं रहे। यहां तक कि ये नागरिकों के जान-माल की रक्षा भी नहीं कर सकते। आतंकवाद के सामने इनकी घिग्घी बंध जाती है। आज के समय में, खासकर विकासशील देशों में, राजनीति ही हर चीज की धुरी है। अगर राजनीति में घुन लग चुका है, तो सार्वजनिक जीवन का कोई भी कोना स्वस्थ नहीं रह सकता। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार दुबारा बनने पर ऐसा लगता है कि देश में कुछ उत्साह का संचार हुआ है। लोग उम्मीद करने लगे हैं कि अब राजनीति की भूमिका में कुछ सकारात्मक बदलाव आएगा। सरकार ज्यादा मुस्तैदी से काम करेगी। विकास के नए-नए कार्यक्रम बनेंगे और उन पर चुस्ती से अमल होगा। उत्साह के इस माहौल को हमारे गैर-मंत्री सांसद चाहें तो और मजबूत कर सकते हैं।
किसी भी लोक सभा क्षेत्र में बहुत सारे काम होते हैं। एक बड़ा काम यह निगरानी करना है कि सरकारी योजनाओं पर ठीक से अमल हो रहा है या नहीं। काम की गुणवत्ता के मानकों का पालन हो रहा है या नहीं। कार्य पालन में किसी तरह का भ्रष्टाचार तो नहीं है। यह काम कोई भी सांसद अकेले नहीं कर सकता। इसके लिए उसे स्थानीय स्तर पर जन संगठन बनाना होगा। इसमें स्थानीय विधायकों का भी सहयोग लिया जा सकता है। दूसरा काम है जनसाधारण की शिकायतों का निराकरण। लोग सरकार के महकमों में अपनी शिकायत या दरख्वास्त जमा करते हैं और ये बरसों लटके रहते हैं। इसका निवारण करने में सांसद की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में ऐसे दस-बारह केंद्र खोले जाने चाहिए जहां लोग अपनी शिकायतों और दरख्वास्तों की फोटो कॉपी जमा कर सकें। यह सांसद के चुनाव क्षेत्रीय कार्यालय का कर्तव्य होगा कि वह संबंधित विभागों से बात कर इन शिकायतों और दरख्वास्तों का निराकरण कराए। सिर्फ इतने से जमीनी स्तर पर जबरदस्त परिवर्तन आ सकता है। अभी सरकार और अफसरशाही होते हुए भी लोग अपने को अनाथ और असहाय महसूस करते हैं। एक कर्तव्यनिष्ठ और सक्रिय सांसद जनता के भरोसेमंद अभिभावक का काम कर सकता है।
इसी तरह, सांसद अपने क्षेत्र में कई प्रकार की सामाजिक पहलों की शुरुआत कर सकता है। सभी काम सरकारी स्तर पर नहीं हो सकते। समाज को भी पहल करनी होती है। प्रौढ़ शिक्षा के केंद्रों का सुचारु संचालन, स्कूलों-कॉलेजों-अस्पतालों के काम-काज की निगरानी, स्वास्थ्य केंद्रों में लापरवाही के आलम को दूर करना, राशन सिस्टम को चुस्त, दुरुस्त और भ्रष्टाचार-मुक्त करना, पुलिस को मनमानी न करने देना, स्थानीय परिवहन को सुव्यस्थित करना, न्यूनतम मजदूरी के कानून का पालन करना -- इस तरह के दर्जनों काम हैं जो सांसद के नेतृत्व में स्थानीय जन की सक्रियता से ही संभव हैं। ये सभी काम ऐसे हैं जिनमें न हर्रे लगना है न फिटकरी, पर रंग हमेशा चोखा आना है। इसी तरह सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का काम स्थानीय पहल से ही हो सकता है।
इसके लिए आवश्यक है सांसद में यह महत्वाकांक्षा जगना कि उसका चुनाव क्षेत्र किसी भी अर्थ में अविकसित नहीं रहेगा। लोग जागरूक और सक्रिय होंगे। प्रशासन की आम बुराइयां खत्म हो जाएंगी। कहना न होगा कि ये कोई क्रांतिकारी या रेडिकल काम नहीं हैं। ये सभी बहुत मामूली काम हैं जो नेतृत्व के अभाव में प्रतीक्षित पड़े रहते हैं। सांसद लोग नेता भी कहलाते हैं। हमारी शुभकामना है कि उनमें नेतृत्व की तरंग पैदा हो और वे अपने मतदाताओं से जुड़ें। अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें पांच साल बाद चीख-चीख कर यह कहना नहीं होगा कि हमें वोट दो। इसकी जगह उनका काम बोलेगा।
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महिला आरक्षण
50 प्रतिशत बनाम 33 प्रतिशत
राजकिशोर
राष्ट्रपति जी ने संसद को संबोधित करते हुए अपनी सरकार का जो पहले सौ दिनों का कार्यक्रम पेश किया, उसमें महिलाओं को दिए जानेवाले आरक्षण से संबंधित दो महत्वपूर्ण घोषणाएं हैं। एक घोषणा यह है कि पंचायतों और नगरपालिकाओं की निर्वाचित सीटों पर महिलाओं का आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ कर 50 प्रतिशत किया जाएगा और इसके लिए संविधान में आरक्षण किया जाएगा। इस घोषणा के समर्थन में कहा गया है कि महिलाओं को वर्ग, जाति तथा महिला होने के कारण अनेक अवसरों से व