Wednesday, June 24, 2009

माओवादियों पर पाबंदी

लालगढ़ के बाद क्या


लालगढ़ को सशस्त्र बल द्वारा मुक्त कराना मेरी एक पुरानी धारणा की पुष्टि करता है। बहुत दिनों से मुझे यह लग रहा है कि अगर देश के भीतर कोई क्षेत्र मुक्तांचल बन जाता है, जहां पुलिस की चलती है प्रशासन की, तो इसका मुख्य कारण यह है कि राज्य और केंद्र सरकारें उस क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहतीं। यह मुक्तांचल चाहें नक्सलवादियों द्वारा स्थापित किया गया हो, चाहे गुंडा तंत्र द्वारा अथवा किसी डकैत गिरोह द्वारा। राज्य चाहे तो ऐसे किसी भी क्षेत्र को दो-चार दिनों से ले कर महीने-दो महीने तक की गंभीर कार्रवाई में भारतीय संविधान के दायरे में ला सकता है। इस धारणा के समर्थन में सबसे पहले वीरप्पन का नाम लिया जाना चाहिए, जो लंबे समय तक कर्नाटक और तमिलनाडु के जंगलों में बिना किसी चुनौती के अपना राज चलाता रहा। जब उसकी उपस्थिति राज्य के लिए सचमुच असह्य हो गई, तो उसे मारने में महीना भर भी नहीं लगा। हाल में हुई इस तरह की घटना चित्रकूट में बहुत समय से मनमानी कर रहे डाकू घनश्याम केवट को घेर कर उसका एनकउंटर है। केवट वीरप्पन जैसा महाबली नहीं था। फिर भी उसे तब तक बरदाश्त किया जाता रहै जब तक राज्य सरकार के लिए वह असह्य नहीं हो गया। चाहे जिस कारण से भी हो, लालगढ़ की स्वायत्तता के तब तक सहन किया गया जब तक यह राजनीतिक नजरिए से ठीक था। जब मामला जीरो टॉलरेंस के दायरे में गया, तब राज्य सरकार ने केंद्रीय बलों की सहायता से कई दिनों में ही वारा-न्यारा कर दिया।

सवाल लाजिम है कि सरकारों में हिंसा और आतंकवाद द्वारा स्थापित मुक्तांचलों के प्रति यह उदासीनता क्यों देखी जाती है। जब कुछ सौ प्रदर्शनकारी अपनी लोकतांत्रिक मांगों के समर्थन में छोटा-मोटा जुलूस निकालते हैं, तो यह राज्य को अपने लिए एक बड़ी चुनौती प्रतीत होती है और क्रूर दमन का फैसला करते हुए उसे कुछ मिनट भी नहीं लगते। वरुण गांधी जैसा छोटा-मोटा और नया-नया खिलाड़ी जब कुछ उत्तेजक भाषण देता है, तो राज्य सरकार को वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक लगने लगता है। बताते हैं कि देश का एक उल्लेखनीय हिस्सा नक्सलवादी प्रभाव में है। पर इस प्रभाव को खत्म करने के लिए तो राज्य सरकारें परेशान हैं और केंद्र सरकार। माजरा क्या है?

माजरा यह है कि ये सभी इलाकें भारतीय राज्य के लिए फालतू इलाके हैं जहां से तो कुछ राजस्व मिलता है और इससे कुछ फर्क पड़ता है कि इन इलाकों पर किसका कब्जा है। ये इलाके दरअसल राज्य के लिए एक बोझ हैं, क्योंकि वहां की जावन स्थितियों को बेहतर करने के लिए राज्य को सिर्फ खर्च ही खर्च करना है। जो गाय दूध नहीं देती, उसे फालतू में एक्स्ट्रा चारा खिलाते रहने में कौन-सी बुद्धिमानी है? इसलिए राज्य का नजरिया यह रहा है कि यहां चाहे जिसका राज हो, हमें क्या मतलब? राज्य तब थोड़ी-बहुत कार्रवाई करने के लिए विवश हो जाता है जब हिंसा की चिनगारियां उसके खास लोगों तक पहुंचने लगती हैं। लालगढ़ भी ऐसा ही इलाका है, जहां भूख और वस्त्रहीनता का स्थायी वातावरण रहा है। जब लालगढ़ की चिनगारियां दूर तक पहुंचीं और प. बंगाल के मुख्यमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री को बारूदी सुरंगों के ऊपर से गुजरना पड़ा, तब कुछ करना जरूरी हो गया। लालगढ़ की एक खूबी यह भी थी कि वहां मार्क्सवाद की ही एक और धारा प्रभावशाली होने लगी थी और सवाल यह पैदा हो गया था कि आज लालगढ़ तो कल बंगालगढ़। यह ओम (ऑफिशियल मार्क्सवाद) को कैसे बर्दाश्त हो सकता था?

लालगढ़ के बाद उचित कदम यह था कि देश के अन्य नक्सल-प्रभावित इलाकों को भी आजाद कराने का उपक्रम शुरू कर दिया जाता। छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और बिहार की सरकारें, अपनी-अपनी बुद्धि और आवश्यकता के अनुसार इस दिशा में कोशिश करती रही हैं। इस कोशिश के चलते आंध्र प्रदेश सरकार को थोड़ी शाबाशी मिली है, छत्तीसगढ़ सरकार को काफी बदनामी झेलनी पड़ी है और बिहार सरकार के बारे में कोई धारणा नहीं बनाई जा सकी है, क्योंकि वहां नक्सलवाद का दमन अभी शैशवावस्था में है। उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखंड, मध्य प्रदेश आदि की सरकारें अभी भी उदासीनता के उसकी स्टेज में हैं जिसका जिक्र उपर किया गया है। यह केंद्र सरकार का राजनैतिक और नैतिक, दोनों प्रकार का कर्तव्य था कि वह देश भर में राजनीतिक चेतना जाग्रत कर और प्रभावित राज्यों की सरकारों से संवाद कर एक बृहत कार्रवाई प्रारंभ कर देती। राष्ट्रपति जी ने मनमोहन सिंह की इस सरकार की प्राथमिकताओं की घोषणा करते हुए पहले सौ दिनों का जो कार्यक्रम बताया था, उसमें नक्सलवाद की चुनौती का सामना करना भी था।

लालगढ़ में केंद्र सरकार की सशस्त्र कार्रवाई की सफाई देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बताया कि प. बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को केंद्रीय बलों की मांग के लिए पत्र लिखे जाने पर अर्धसैनिक बलों को रवाना किया गया। तो क्या जब तक कोई राज्य सरकार नक्सलवाद का सफाया करने के लिए केंद्र से अर्धसैनिक सहयोग नहीं मांगेगी, तब तक केंद्र इस समस्या से मुंह मोड़े रहेगा? क्या नक्सल-प्रभावित इलाके सिर्फ राज्य सरकार की जिम्मेदारी हैं ? वहां केंद्र की कोई संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं है? क्या केंद्र इन राज्य सरकारों से यह नहीं कह सकता कि अगर आप इन इलाकों में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते, तो मजबूर हो कर हमें यह काम करना पड़ेगा?

नहीं, केंद्र ऐसा नहीं करेगा, क्योंकि उसे इस तरह की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। उसके लिए इतना ही काफी है कि नक्सल-प्रभावित इलाके उसके लिए कोई चुनौती बनें। लेकिन केंद्र को यह दिखाना पड़ता है कि हम किसी राज्य विशेष के साथ पक्षपात नहीं करते। हमारे लिए तो सभी राज्य सरकारें बराबर हैं। यह साबित करने के लिए ही माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित किया गया है। माओवादियों को या उनसे राजनीतिक सहानुभूति रखनेवालों को इससे बहुत चिंतित होने की जरूरत नहीं है। यह तो सिर्फ एक कानून है। अगर कानून बनाने से ही सब कुछ हो जाता, तो देश भर में दलित उत्पीड़न, भ्रष्टाचार, वेश्यागमन, दहेज हत्याएं, बलात्कार, तस्करी, भिक्षावृत्ति, गुंडागर्दी, रंगदारी, टैक्स चोरी आदि कभी के रुक जाते। इस नए प्रतिबंध से होगा यह कि राज्य सरकारों को कुछ और अधिकार मिल जाएंगे, जिनका इस्तेमाल बिनायक सेन जैसे भले आदमियों को परेशान करने में हो सकता है। राज्य सरकारें चाहतीं, मेरा मतलब है सचमुच चाहतीं, तो इस प्रतिबंधक कानून के बगैर भी माओवादियों को संविधान के दायरे में ला सकती थीं। इसलिए अगर कोई पूछता है कि लालगंज के बाद क्या, तो जवाब हाजिर है, ठेंगा!

बिजनेस में बेईमानी

उनके हिस्से का झूठ

राजकिशोर

पैसा, पैसा, पैसा। बिजनेस, बिजनेस, बिजनेस। और कोई चाह नहीं, और किसी चीज की फिक्र नहीं, और कोई बढ़त नहीं। सरकार तटस्थ, निष्क्रिय और बेपरवाह। कोई देखने-भालनेवाला नहीं। कोई सुननेवाला नहीं। जो बोलेगा, वह मारा जाएगा।

यही सबक है हमारी शिमला यात्रा का। जब मेरी मसें नहीं भीगी थीं, हाई स्कूल में अंग्रेजी के परचे के लिए एक निबंध खूब पढ़ा-पढ़ाया जाता था - ट्रैवेल एज पार्ट ऑफ एडुकेशन। पर्यटन -- शिक्षा के अंग के रूप में। तब तो नहीं, पर पिछले कई सालों से जब भी यात्रा करता हूं, देश और समाज के बारे में कुछ कुछ नया जानने को जरूर मिलता है। पिछली बार मुजफ्फरपुर गया था, तो एक ऐसे टीटी से टकरा गया जो रोज हजार-दो हजार एक्स्ट्रा कमा कर घर लौटने के लिए प्रतिबद्ध था। लौट कर उसके व्यवहार के बारे में एक अखबार में लिखा, तो वह सस्पेंड हो गया। अभी जो लिखने जा रहा हूं, उसके बारे में ऐसा कोई भरोसा नहीं है।

शिमला के पास कुफ्री नाम की एक जगह है, जहां पहाड़ की चोटी पर जा कर चारों ओर का दृश्य देखने के लिए घोड़े पर जाना पड़ता है। वहां मैं पिटते-पिटते बचा (ऐसे मौके कई बार चुके हैं, इसलिए मैं उत्तेजित नहीं हुआ।) हुआ यह कि एक घोड़ेवाला एक दक्षिण भारतीय जोड़े को घोड़े के एक ट्रिप की कीमत तीन सौ रुपए बता रहा था। मेरी बेटी अस्मिता ने दो सौ रुपए पर घोड़े की सेवाएं ली थीं। यह बात मैंने उस युगल को इसलिए बता दी, ताकि उसका शोषण हो सके। इस पर आसपास मंडरा रहे सभी घोड़ेवाले बिदक गए और मुझे शर्मिंदा करने और धमकाने लगे तू बीच में क्यों बोलता है? हमारा बिजनेस क्यों खराब करता है? अपना-सा मुंह ले कर किराए पर ली गई कार में बैठा, तो एक घोड़ेवाला मेरे पास आया और बोला -- आपको दखल देने की जरूरत क्या थी? अगर आप बुजुर्ग नहीं होते, तो जरूर पिट जाते। फिर कभी ऐसा मत करना। हमारे ड्राइवर के साथी एक ड्राइवर ने बिन मांगी सीख दी -- आखिर उनके बिजनेस का सवाल है। आप भी कोई बिजनेस करते होंगे। बिजनेस में झूठ तो बोलना ही पड़ता है। आप भी अपने बिजनेस में झूठ बोलते होंगे। मुझे एक बार फिर शर्मिंदा होने का अवसर मुहैया कराया गया।

कुफ्री से लौटते हुए मेरे मन में खयाल आया कि सरकार ने अगर वहां एक तख्ती टांग दी होती कि एक घोड़े का उपयोक्ता शुल्क दो सौ या ढाई सौ रुपए है, तो किसी को कोई दिक्कत नहीं होती। जिसको जाना होता, वह निश्चित शुल्क अदा करता और उचक कर घोड़े पर बैठ जाता। कुफ्री में जहां यह सौदा होता है, जगह बहुत कम है और गाड़ियां एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था होती रहती हैं। इस अराजकता को नियंत्रित करने के लिए वहां कई पुलिसवाले तत्पर रहते हैं। पर यात्रियों का शोषण हो और घोड़ों के हर ट्रिप के लिए संकोची और स्मार्ट, दोनों को एक ही किराया देना पड़े, यह देखने के लिए सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं था। जाहिर है, सरकार भी इस सिद्धांत से सहमत है कि बिजनेस के मामले में दखल नहीं देना चाहिए। इस पर राष्ट्रीय सर्वसहमति है।

दिल्ली के महाराणा प्रताप बस अड्डे पर, जिसे सभी अज्ञानवश अभी भी आईएसबीटी कहते हैं, लौटना रात के चार बजे हुआ। जैसे तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं (यह मुझ पर हिन्दी अखबारों की भाषा पर असर है) के उतरते ही पंडों में युद्ध छिड़ जाता है कि यह शिकार मेरा है, वैसे ही बस से उतरते ही ऑटोवालों में हमें ले कर प्रतिद्वंद्विता शुरू हो गई। यह देख कर खुशी हुई कि रात के इतने बजे भी ऑटोवाले यात्रियों को अपनी सेवा प्रदान करने के लिए इंतजाररत (संपादक जी, कृपया बदलें) रहते हैं। पर इस संसार का अकाट्य नियम यह है कि हर खुशी क्षणिक होती है। अगले कुछ क्षणों में पता चला कि कोई हमें साढ़े तीन सौ रुपए में हमारे घर पहुंचाने के लिए व्यग्र था, तो किसी को इसके लिए सिर्फ तीन सौ रुपए की मुद्रा चाहिए थी। युवा बेटी ने फैसला सुनाया कि हमें प्री-पेड बूथ से ही ऑटो करना चाहिए। हम पांच थे, असलिए हमें दो ऑटो करने थे। यह सुनते ही एक ऑटोवाले ने बताया कि प्री-पेड में एक ऑटो के एक सौ पचहत्तर लगते हैं। मेरी जिज्ञासा वृत्ति प्रबल हो गई। मैंने पूछा -- अगर इससे कम रकम पर वहां ऑटो मिलता हो, तो? आप कहीं झूठ तो नहीं बोल रहे हैं? इस पर उस समकालीन इतिहासकार ने कहा झूठ कौन नहीं बोलता? हर धंधे में झूठ बोलना पड़ता है। प्री-पेड बूथ पर इसके साक्ष्य मिल गए। एक ऑटो के लिए मात्र एक सौ बीस रुपए का त्याग अपेक्षित था।

क्या यहां भी किसी पुलिसवाले को तैनात नहीं किया जा सकता था, ताकि वह थाने में बलात्कार वगैरह करने के बदले ऑटोवालों को मीटर पर चलने का कानून याद दिलाता रहे? 000

Friday, June 12, 2009

आज का मुद्दा

मार्क्सवाद के बचाव में
राजकिशोर



गिरे हुए घोड़े को पीटना न तो साहस की बात है और न बुद्धिमानी की। मार्क्सवाद की आलोचना पढ़ते समय अकसर मुझे यही मुहावरा याद आता है। सोवियत संघ में साम्यवादी व्ययस्था के भंग होने और स्वयं संघ के छिन्न-भिन्न हो जाने के बाद मार्क्सवाद दुर्गति को प्राप्त एक विचार-व्यवस्था है। उसके बाद लोगों को चीन से थोड़ी उम्मीद रह गई थी, लेकिन उसने भी सर्वग्रासी पूंजीवाद के सामने घुटने टेक दिए। साम्यवादी व्यवस्था के अन्य छोटे-मोटे केंद्रों में तानाशाही बची है, साम्यवाद गायब है। जहां तक भारत के मार्क्सवादियों का सवाल है, उन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत ही नहीं पड़ी। स्वयं उनका ऐसा कोई आग्रह नहीं था। अगर होता, तो पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार, जो व्यवहार में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की ही सरकार है, इतने दिनों तक टिकी नहीं रह सकती थी। केरल और त्रिपुरा पर भी यही तर्क लागू होता है। जब मार्क्सवादियों से खतरा महसूस होता था, तब केरल में उनकी पहली सरकार को कुछ ही महीनों बाद, बिना किसी लोकतांत्रिक ग्लानि के, गिरा दिया गया था। उससे हमारे मार्क्सवादियों ने यह सीख ली कि सिद्धांत और सत्ता के बीच चुनाव हो, तो सत्ता को ही चुनना चाहिए। इसके पहले उन्होंने तेलंगाना में सरकारी दमन का थोड़ा-सा अनुभव होते ही ‘क्रांति के लिए हिंसा’ का सिद्धांत त्याग दिया था।
अब नक्सलवादी समूह ही इस नीति पर टिके हुए हैं। लेकिन उनका प्रभाव चाहे जितने जिलों में बढ़ जाए, किसी को भी यह विश्वास नहीं है कि वे कभी भारत की केंद्रीय सत्ता पर या किसी राज्य पर नियंत्रण हासिल कर सकते हैं। अपने प्रभाव क्षेत्रों में भी उन्होंने कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई है जिससे साम्यवाद के बुनियादी मूल्यों की झलक मिल सके। नेपाल में, सुनते हैं, कम्युनिज्म का बहुत जोर है। लेकिन हाल ही में उसके सबसे बड़े या काफी बड़े नेता प्रचंड के बारे में जो कुछ पढ़ने को मिला – कि उनकी कलाई में दो लाख रुपए की राडो घड़ी बंधी होती है, कि वे एक बहुत मंहगी कार में चलते हैं, कि उनकी कार के पीछे कारों का एक काफिला चलता है, कि उनका वजन कुछ ही समय में बीस किलोग्राम बढ़ गया है, कि वे रोज शाम को महंगी शराब पीते हैं -- उससे यह यकीन नहीं होता कि नेपाल में साम्यवादी व्यवस्था कायम हो सकती है। या, जो साम्यवादी व्यवस्था कायम होगी, वह साम्यवादी ही होगी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार आदि देशों में तो कम्युनिज्म का सपना देखनेवाले भी कुछ हजार की संख्या में ही होंगे। इस तरह, दूर देखें या नजदीक साम्यवाद का कोई भविष्य नजर नहीं आता। और, यह अच्छा ही है। जिस तरह के साम्यवादों से हमारा पाला पड़ता रहा है, उसका कोई भविष्य होना मानव अधिकारों का कोई भविष्य नहीं होना है। साम्यवाद रहे या जाए, मानव अधिकारों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। कोई भी वाद मनुष्य से बड़ा नहीं है।

भारत में या शायद दुनिया भर में ही समाजवादियों और मार्क्सवादियों के बीच आपसी व्यर्थ का झगड़ा चलता रहा है। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ बहुत बड़े समाजवादी थे। लेकिन मार्क्सवादियों के साथ उनकी कभी नहीं पटी। राममनोहर लोहिया एशियाई देशों के सबसे ऊंचे समाजवादी थे, पर साम्यवाद को वे हमेशा संदेह की निगाह से देखते रहे। दूसरी ओर, मार्क्सवादी समाजवादियों पर लगातार हमला करते रहे हैं। इसकी शुरुआत मार्क्स के समय में ही हो गई थी। वे अपने समाजवाद को छोड़ कर, जो उनकी निगाह में एकमात्र वैज्ञानिक समाजवाद था, समाजवाद की बाकी विचारधाराओं को यूटोपियाई मानते थे। आज तक यह परंपरा चली आ रही है। मेरा प्रस्ताव है कि बदली हुई परिस्थिति में अब तो दोनों को ही आपसी भेदभाव का त्याग कर देना चाहिए। विश्वीकरण के परिणामस्वरूप आज दुनिया भर में समता के प्रत्येक विचार पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। आर्थिक तथा अन्य प्रकार की विषमताओं को ही मानवता के लिए वरेण्य माना जा रहा है। समता की अवधारणा किसी भी प्रकार के सामंतवाद या पूंजीवाद को स्वीकार या बर्दाश्त नहीं कर सकती।

दुख की बात यह है कि समाजवादी शायद इस प्रकार के गंठबंधन या संयुक्त मोर्चा को स्वीकार भी कर लें, मार्क्सवादी ऐसा नहीं होने देंगे। वे एक ऐसी श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित रहते हैं जो उन्हें किसी भी वैचारिक समुदाय में अलग-थलग बनाए रखती है। वे सोचते हैं कि दुनिया की आधी बुद्धि उनके पास है और बाकी आधी में दूसरों का साझा है। या शायद, वे ही बुद्धिमान और नि:स्वार्थ हैं और बाकी सब मूर्ख और निहित स्वार्थवाले हैं। सभी पंडितों ने कहा है कि ज्ञानी को विनम्र होना चाहिए – विद्या ददाति विनयं। मेरा खयाल है, आधुनिक विद्वान भी इससे असहमत नहीं होंगे। वे जान गए हैं कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और कोई भी ज्ञान संदिग्ध हो सकता हैै। मेरा ज्ञान ही अंतिम तथा परम वैज्ञानिक है, यह भ्रम मार्क्स तथा उनके साथियों को भी था। लेकिन वे क्षम्य हैं, क्योंकि वे अभियानी या आंदोलनी लोग थे और सभी अभियानियों और आंदोलनी लोगों में ऐसा ही तगड़ा आत्मविश्वास होता है। यहां तक कि यह महात्मा गांधी और गांधीवादियों में भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसके कारण दुनिया की अपार क्षति हुई है। ज्ञानियों में एक ही राह का पथिक होने की समझदारी और सहयोगिता होनी चाहिए।

लेकिन सिंगूर या नन्दीग्राम के कारण जो नए मार्क्सवाद की तलाश पर जोर दे रहे हैं, उन्हें अपने आग्रह पर पुनर्विचार करना चाहिए। नंदीग्राम में जो दिखाई पड़ रहा है, क्या वह मार्क्सवाद ही है? कौन-सा मार्क्सवादी दल या शासन सिंगूर की जमीन किसी उद्योगपति को उपहार में दे सकता है? ध्यान देने की बात है कि भारत के ही अनेक मार्क्सवादियों और मार्क्सवादी संगठनों ने सीपीएम के इस आचरण की घोर निंदा की है। इस सिलसिले में अशोक मित्र का लेख एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम के बाद जिन मार्क्सवादियों की आंख खुली है, वे या तो बहुत भोले लोग हैं या फिर छंटे हुए बदमाश हैं। सच यह है कि सीपीएम ने सत्ता का उपयोग (उपभोग) करते हुए एक भी काम ऐसा नहीं किया है, जिससे मार्क्सवादी अंत:करण को थोड़ा भी तोष मिल सके। मार्क्सवाद के नाम पर ज्यादातर समझौतापरस्ती दिखाई गई है या तानाशाही के प्रयास हुए हैं। इसीलिए लाल झंडा अब न्याय या आशा का प्रतीक नहीं रह गया है। फिर भी लाल झंडे के प्रति मजदूर वर्ग की श्रद्धा काफी हद तक कायम है, तो इसका कारण वे बुनियादी प्रतिबद्धताएं हैं जिनका वह प्रतीक बन चुका है। सूरज के डूब जाने के बाद भी उसकी आभा काफी समय तक बनी रहती है।

लेकिन यह पाप किसका है? पुजारी और भक्त अगर मदमत्त और व्यभिचारी हो गए है, तो क्या इसके लिए देवता को ही दोषी ठहराया जाएगा? क्या गांधीवाद के ऑफिशियल उत्तराधिकारियों में गांधी के तेज का कोई चिह्न दिखाई पड़ता है? क्या जवाहरलाल को भी गांधीवादी मानना पड़ेगा, जिनकी नीतियों ने राष्ट्रीय बरबादी का श्रीगणेश किया? क्या इस सब की जिम्मेदारी महात्मा के खाते में ही डाली जाएगी? आज मुलायम सिंह और जार्ज फर्नांडिस को जिन निकृष्ट चीजों का सशक्त प्रतीक माना जाता है, उनके लिए लोहिया को ही गिरफ्तार किया जाएगा? हम यहां सामान्य पतन की बात नहीं कर रहे हैं जो किसी भी महापुरुष या श्रेष्ठ विचार के उत्तराधिकारियों या अनुयायियों में देखा जाता है। आकाश से गिरा हुआ जल धरती पर आ कर कुछ मटमैला हो ही जाता है। पर अद्वैतवाद को माननेवाला समुदाय जातिवादी या अछूतवादी हो जाए या महावीर के पुजारियों को सिर्फ उनके धन से जाना जाए या बैद्ध धर्म को माननेवाले देश भौतिकवाद के कीचड़ में डूबे हुए पाए जाएं, तो यह सामान्य पतन नहीं, विशेष पतन है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री को इसी श्रेणी में रखने का लोभ होता है, लेकिन यह एक सामान्य और लालची महिला की महत्वाकाक्षाओं की संक्षिप्त कथा है, यह बड़े से बड़ा दलितवादी भी जानता है। वैसे भी, हमें अपनी निगाह व्यक्तियों पर नहीं, प्रवृत्तियों और प्रक्रियाओं पर केंद्रित रखनी चाहिए। इसी में आनंद है। व्यक्ति हमेशा इतिहास के औजार नहीं होते, वे अपने स्वभाव और इच्छाओं के भी शिकार होते हैं। यह बात लेनिन, स्टालिन, माओ और कास्त्रो पर भी लागू होती है।

सच यह भी है कि पुजारी अगर होशियार हुआ, तो वह अपने देवता की भी परिशुद्धि कर सकता है। राम के भक्त के लिए यह कतई जरूरी नहीं कि वह अपनी पत्नी को अपहरणकर्ताओं के हाथ से छुड़ाने के बाद उसे अपने घर से निर्वासित कर दे। कृष्ण का भक्त यह कभी नहीं चाहेगा कि उसके मुहल्ले में उसकी छवि बहुगामिता या विवाहिताओं के साथ रासलीला रचानेवाले व्यक्ति की बने। शिवभक्त यह दावा कर सकता है कि भूत-प्रेत में उसका कतई विश्वास नहीं है। आज की राधा आज के कृष्ण से कहेगी कि हे मनमोहन, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, लेकिन मुझे दांपत्य मूल्यों की रक्षा करनी है, इसलिए हम दूर-दूर रहें, यही उचित है। मार्क्सवाद के प्रैक्टिशनर न केवल ऐसा करने में विफल रहे, बल्कि उन्होंने मार्क्सवाद के मूल गुणों का भी त्याग कर दिया, इसीलिए उन्हें लात-घूंसों से दो-चार होना पड़ रहा है। लेकिन मार्क्सवादियों की सारी बुराइयां मार्क्सवाद का ही परिणाम है, ऐसा मानना परिपक्वता का चिह्न नहीं है। मार्क्सवाद के अलावा इस समय और कौन-सी व्यवस्थित विचारधारा है जो शोषित-उत्पीड़ित लोगों के बारे में सततता के साथ सोचती है?
मार्क्स की बहुत-सी भविष्यवाणियां गलत साबित हो गईं, इससे उसका सारा अवदान व्यर्थ नहीं हो गया। पूंजीवाद के मर्म और शोषण की प्रक्रिया को समझने के लिए हर किसी को मार्क्स के पास जाना पड़ता है। इतिहास की बहुत-सी व्याख्या मार्क्सवादी तरीकों का इस्तेमाल किए बिना संभव नहीं है। और भी कई क्षेत्रों में मार्क्स तथा मार्क्सवाद की विशिष्ट भूमिका है। इसलिए जरूरत नए मार्क्सवाद को खोजने की नहीं, पुराने मार्क्सवाद को ही अद्यतन बनाने की है। यह काम मार्क्स की मृत्यु के तत्काल बाद ही शुरू हो जाना चाहिए था। कुछ हद तक यह हुआ भी है, लेकिन राजनीतिक दलों ने पूरी कोशिश की है कि उन्हें इसकी भनक न लगने पाए। वे मार्क्स के कूपमंडूक अनुयायी इसलिए हैं कि कुएं का जल ही उन्हें रास आता है। लघुमानव जो ठहरे। इसलिए उनसे पहली मांग तो यह होनी चाहिए कि वे ओरिजनल मार्क्स का आविष्कार करें। यह मार्क्स उन्हें कभी यह सलाह नहीं देगा कि वे किसानों पर गोली चलाएं। मार्क्स मानते थे कि किसानों का कोई भविष्य नहीं है। लेकिन यह तो गांधी भी जानते थे। इसीलिए उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि किसानों को साल में छह महीने काम करना चाहिए और छह महीने निकम्मा बने रहना चाहिए। गांधी की सलाह थी कि किसानी के साथ घरेलू उद्योग-धंधों को जोड़ना चाहिए। यही बात मशीनरी, उद्योगवाद आदि पर लागू होती है। सच्चा मार्क्सवादी हर चीज के मर्म में जाने का प्रयास करेगा और औद्योगिक संस्कृति में बुराई ही बुराई दिखती है, तो वह उसे प्लेग की तरह की बीमारी समझेगा। वह मानव अधिकारों का भी सम्मान करेगा और कहेगा कि इन अधिकारों का अधिकाधिक विस्तार ही समाजवाद है। इस तरह के आग्रह तभी संभव हैं जब पुराने मार्क्सवाद की बुनियादी आस्थाओं को स्वीकार करके चला जाए।

Thursday, June 11, 2009

सोशल इंजीनियरिंग

फार्मूलों से न जिंदगी चलती है न राजनीति
राजकिशोर


अब हर कोई यह कह रहा है कि उत्तर प्रदेश में मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला फेल हो गया। जब इस फार्मूले के बल पर मायावती उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गईं, उस वक्त कहा जा रहा था कि मायावती का सोशल इंजिनियरिंग का फार्मूला चल निकला। उन दिनों बसपा नेता की कुशाग्र बुद्धि की जम कर प्रशंसा की जा रही थी और यह उम्मीद की जाने लगी थी कि जल्द ही वे भारत की प्रधानमंत्री बन जाएं, तो यह हैरत की बात नहीं होगी। बहन जी खुद भी ऐसा सोचती थीं। यह भी कहा जा सकता है कि बहन जी खुद ऐसा सोचती थीं, इसलिए हमारे विद्वान लोग भी ऐसा ही सोचने लगे थे। हमारे विद्वान देखते तो हैं – पर उधर नहीं जिधर सत्य होता है, बल्कि उधर जिस तरफ हवा चल रही होती है। अब हवा मायावती के उलटी दिशा में चल रही है, तो कहा जाने लगा है कि उन्होंने अपनी बनती हुई इमारत को अपने ही पैरों से धक्का दे कर नेस्तनाबूद कर दिया। विद्वानों को इससे कोई मतलब नहीं है कि सोशल इंजिनियरिंग क्या चीज है, यह कैसे काम करती है और इसका संचालन कैसे करना चाहिए।

अनाड़ी हाथों में पड़ कर अच्छा से अच्छा फार्मूला भी फेल हो सकता है। लेकिन मूल बात यह नहीं है। मूल बात यह है कि फार्मूले गणित और विज्ञान में ही गुल खिला सकते हैं, जहां दो और दो हमेशा चार होते हैं तथा दस में से पांच निकाल दो तो हमेशा पांच ही बचेगा। जिंदगी में ऐसा नहीं होता। यहां चार करो तो नतीजा आठ भी हो सकता है और दो भी हो सकता है। इसी में जिंदगी का रोमांच है। नहीं तो वह एकरस हो जाती। इसीलिए जब से जिंदगी की पेचीदगी बढ़ी है, दुनिया भर में ऐसी किताबों की बाढ़ आ गई है जो सुख से जीने और सफलता पाने के गुर सिखाती हैं। ऐसी किताबों की एक पीढ़ी लोकप्रिय हो जाने के बाद जब बाजार में दम तोड़ देती है, तो उनकी दूसरी पीढ़ी जन्म लेती है। इस तरह सुख-शांति-सफलता-समृद्धि-नेतृत्व देने के फार्मूले पानी के बुलबुलों की तरह पैदा होते रहते हैं और उन्हीं की तरह शीघ्रमृत्यु के शिकार हो जाते हैं। पर जिंदगी इतनी पेचीदा चीज है कि समस्याओं का पैदा होना बंद नहीं होता। बताते हैं कि चुनाव प्रचार के दिनों में लालकृष्ण आडवाणी को जब भी थोड़ा-सा वक्त मिलता था, वे डेल कार्नेगी की एक समय बहुत बिकनेवाली पुस्तक ‘हाउ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लुएंस पीपल’ पढ़ने लगते थे। इसमें दी गई शिक्षाओं के आधार पर आडवाणी ने कितने मित्र बनाए और कितने लोगों को प्रभावित किया, यह कोई नहीं जानता। अगर फार्मूलों पर अमल करने से हर विवाह सफल हो जाता, हर संबंध सरस हो जाता, हर व्यवसाय प्रगति करने लगता और हर क्षेत्र में सफलता मिलती होती, तो धरती पर इतना दुख-दैन्य दिखाई नहीं देता।

फिर भी फार्मूलाबाजी चलती रहती है तो इसीलिए कि सभी लोग सफलता का शॉर्टकट खोजते रहते हैं। पैदल, साइकिल या मोटरगाड़ी के लिए शॉर्टकट हो सकते हैं, पर जिंदगी का सफर इतना सीधा नहीं है। यहां कोई भी फार्मूला काम नहीं करता। हर आदमी को हर चीज की खोज अपने ढंग से करनी होती है। टाटा घराना अपने ढंग से सफल हुआ तो अंबानी ग्रुप अपने ढंग से। बिड़ला परिवार का तरीका कुछ और था। बीआर चोपड़ा और हृषीकेश मुखर्जी, दोनों की फिल्में हिट होती थीं, पर दोनों का फिल्म बनाने का तरीका अलग-अलग था। अमिताभ बच्चन अगर राजेश खन्ना की तरह अभिनय करते और गुलजार आनंद बख्शी की तरह गीत लिखते, तो वे आज इतिहास के डस्टबिन में होते।

मायावती ने जब अवर्ण-सवर्ण एकता तथा सद्भाव की खोज की – किसी नई राजनीति की पीठिका के तौर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक सफलता के शॉर्टकट के रूप में, तो वे एक फार्मूले की रचना कर रही थीं – न उनका निजी परिप्रेक्ष्य बदल रहा था, न उनकी राजनीति में परिवर्तन आ रहा था, न उनके कामकाज के तरीके बदल रहे थे। वे जानती थीं कि ओबीसी उनके साथ आएँगे नहीं, मुसलमान उनके बाएं बाजू की तरह जाना शुरू कर चुके हैं, इसलिए दलितों के साथ चलने के लिए ऊंची जातियों को ही लुभाया जा सकता है, जो अब तक की अपनी उपेक्षा से संतप्त थे। यही मायावती ने किया -- अपनी बुद्धि से किया या किसी सवर्ण सलाहकार की बात मान कर किया, यह मायावती के जीवनीकार जानें। फार्मूला हिट हो गया और उत्तर प्रदेश का मुकुट उड़ते हुए बहन जी के सिर पर आ बैठा। दुर्भाग्यपूर्ण घटना यह हुई कि इसके नतीजे में, इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में, बहन जी का दायित्व बोध तो नहीं जागा, उनकी महत्वाकांक्षा के पटाखे में दियासलाई जरूर लग गई। अब उनके पैर उत्तर प्रदेश नामक अभागे राज्य के जूते से बहुत बड़े हो गए और वे प्रशासन तथा विकास की चुनौतियों को भुला कर दिल्ली का सिंहासन खरीदने के लिए रुपयों का हिमालय खड़ा करने में लग गईं। वे अपनी पार्टी के हर सांसद, विधायक और कार्यकर्ता को, सरकार के हर विभाग को, हर विभाग के हर अफसर को अपने ‘प्रधानमंत्री सहायता कोष’ का चलता-फिरता एटीएम समझने लगीं। यहीं से उनके पैर डगमगाने लगे।

सत्ता महत्वाकांक्षा का बोझ सहन करती है, लेकिन एक हद तक ही। जब उसने एक समय इंदिरा गांधी की आदमकद से बड़ी महत्वाकांक्षाओं का बोझ वहन करने से इनकार कर दिया और उत्तर भारत में कांग्रेस की एक भी सरकार न रहने दी, तो मायावती किस खेत की मूली हैं। अब वे कार्यकर्ताओं और अफसरों को डांट-फटकार रही हैं कि तुम्हीं लोगों के कारण मेरी हार हुई। इसके बजाय अगर वे किसी आदमकद आईने के सामने खड़ी हो जातीं, तो उन्हें अपनी हार के लिए जिम्मेदार एकमात्र व्यक्ति तुरंत दिख जाता। पर यह प्रकृति की माया है कि आंखें खुद को देखने के लिए बनाई ही नहीं गई हैं और आईने के सामने हर आदमी को अपना चेहरा प्यारा लगता है।

सड़क सभी को चाहिए – चाहे वह दलित हो, या पिछड़ा या मुसलमान या बाभन-ठाकुर। बिजली भी सभी को चाहिए। अच्छा प्रशासन किसी एक जाति का जीना सुगम नहीं करेगा, इससे सभी को राहत मिलेगी। यही हाल शिक्षा, स्वास्थ्य आदि से संबंधित संस्थानों का है। गुंडागर्दी सभी के लिए दुखमय है। संक्षेप में यह कि सुशासन का कोई विकल्प नहीं है। मायावती को दिल्ली ले जाने का रास्ता सुशासन से हो कर ही जाता था -- अब भी जाता है, पर उन्होंने सोचा कि नीति, कार्यक्रम और अमल की त्रयी के स्थान पर तिकड़म का अद्वैतवाद ही काफी है। यह सोशल इंजिनियरिंग नहीं, राजनीतिक इंजिनियरिंग थी। इसका फेल होना उतना ही निश्चित था जितना नीम के पेड़ पर आम के उगने की उम्मीद का फेल होना। विधान सभा चुनाव के दौरान पोलिंग बूथ पर तो अवर्ण-सवर्ण एकता हो गई थी, पर इससे सत्ता की जो मदांध राजनीति पैदा हुई, उसने उस अवर्ण समूह के बीच भी दरारें पैदा कर दीं जिसे मायावती अपना फिक्स्ड अकाउंट मानती रही हैं। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सीटों से मायावती के उम्मीदवारों का हारना और क्या बताता है? बहरहाल, मई 2009 का सवाल यह है कि एक फार्मूले के फेल होने के बाद दलित की बेटी कोई और फार्मूला खोजने का यत्न करेगी या कांशीराम के वचन याद करते हुए यह समझने की कोशिश कि राजनीति की नौटंकी क्या होती है और असली राजनीति क्या होती है।

वह एक व्यक्तित्व

रामजी
राजकिशोर


बिहार के उस छोटे-से कस्बे में रामजी से मुलाकात क्या हुई, मेरी जिंदगी में तूफान आ गया। मैं एक छोटी-सी बैठक के लिए वहां गया हुआ था। आयोजक मारुति आठ सौ के एक वृद्ध और बीमार संस्करण में ले जा रहे थे। तभी मुझे यह एहसास हुआ कि मेरे एक पांव की चप्पल बहुत ढीली है। वैसे तो चप्पल की कसी हुई गिरफ्त से मुक्ति के बाद उस पांव को उस सुख का अनुभव हो रहा था जो किसी पिंजरे के पक्षी को अनंत आकाश में वापसी से मिलता है, पर समस्या यह थी कि कार से उतरने के बाद बैठक की जगह तक घिसटते हुए जाना पड़ेगा। सो फुटपाथ पर एक जूता-चप्पल ठीक करने वाले को देख कर गाड़ी रुकवाई और अपनी सिलाई खुली चप्पल को उसके हवाले कर दाएं-बाएं नजर घुमाने लगा।
सड़क (उसे सड़क कहना अपने भीतर की सारी उदारता को उड़ेल देना है) के इस पार मुआयना पूरा कर लेने के बाद उस पार नजर दौड़ाई तो एक आकृति को धुंधली नजर से देख कर मन एक ही छलांग में चालीस साल पीछे भाग चला। कहीं यह वही रामजी तो नहीं है जो मेरे साथ एमए तक पढ़ा था? हम पढ़ाकुओं और लद्धड़ों के बीच वह एक अलग ही जीव था। पढ़ाई-लिखाई में जितना प्रखर उतना ही लोकप्रिय। वह हर किसी का और हर कोई उसका चहेता था। खासकर चपरासियों, चाय की दुकानवालों, मजदूरों आदि से उसकी खूब पटती थी। एक बार उसके घर गया था, तो वह मुहल्ले के सारों बच्चों के साथ खेल रहा था। रामजी न केवल हमेशा अच्छे नंबरों से पास होता, बल्कि उसे दुनिया भर की इतनी जानकारियां थीं कि हम दोस्तों में से हरएक चकित रह जाता। एक बार वह इस ब्रह्मांड की विराटता का वर्णन करने लगा जो हम सकते में आ गए। हम अपनी नजर में पहले चूहे, फिर मक्खी और आखिर में भालू के एक बाल से भी नीचे आ गिरे। वह गाता बहुत अच्छा था और फुटबाल का अच्छा खिलाड़ी था।
जब तक मेरी चप्पल मेरे पांव को कस कर दबाए रखने योग्य बन गई, मैं नंगे पांव रामजी से मिल आया। हां, यह वही था - अपनी मस्त हंसी, समझदार भाव भंगिमा और आवयविक फुर्ती के साथ। दर्जी की दुकान में कपड़ा सिल रहा था। मैंने उससे कहा कि बैठक पूरी होने के बाद मैं आता हूं। एक दराज से एक सफेद रूमाल निकाल कर मेरे हाथ पर रखते हुए वह बोला - जेब में रख लो, पसीना पोंछने के काम आएगा।
रामजी का रूमाल वाकई काम आया। बैठक इतनी बेहूदा थी कि मुझे अपने आने पर पछतावा होने लगा। लग रहा था कि देश में अब स्वस्थ चर्चा की कोई गुंजाइश नहीं है। सो बैठक खत्म होने की घोषणा होते ही ऐसा महसूस हुआ जैसा किसी बच्चे को उस वक्त महसूस होता है जब किसी बौड़म और सख्त ट्यूटर के जाने का समय हो जाता है। लंच यह बता कर छोड़ दिया कि मुझे एक मित्र के साथ खाना खाना है।
दोपहर के दो बज चुके थे। रामजी ने पास के ‘पवित्र हिन्दू होटल’ से दो थालियां मंगवाईं और हम खाते-खाते बात करने लगे। मेरे बारे में उसे थोड़ा-बहुत मालूम था। उसकी रामकहानी सुनते हुए मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि हंसी या रोऊं। रामजी के ही शब्दों में, ‘राज, पढ़ाई से मेरा मन तब एकदम उचट गया जब मुझे पीएचडी के लिए इस तरह के विषय सुझाए जाने लगे -- रामचरितमानस के पात्रों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन, कामायनी में शैव दर्शन का स्वरूप, प्रयोगवाद के सांस्कृतिक आयाम...। मैंने सोचा, इससे बेहतर है चाय की दुकान खोल कर बैठ जाना। फिर डॉक्टरेट करके होगा भी क्या? लेक्चरर बन जाऊंगा और भविष्य के लेक्चरर पैदा करूंगा। यह तो किसी प्रजाति की निरंतरता बनाए रखने का पेशा है। स्कॉलरशिप मिलने का पूरा चांस था, पर मुझे लगा, यह खेत मेरे लिए नहीं है। असली खेती यानी किसानी इससे बेहतर है। पर इसके लिए खेत चाहिए था। सो मैंने दर्जीगीरी सीखी और यहां आ कर जम गया।’
आगे का किस्सा यों है, ‘राज, तुमसे कोई तुलना नहीं है, पर बहुत मौज में हूं। यहां हम दो दर्जी हैं। बारी-बारी से काम करते हैं। एक दिन उसकी, दूसरे दिन मेरी छुट्टी। वह शायरी करता है। मैं अखबार और किताबें, जो भी मिल जाती हैं, पढ़ता हूं, संगीत सुनता हूं, बीस-पचीस घरों में आता-जाता हूं और जब कुछ भी अच्छा नहीं लगता, तो सो जाता हूं।’
‘और शादी?’ मेरी इस जिज्ञासा पर वह ठठा कर हंस पड़ा। बोला, ‘शादी वह करे जिसमें थोड़े-से सुख के बदले अपार दुख सहने की क्षमता हो।’
रामजी से हाथ मिला कर विदा लेने के बाद से मैं सुख-दुख की परिभाषा तय करने में मशगूल हूं। 000

फेंको मत, प्रयोग करो

गांधी कलम का संदेश
राजकिशोर


लेखकों और पत्रकारों को कलम का सिपाही, कलम का मजदूर, कलमजीवी, कलमवीर आदि-आदि कहा जाता है। पत्रकार विनम्रतावश अपने को कलमघसीट कहते हैं, जो अंग्रेजी के पेन-पुशर का सटीक अनुवाद है। अब कम्प्यूटर तेजी से कलम का स्थान लेता जा रहा है। अनेक पत्रकार कबीर की तरह, लेकिन एक भिन्न अर्थ में, यह दावा कर सकते हैं कि मसि-कागद छूओ नहिं, कलम गही नहिं हाथ। लेकिन बहुत से लेखक-पत्रकार अभी भी कलम ही चलाते हैं। साथ ही, अभी भी बहुत-से काम कलम से ही होते हैं। कंप्यूटर का प्रयोग कितना ही व्यापक क्यों न हो जाए, कलम तो रहेगी। कुछ लेखकों को सुंदर और महंगी कलमों का शौक होता है। कई बड़े गर्व से बताते हैं कि उन्हें पहली पारकर कलम किस उम्र में मिली थी। ऐसा लगता है कि लैपटॉप, पामटॉप और कोई नया टॉप आने के बाद भी अच्छी और महंगी कलमों का, जैसे खूबसूरत और महंगी घड़ियों का, शौक हमेशा बना रहेगा। कुछ ऐसे भी होंगे जो कपड़े साधारण पहनेंगे, खाना भी साधारण खाएंगे, लेकिन जेब में रखेंगे कोई महंगी कलम ही। लेकिन यह दूसरी बात है। मैं यहां जिस चीज की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं, वह कलम की तकनीक के बारे में है, जिसके साथ उसका अर्थशास्त्र भी जुड़ा हुआ है।
निबवाली कलम की उम्र लंबी रही है। उसके पहले सरकंडे की कलम का इस्तेमाल होता था। गणेश जी की कलम शायद मोरपंखी की थी। लेकिन गांधी जी ने जिस कलम से हजारों या शायद लाखों चिट्ठियां लिखीं, वह कलम-दावातवाली कलम ही थी। हम सभी ने बचपन में इसी कलम का इस्तेमाल किया है। यह कलम सस्ती पड़ती थी और निब बदलते हुए एक कलम को साल-साल भर या उससे ज्यादा भी चलाया जा सकता था। उसके बाद आया फाउंटेनपेन। यह एक दर्जा बेहतर था। अब कलम के साथ दावात रखने की मजबूरी खत्म हो गई। मेरा खयाल है, फाउंटेनपेन सभ्यता का एक सुंदर उपहार है। उससे हस्तलिपि भी अच्छी बनती है। लेकिन बॉल पेन ने उसका जनाजा निकाल दिया। इस कमबख्त ने हमारे जीवन में उत्सव की तरह प्रवेश किया और दैनंदिनी की तरह छा गया। बॉल पेन में सुविधा भी बहुत है। फर्राटे से लिखो और रिफिल खत्म हो जाए, तो उसे निकाल कर फेंक दो और उसकी जगह नई रिफिल डाल दो। बॉल पेन अभी भी अपनी उसी मस्ती के साथ चल रहा है। लेकिन इस बीच तरह-तरह की कलमें आ गई हैं, जैसे जेल पेन, रोलर पेन आदि। ये सभी बॉल पेन की ही भाई-बहनें हैं। इनकी रिफिल भी लगातार बदलनी पड़ती है। कुछ कलमों की तो रिफिल मिलती भी नहीं। लिखते रहो, स्याही खत्म हो जाए तो फेंक दो। यूज एंड थ्रो। आजकल दुकान में जाओ, तो निबवाली कलम मुश्किल से दिखाई पड़ती है। गनीमत यह है कि वह अभी भी बची हुई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट लिखी जा चुकी है, पर रोगी जिंदा है, अगरचे वह लंबी-लंबी सांसें ले रहा है। मेरा प्रस्ताव यह है कि इस रोगी को जीवन दान मिलना चाहिए। नहीं तो कलमों के कचरे से ही एक दिन इस धरती का आंगन भर जाएगा और दिनकर के कुरुक्षेत्र के एक पात्र की तरह हम पछताएंगे कि नर का बहाया रक्त, हे भगवान मैंने क्या किया।
आजकल हम जिन कलमों का इस्तेमाल करते हैं, वे स्वयं कचरा नहीं हैं, पर कचरा जरूर पैदा करती हैं। जिंदगीरहित रिफिल, जो फेंक दिए जाने पर दशकों या शताब्दियों तक जमींदोज होने के लिए तैयार दिखाई नहीं देते। प्लास्टिक या लोहे की खपत मांगनेवाली कलम की बॉडी, जो अपनी उपयोगिता खो देने के बाद भी निश्चिह्न होना नहीं चाहती। प्लास्टिक की हुई, तो उसके साथ भी वही खतरा है जो प्लास्टिक की थैलियों के साथ है। यह विचित्र है कि प्लास्टिक की थैलियों के प्रति तो जागरूकता पैदा हो गई है और कई राज्यों में नहीं तो कई शहरों में उन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया है। लेकिन प्लास्टिक की कलमों तथा अन्य उत्पादों के प्रति मोह बना हुआ है। कल्पना कीजिए, जब पूरा भारत शिक्षित हो जाएगा (हे ईश्वर, वह दिन कब आएगा? आएगा भी कि नहीं?) तब देश भर में कितनी कलमों की जरूरत पड़ेगी? उनमें कितना प्लास्टिक लगेगा, उनके लिए कितनी रिफिलें लगेंगी और इन सबको कहां दफनाया जाएगा? दफनाए जाने के बाद ये पंचभूत में कब विलीन होंगे? अंतिम संस्कार के इस महंगे खेल में यूरोप के छोटे-छोटे और समृद्ध देश तो हिस्सा ले सकते हैं, पर हम भारतवासियों को तो नानी याद आ जाएगी। क्या अभी से इसका कुछ उपचार करना आवश्यक नहीं है? या, जब तक प्यास नहीं लगेगी, कुएं नहीं खोदे जाएंगे?
कोई कह सकता है कि यह आशंका अतिरंजित है। मेरा अपना अनुभव यह है कि बहुत-से मामलों में अतिरंजना के जरिए ही सत्य का साक्षात्कार होता है। बहरहाल, यदि यह अतिरंजना है, तब भी इसका उपयोग है। सौ-पचास झीलों का सूख जाना दुनिया के सभी झीलों के सूख जाने की भविष्यकथा हो सकती है। न भी हो, तो हम ऐसा काम करें ही क्यों जिससे एक झील भी सूख सकती है? खास तौर से तब जब वह काम कतई जरूरी न हो। इस आशंका के विरुद्ध एक और तर्क दिया जा सकता है। यह तर्क है पुनर्चक्रण का। यह पुनर्चक्रण एक यूरोपीय बीमारी का नाम है। हम किसी चीज का बार-बार और नए-नए तरीके से इस्तेमाल तो कर सकते हैं जैसे त्यागी हुई धोतियों और साड़ियों का बहुविध इस्तेमाल हमारी मांएं-दादियां-नानियां करती थीं। बड़ों के उतारे हुए कपड़े छोटे पहनते थे। स्वयं गांधी जी ने अपने जीवन में इसके दर्जनों प्रयोग किए। वे अनेक चिट्ठियां इस्तेमालशुदा लिफाफों की खाली जगह पर लिखा करते थे। धोती को फाड़ कर रूमाल बना लेते थे। पर आधुनिक सभ्यता का यह कबूल नहीं है। वह चीज नई और ताजा देखना चाहता है। साधन सीमित हैं और वे हमेशा सीमित ही रहेंगे। इसलिए उसने पुनर्चक्रण की टेक्नोलॉजी निकाली है। लेकिन यह टेक्नोलॉजी इतनी महंगी है कि इसका इस्तेमाल अमीर समाज ही कर सकते हैं। गरीब देश ऐसा करने का प्रयास करेंगे, तो उनका भट्टा बैठ जाएगा। भारत में जहां जहां कचरे, पानी आदि के पुनर्चक्रण के प्लांट लगे हैं, उनमें से ज्यादातर फेल हो चुके हैं। इसलिए हमें एक चक्र से ही संतुष्ट रहना चाहिए। ज्यादा बहादुरी नहीं दिखानी चाहिए।
कलम के मामले में भी यह उतना ही सच है। आखिर बॉल पेन, जेल पेन या रोलर पेन से वही काम होता है जो निबवाली कलम से हो सकता है। यह कलम किफायती भी है -- स्याही चुक जाए तो फिर डाल दो और लिखते रहो। अगर इस कलम की बॉडी प्लास्टिक की भी हो, तो दीर्घजीवी होने के कारण पर्यावरण का नाश करनेवाला कचरा कम पैदा करेगी। हम चाहें तो इसका नाम गांधी पेन रख सकते हैं। गांधी पेन इसलिए कि यह किफायत की राह दिखाती है और कम से कम में काम चलाने के दर्शन की ओर ले जाती है। मूल सवाल इस या उस कलम का नहीं है। मूल सवाल यह है कि हम उपभोक्तावाद (इस्तेमाल करो और फेंको --यह दृष्टि चीजों पर इस्तेमाल होते-होते जब स्त्री-पुरुषों पर लागू होने लगती है, तब हम इस आधुनिक सभ्यता को ही कोसने लगते हैं। एक समय अरुण शौरी ने कहा था कि संपादकों की स्थिति निरोध जैसी हो गई है। उनका अनुकरण करते हुए हम कह सकते हैं कि कलम की हैसियत भी निरोध जैसी हो गई हैे), का शिकार होना पसंद करेंगे या छोटी से छोटी चीज की तरफ ध्यान देते हुए उसके निर्दय पंजों से बाहर निकलने की सोचेंगे? उत्पादनकर्ता तो यह चाहेगा ही कि उसका माल ज्यादा से ज्यादा बिके। यूज एंड थ्रो की संस्कृति का राज इसी में छिपा हुआ है। यह उत्पादकता नहीं, उत्पादन बढ़ाने का रास्ता है। ज्यादा उत्पादन यानी ज्यादा आय यानी अधिक जीडीपी। इसी को आर्थिक संवृद्धि कहा जाता है – बिना इस पर विचार किए कि अच्छी चीज वह है जिसका इस्तेमाल ज्यादा दिनों तक और किफायतशारी के साथ किया जा सकता है। गांधी कलम यही काम करेगी।
कोई लेखक अपने पूरे जीवन काल में (यहां उनकी बात नहीं की जा रही है जो चंद्रधर शर्मा गुलेरी की तरह तीन-चार कहानियां लिख कर अमर हो जाना चाहते हैं) अगर निबवाली बीस कलमों का इस्तेमाल करता है, तो वह उतने ही पन्ने रंगने के लिए रिफिलवाली दो सौ कलमों का इस्तेमाल करेगा। हो सकता है, और ज्यादा ही, क्योंकि सभी रिफिलें अच्छी नहीं होतीं और आठ-दस पन्नों के बाद ही टें बोल जाती हैं। विचारणीय यह भी है कि रिफिल या जेलवाली कलमों के लिए उच्चतर टेक्नोलॉजी की जरूरत होती है, जब कि निबवाली कलमों का उत्पादन मामूली टेक्नोलॉजी से भी किया जा सकता है। वैज्ञानिकता (और आधुनिकता भी, अगर बुद्धि से इसका संबंध पूरी तरह से टूट नहीं गया है) इसमें नहीं है कि जो काम पांच रुपए से हो सकता है, वही काम पचीस रुपए में किया जाए। जो बेवजह ज्यादा खर्च करता है, उसे मंद-अकल नहीं तो और क्या कहा जाएगा? जितनी जल्द हम इस बात को पकड़ लें कि उद्योगपति वही होशियार है जो ग्राहकों को बेवकूफ बना कर अपनी जेब भरता जाए, उतनी ही जल्द हम भी अपनी बुद्धि का इस्तेमाल शुरू कर देंगे और उद्योगपति के झांसे में न आ कर अपना चुनाव स्वयं करेंगे।
आजकल हिन्द स्वराज्य की बड़ी चर्चा है। जिसे देखो, वही गांधी जी के संदेश की चिरंतन प्रासंगिकता का चारण गान किए जा रहा है। इस सिलसिले में गांधी का यह वाक्य भुला दिया जाता है कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। गांधीवाद को गांधी के बाहर खोजना नादानी है। यह विद्वत्ता की चीज नहीं, बरतने की चीज है। गांधी की प्रशंसा इस बात में नहीं है कि उनके जीवन या विचारों पर कितने सफेद पन्ने स्याह किए गए। जो गांधी की राह पर चलने की यथासाध्य कोशिश करेगा, वही गांधीवादी होने का यत्किंचित दावा कर सकता है। गांधी पेन इसका एक उदाहरण है। अगर हम गांधी पेन के पीछे कार्यरत विचार से सहमत हैं, तो गांधी सड़क, बस, गांधी रेल, गांधी घर, गांधी ऑफिस, गांधी सभागार, गांधी सिनेमाघर, गांधी कार, गांधी अखबार आदि की भी कल्पना कर सकते हैं। यह विचार आग की तरह फैलता है तो भारत में न अतिशय गरीबी रहेगी न अतिशय अमीरी। 000

Wednesday, June 10, 2009

राजनीति में फुरसत

गैर-मंत्री सांसदों के अगले पांच साल
राजकिशोर


केंद्र में सरकार गठन का काम पूरा हो गया। मंत्रियों ने अपने-अपने विभाग की जिम्मेदारी संभाल ली है। अभी वे अपने-अपने कमरों की साज-सजावट पर ध्यान दे रहे हैं। आशा है, इसके बाद विभागीय जिम्मेदारियों के निर्वाह का नंबर आएगा। जो पांच साल तक मंत्री बने रहेंगे, उनके पास काम ही काम रहेगा। जो करेंगे, उनकी वाहवाही होगी। जो नहीं करेंगे, वे पछताएंगे। इस बार के चुनाव से साफ हो गया है कि अब मतदाता आंख मूंद कर वोट नहीं देता। उसकी प्रतिबद्धता पार्टी या व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि परफॉर्मेंस के प्रति है। करोगे तो पाओगे, नहीं तो जाओगे।

लेकिन सभी सत्ताधारी सांसद मंत्री नहीं बन सकते। उनकी एक-चौथाई संख्या भी मंत्री नहीं बन सकती। फिर बाकी सांसद क्या करेंगे? बेशक इनमें से कुछ की सांगठनिक जिम्मेदारियां होंगी। कुछ की व्यस्तता अन्य प्रकार की हो सकती है, जैसे पार्टी का छात्र या मजदूर संगठन संभालना। लेकिन अन्य सांसद पांच वर्ष का यह लंबा समय किस तरह बिताएंगे? क्या वे पर्यटन पर निकल जाएंगे या तीर्थयात्रा करेंगे? क्या वे तरह-तरह की दलाली में लग जाएंगे जो आजकल राजनीतिकारों का एक प्रिय पेशा बन चुका है?

सांसदों को एक काम सरकार ने दिया हुआ है। वह है हर साल दो करोड़ रुपए खर्च करना। इसे स्थानीय क्षेत्र विकास कोष या एमपी फंड कहते हैं। पिछली लोक सभा के रिकॉर्ड देखा जाए, तो शायद ही किसी सांसद ने पांच साल में पूरे दस करोड़ रुपए खर्च किए। किसी-किसी ने तो पंद्रह-बीस प्रतिशत रकम ही खर्च की। यानी जो रुपया लौट गया, वह जनता का काम में लग सकता था, पर नहीं लगा। किसी गरीब देश में यह जन द्रोह से कम नहीं है। जनता का पैसा, जनता के लिए दिया गया पैसा सिर्फ इसलिए जनता के काम नहीं आ सका, क्योंकि बीच में एक निठल्ला सांसद था। आशा है, इस बार ऐसे निठल्ले सांसदों की संख्या में कमी आएगी या उनका निठल्लापन कम होगा।

लेकिन साल भर में दो करोड़ रुपयों के प्रोजेक्ट बनाना और जिला प्रशासन के माध्यम से उन्हें लागू कराना कोई इतना बड़ा काम नहीं है जो सांसद महोदय को दिन भर में कम से कम आठ घंटे व्यस्त रख सके। इसके लिए तो दिन भर में एक घंटा भी जरूरत से बहुत ज्यादा है। फिर बाकी बचे हुए घंटों का क्या होगा?

यह सवाल अकसर हमारे सांसदों के सामने अपनी प्रश्नवाचकता के साथ उपस्थित नहीं होता, तो इसका एक बड़ा कारण हमारी संसदीय राजनीति का चरित्र है। इस राजनीति का मुख्य लक्ष्य है मंत्री बनना और पार्टी के किसी महत्वपूर्ण पद पर काबिज होना। इसके अलावा किसी के पास कोई काम नहीं होता। न पार्टी उन्हें कोई काम सौंपती है, न वे अपने लिए कोई काम निकाल पाते हैं। पांच वर्ष की इस निष्क्रियता से सांसद तथा पार्टी और जनसाधारण के बीच कोई संपर्क सूत्र बन नहीं पाता। इसीलिए यह मुहावरा रूढ़ हो चुका है कि चुनाव का मौसम आया, तो नेताजी अपने चुनाव क्षेत्र में दिखाई पड़ने लगे। बाकी समय तो वे गधे की सींग की तरह गायब रहते हैं।

मेरा विनम्र सुझाव है कि यह सूरत अब बदलनी चाहिए। लोक सभा चुनाव के पहले तक लोगों में राजनीतिकारों के प्रति गुस्सा ही गुस्सा था। सभी को लग रहा था कि हम इस विलासी और निकम्मी फौज को बेवजह पाल रहे हैं। ये किसी काम के नहीं रहे। यहां तक कि ये नागरिकों के जान-माल की रक्षा भी नहीं कर सकते। आतंकवाद के सामने इनकी घिग्घी बंध जाती है। आज के समय में, खासकर विकासशील देशों में, राजनीति ही हर चीज की धुरी है। अगर राजनीति में घुन लग चुका है, तो सार्वजनिक जीवन का कोई भी कोना स्वस्थ नहीं रह सकता। लेकिन मनमोहन सिंह की सरकार दुबारा बनने पर ऐसा लगता है कि देश में कुछ उत्साह का संचार हुआ है। लोग उम्मीद करने लगे हैं कि अब राजनीति की भूमिका में कुछ सकारात्मक बदलाव आएगा। सरकार ज्यादा मुस्तैदी से काम करेगी। विकास के नए-नए कार्यक्रम बनेंगे और उन पर चुस्ती से अमल होगा। उत्साह के इस माहौल को हमारे गैर-मंत्री सांसद चाहें तो और मजबूत कर सकते हैं।

किसी भी लोक सभा क्षेत्र में बहुत सारे काम होते हैं। एक बड़ा काम यह निगरानी करना है कि सरकारी योजनाओं पर ठीक से अमल हो रहा है या नहीं। काम की गुणवत्ता के मानकों का पालन हो रहा है या नहीं। कार्य पालन में किसी तरह का भ्रष्टाचार तो नहीं है। यह काम कोई भी सांसद अकेले नहीं कर सकता। इसके लिए उसे स्थानीय स्तर पर जन संगठन बनाना होगा। इसमें स्थानीय विधायकों का भी सहयोग लिया जा सकता है। दूसरा काम है जनसाधारण की शिकायतों का निराकरण। लोग सरकार के महकमों में अपनी शिकायत या दरख्वास्त जमा करते हैं और ये बरसों लटके रहते हैं। इसका निवारण करने में सांसद की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में ऐसे दस-बारह केंद्र खोले जाने चाहिए जहां लोग अपनी शिकायतों और दरख्वास्तों की फोटो कॉपी जमा कर सकें। यह सांसद के चुनाव क्षेत्रीय कार्यालय का कर्तव्य होगा कि वह संबंधित विभागों से बात कर इन शिकायतों और दरख्वास्तों का निराकरण कराए। सिर्फ इतने से जमीनी स्तर पर जबरदस्त परिवर्तन आ सकता है। अभी सरकार और अफसरशाही होते हुए भी लोग अपने को अनाथ और असहाय महसूस करते हैं। एक कर्तव्यनिष्ठ और सक्रिय सांसद जनता के भरोसेमंद अभिभावक का काम कर सकता है।

इसी तरह, सांसद अपने क्षेत्र में कई प्रकार की सामाजिक पहलों की शुरुआत कर सकता है। सभी काम सरकारी स्तर पर नहीं हो सकते। समाज को भी पहल करनी होती है। प्रौढ़ शिक्षा के केंद्रों का सुचारु संचालन, स्कूलों-कॉलेजों-अस्पतालों के काम-काज की निगरानी, स्वास्थ्य केंद्रों में लापरवाही के आलम को दूर करना, राशन सिस्टम को चुस्त, दुरुस्त और भ्रष्टाचार-मुक्त करना, पुलिस को मनमानी न करने देना, स्थानीय परिवहन को सुव्यस्थित करना, न्यूनतम मजदूरी के कानून का पालन करना -- इस तरह के दर्जनों काम हैं जो सांसद के नेतृत्व में स्थानीय जन की सक्रियता से ही संभव हैं। ये सभी काम ऐसे हैं जिनमें न हर्रे लगना है न फिटकरी, पर रंग हमेशा चोखा आना है। इसी तरह सामाजिक कुरीतियों को दूर करने का काम स्थानीय पहल से ही हो सकता है।

इसके लिए आवश्यक है सांसद में यह महत्वाकांक्षा जगना कि उसका चुनाव क्षेत्र किसी भी अर्थ में अविकसित नहीं रहेगा। लोग जागरूक और सक्रिय होंगे। प्रशासन की आम बुराइयां खत्म हो जाएंगी। कहना न होगा कि ये कोई क्रांतिकारी या रेडिकल काम नहीं हैं। ये सभी बहुत मामूली काम हैं जो नेतृत्व के अभाव में प्रतीक्षित पड़े रहते हैं। सांसद लोग नेता भी कहलाते हैं। हमारी शुभकामना है कि उनमें नेतृत्व की तरंग पैदा हो और वे अपने मतदाताओं से जुड़ें। अगर वे ऐसा करते हैं, तो उन्हें पांच साल बाद चीख-चीख कर यह कहना नहीं होगा कि हमें वोट दो। इसकी जगह उनका काम बोलेगा।

महिला आरक्षण


50 प्रतिशत बनाम 33 प्रतिशत
राजकिशोर

राष्ट्रपति जी ने संसद को संबोधित करते हुए अपनी सरकार का जो पहले सौ दिनों का कार्यक्रम पेश किया, उसमें महिलाओं को दिए जानेवाले आरक्षण से संबंधित दो महत्वपूर्ण घोषणाएं हैं। एक घोषणा यह है कि पंचायतों और नगरपालिकाओं की निर्वाचित सीटों पर महिलाओं का आरक्षण 33 प्रतिशत से बढ़ कर 50 प्रतिशत किया जाएगा और इसके लिए संविधान में आरक्षण किया जाएगा। इस घोषणा के समर्थन में कहा गया है कि महिलाओं को वर्ग, जाति तथा महिला होने के कारण अनेक अवसरों से वंचित रहना पड़ता है, इसलिए पंचायतों तथा शहरी स्थानीय निकायों में आरक्षण को बढ़ाने से और अधिक महिलाएं सार्वजनिक क्षेत्र में प्रवेश कर सकेंगी। दूसरी घोषणा का संबंध राज्य विधानमंडलों और संसद में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान करनेवाले विधेयक को शीघ्र पारित कराने से है। आश्चर्य की बात यह है कि दूसरी घोषणा पर तुरंत विवाद शुरू हो गया, पर पहली घोषणा के बारे में कोई चर्चा ही नहीं है। इससे हम समझ सकते हैं कि सत्ता के वास्तविक केंद्र कहां हैं। पंचायत और नगरपालिका के स्तर पर क्या होता है, इससे हमारे सांसदों और पार्टी सरदारों को कोई मतलब नहीं है। उनकी चिंता सिर्फ यह है कि राज्य और केंद्र की सत्ता के दायरे में छेड़छाड़ नहीं होना चाहिए। यह ‘MÉÉÆ´É तुम्हारा राज्य ½þ¨ÉÉ®úÉ’ किस्म की मनोवृत्ति है। जब तक यह मनोवृत्ति कायम है, स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक शासन के मजबूत होने की कोई संभावना नहीं है।
जब 1992 में स्थानीय स्वशासन के संस्थानों में महिलाओं को सभी सीटों और पदों पर 33 प्रतिशत आरक्षण देने का संवैधानिक कानून बनाया गया था, उस वक्त भी यह एक क्रांतिकारी कार्यक्रम था। लेकिन इस बात को समझा गया लगभग दो दशक बाद जब महिलाओं की एक-तिहाई उपस्थिति के कारण पंचायतों के सत्ता ढांचे में परिवर्तन स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। असल में शुरू में पंचायतों के पास शक्ति, सत्ता या संसाधन कुछ भी नहीं था। इसलिए यह बात खबर न बन सकी कि करीब दस लाख महिलाएं पंचायतों के विभिन्न स्तरों पर स्थान ग्रहण करने जा रही हैं। देश में पहली बार ऐसा कानून बना था जो महिलाओं को गांव के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का अधिकार देता था। न केवल अधिकार देता था, बल्कि इसे अनिवार्य बना चुका था। शताब्दियों से महिलाओं का जिस तरह घरूकरण किया हुआ था, उसे देखते हुए यह उम्मीद करना यथार्थपरक नहीं था कि महिलाएं अचानक बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करेंगी। जब यह संवैधानिक कानून पारित होने की प्रक्रिया में था, तब बहुतों ने यह सवाल किया भी कि इतनी महिला उम्मीदवार आएंगी कहां से?
बेशक अब तक भी सब कुछ ठीकठाक नहीं है। बहुत सारी महिला पंचायत सदस्यों ने गांव के जीवन पर अपनी कार्यनिष्ठा की स्पष्ट छाप छोड़ी है। उनके नाम नक्षत्र की तरह जगमगा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान भी मिले हैं। पर अभी भी सब कुछ ठीकठाक नहीं है। आरक्षण के कारण जो महिलाएं चुन कर पंचायतों में आई हैं, उनमें से अनेक पर अभी भी पितृसत्ता की गहरी छाया है। इन पंचायत सदस्यों के पति या अन्य परिवारी जन ही पंचायत में असली भूमिका निभाते हैं और जहां बताया जाता है वहां महिलाएं सही कर देती हैं या अंगूठे का निशान लगा देती हैं। इसी प्रक्रिया में पंचपति, सरपंचपति, प्रधानपति आदि संबोधन सामने आए हैं। दूसरी ओर, अनुसूचित जातियों और जनजातियों की जो महिलाएं चुन कर पंचायतों में आई हैं, उन्हें पंचायत के वर्तमान सत्ता ढांचे में उनका प्राप्य नहीं दिया जाता। कहीं उन्हें जमीन पर बैठने को मजबूर किया जाता है, कहीं उनकी बात नहीं सुनी जाती और कहीं-कहीं तो उन्हें पंचायत की बैठक में बुलाया भी नहीं जाता। यानी राजनीति और कानून ने महिलाओं को सत्ता में जो हिस्सेदारी बख्शी है, समाज उसे मान्यता देने के लिए अभी भी तैयार नहीं है। ध्यान देने की बात है कि यह मुख्यत: उत्तर भारत की हकीकत है। दक्षिण भारत के मानस में महिला नेतृत्व को स्वीकार करने के स्तर पर कोई हिचकिचाहट नहीं है। जाहिर है कि उत्तर भारत का समाज महिलाओं को उनका हक देने के मामले में अभी भी काफी पुराणपंथी है।
लेकिन इससे क्या होता है? महान फ्रेंच लेखक और विचारक विक्टर ह्यूगो की यह उक्ति मशहूर है कि जिस विचार का समय आ गया है, उसे रोका नहीं जा सकता। स्त्री-पुरुष समानता का विचार आधुनिक सभ्यता के मूल में है। इसलिए सत्ता में स्त्रियों की हिस्सेदारी को देर-सबेर स्वीकार तो करना ही होगा। चूंकि दक्षिण भारत में यह स्वीकार भाव सामाजिक प्रगति के परिणामस्वरूप आया है, इसलिए केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक की पंचायतों में महिलाओं की हिस्सेदारी अपने आप 50 प्रतिशत या इससे ऊपर तक चली गई है। इसके विपरीत बिहार सरकार ने इस रेडिकल लक्ष्य को प्राप्त किया एक नया कानून बना कर, जिसमें पंचायतों में मछलियों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था। बिहार के बाद हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि कई राज्यों ने 50:50 के इस विचार को अपनाया और अब केंद्र सरकार पूरे देश के लिए यह कानून बनाने जा रही है। इसका हम सभी को खुश हो कर स्वागत करना चाहिए। इस संदर्भ में यह याद रखने लायक बात है कि बहुत-सी महिलाओं ने कहा है कि अगर आरक्षण न होता, तो हम पंचायत में चुन कर कभी नहीं आ सकती थीं। आक्षण के इस महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सवाल यह है कि जो काम पंचायत और नगरपालिका के स्तर पर इतनी आसानी से संपन्न हो गया और सामाजिक प्रतिरोध के बावजूद कम से कम कागज पर तो अमल हो ही रहा है, वही काम विधानमंडल और संसद के स्तर पर क्यों नहीं संपन्न हो पा रहा है? देवगौड़ा के बाद से हर सरकार महिला आरक्षण विधेयक को पारित कराने का वादा करती है, पर यह हो नहीं पाता। मनमोहन सिंह की सरकार ने इस बार अपने को प्रतिबद्ध किया है कि वह महिला आरक्षण विधेयक को शीघ्र पारित कराने के लिए कदम उठाएगी। यह काम पहले सौ दिनों के भीतर पूरा करने का इरादा भी जाहिर किया गया गया है। आश्चर्य की बात यह है कि जो काम वह इस बार सौ दिनों में करने का इरादा रखती है, वही काम वह पिछले पांच साल में भी क्यों नहीं पूरा कर सकी। यहां तक कि पांच वर्ष की इस लंबी अवधि के दौरान इस मुद्दे पर राजनीतिक सर्वसम्मति बनाने की दिशा में भी कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया। दिलचस्प यह है कि यह विधेयक जब पहली बार संसद में पेश किया गया था, उस वक्त जो राजनीतिकार इसका विरोध कर रहे थे, वह इस बार भी विरोध कर रहे हैं। स्पष्ट है कि अगर इन्हें मनाना संभव नहीं है, तो इनके विरोध की उपेक्षा करते हुए ही इस विधेयक को पारित कराना होगा। क्या ऐसा हो पाएगा? क्या इसके लिए मनमोहन सिंह की सरकार तैयार है?
इस बार एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। राष्ट्रपति महिला हैं, लोक सभा अध्यक्ष महिला हैं, सत्तारूढ़ दल की अध्यक्ष महिला हैं। फिर भी महिला आरक्षण विधेयक का पारित होना मुश्किल लग रहा है। वैसे, इन महिलाओं में सोनिया गांधी की सत्ता ही वास्तविक है और सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना महज एक संयोग है। अगर राजीव गांधी आज जीवित होते, तो वही कांग्रेस अध्यक्ष होते। उम्मीद की जाती है कि राहुल गांधी जल्द ही राजनीतिक उत्तराधिकार का यह पारिवारिक पद संभाल लेंगे। तब सोनिया गांधी की सत्ता प्रतीकात्मक हो जाएगी, उसी तरह जैसे राष्ट्रपति और लोक सभा अध्यक्ष की सत्ता प्रतीकात्मक है। इसका मतलब यह है कि भारत के राजनीति मंडल को सत्ता के बहुत निम्न स्तर, यानी पंचायत और नगरपालिका के स्तर पर, महिलाओं को 50 प्रतिशत तक भागीदार बनाने में कोई दिक्कत नहीं है, सत्ता के उच्च स्तर पर महिलाओं को प्रतीकात्मक सत्ता देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है, पर सत्ता के उच्च स्तर पर महिलाओं को मात्र 33 प्रतिशत आरक्षण देने में उसकी जान निकली जा रही है।
पिछड़ावादी राजनीतिकारों का पुराना तर्क है कि यदि विधानमंडल में महिलाओं को आरक्षण दिया जाता है, तो इन आरक्षित सीटो में पिछड़ा जाति की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण अलग से मिलना चाहिए। सतही तौर पर यह तर्क ठीक लगता है, पर सवाल यह है कि सारी मांग सरकार से ही क्यों? पिछड़ी जातियों के पुरुष अपने स्त्री समाज को सार्वजनिक जीवन में आगे क्यों नहीं बढ़ाना चाहते? आज सभी विधानमंडलों और संसद में पिछड़ी जातियों के पुरुषों का बोलबाला है। इसके लिए तो किसी आरक्षण की जरूरत नहीं हुई। फिर महिलाओं के मामले में दोहरा मानदंड क्यों? क्या यहां भी पंचपति, सरपंचपति और प्रधानपति की चाहत मुखर हो रही है? यह देख कर अच्छा नहीं लगा कि महिला आरक्षण के समर्थन में सीपीएम की वृंदा करात और भाजपा की सुषमा स्वराज एक दूसरे का हाथ थामे फोटो खिंचवा रही हैं। क्या स्त्री एकता विचाराधारा से ऊपर की चीज है? फिर भी यह पिछड़ावादी द्वंद्वात्मकता से कुछ बेहतर है। दो घोर परस्पर विरोधी दलों में आखिर एक गंभीर मुद्दे पर एकता दिखाई दे रही है, तो उम्मीद की जा सकती है कि आज नहीं तो कल महिला प्रतिनिधियों को राज्य और केंद्र के स्तर पर आरक्षण मिल कर रहेगा।

Wednesday, March 4, 2009

भावना की राजनीति

ऐसे भी आहत होती हैं भावनाएं
राजकिशोर

यह तो शुरू से ही पता है कि भावना बुद्धि से ज्यादा मजबूत होती है। पर मैं समझता था कि लोकतंत्र, या कोई भी तंत्र, भावना के साथ-साथ बुद्धि से भी चलता है। व्यक्तिगत जीवन में भले ही भावना बुद्धि पर विजयी हो जाती हो, पर सामाजिक जीवन में बुद्धि का स्थान भावना से ऊंचा है। कारण यह है कि भावनाओं के द्वंद्व को सुलझाने का कोई वस्तुपरक तरीका नहीं है, लेकिन बुद्धि के क्षेत्र में तर्क और बहस के द्वारा किसी सुसंगत निष्कर्ष तक पहुंचा जा सकता है। कानून में भी बुद्धि को ही प्राथमिकता दी जाती है। अगर कोई अपनी प्रेमिका की बेवफाई से आहत हो कर उसकी हत्या कर देता है, तो अदालत न्याय करते समय उसकी भावनाओं पर विचार नहीं करेगी, यह देखेगी कि उसका आचरण बुद्धिसंगत था या नहीं।

देश में हम काफी लंबे समय से भावना की एक ऐसी राजनीति देख रहे हैं जिसका बुद्धि से कोई संबंध नहीं है। भावना के इसी तीव्र उभार से एक चार सौ साल पुरानी जीर्ण-शीर्ण मस्जिद गिरा दी गई। इस तरह समाज के एक वर्ग की भावना तो तृप्त हो गई, पर इससे दूसरे वर्ग की जो भावनाएं आहत हुईं, उन पर लगाने के लिए कोई मरहम अभी तक खोजा नहीं जा सका है। मामला सोलह साल से अदालत में है, पर वह भी अभी तक कोई सुकून नहीं दे पाया है। बीच में भावना की यह राजनीति कुछ मंद हो गई थी, पर इधर भावनाओं में फिर उभार आने लगा है। हाल ही में मंगलूर की एक पेयशाला में स्त्रियों के जाने से राम के कुछ स्वनियुक्त सैनिकों की भावनाएं आहत हो गईं, तो वे हाथ-पैर चलाने वहां पहुंच गए। इससे पब प्रेमियों की भावनाएं आहत हुईं और उन्होंने गुलाबी चड्ढियों का अभियान शुरू कर दिया। वास्तव में कितनी चड्ढियां भेजी गईं, इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ लोगों ने पहले से ही हल्ला मचाना शुरू कर दिया था कि इस बार भी वेलेंटाइन डे मनाया गया, तो उनकी भावनाएं आहत होंगी और अपनी आहत भावनाओं को शांत करने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि इससे किस-किसकी भावनाएं आहत होंगी।

उन्हीं दिनों तर्क और भावना का एक और द्वंद्व देखने को मिला। कोलकाता के अंग्रेजी दैनिक स्टेट्समैन में एक लेख छपा जिसमें कहा गया था कि हम सभी स्त्री-पुरुषों का सम्मान करते हैं, पर अगर उनके विश्वास अतार्किक या अत्याचारी हों, तो हमसे यह उम्मीद न की जाए कि हम इन विश्वासों का भी सम्मान करेंगे। इस लेख में ईसाई और मुस्लिम मत की भी कुछ आलोचना की गई थी। इससे समाज के एक वर्ग की भावनाएं आहत हो गईं। स्टेट्समैन के संपादक को यह मौका देने के बजाय कि वे अपना मत के समर्थन में तथ्य और तर्क दें, उन्हें, मुद्रक और प्रकाशक के साथ-साथ, तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। आश्चर्य यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हमारे अनेक विद्वान और लेखक चित्रकार हुसेन का पक्ष तो लेते हैं, पर स्टेट्समैन के इसी मूल अधिकार की रक्षा के लिए दस-बीस सेकुलर हाथ भी नहीं उठे। इससे मेरी भावनाएं बुरी तरह आहत हुईं। मेरे मन में यह सवाल उठने लगा कि भावना वास्तव में होती भी है कि भावना के नाम पर सिर्फ कुश्तियां हो रही हैं। हमारे देश के लोग इतने ही भावनामय हैं या हो गए हैं, तो देश में इतना दुख और अन्याय क्यों है? जहां भावना को वास्तव में आहत होना चाहिए, वहां ऐसा क्यों नहीं होता? इस सिलसिले में मुझे अपनी आहत भावनाओं का खयाल आया तो आता चला गया। मेरे मन में आया कि मुझे भी अपनी आहत भावनाओं का कुछ करना चाहिए। ज्यादा कुछ नहीं कर सकता, तो उनकी सूची बना कर जनता जनार्दन के समक्ष पेश तो कर ही सकता हूं।

क्या बताऊं, सुबह उठते ही मेरी भावनाओं के आहत होने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दिन की पहली चाय के साथ अखबारों का बंडल जब बिस्तर पर धमाक से गिरता है, तो तुरंत खयाल आता है कि सुबह-सवेरे मेरे घर के दरवाजे पर अखबार पहुंचाने के लिए लिए कितने लोगों को रात भर काम करना पड़ा होगा। सबसे ज्यादा अफसोस होता है अपने हॉकर पर। वह बेचारा चार-पांच बजे तड़के उठा होगा, अखबारों के वितरण केंद्र पर गया होगा, वहां से अखबार उठाए होंगे और अपनी साइकिल पर रख कर उन्हें घर-घर पहुंचाया होगा। यहां तक कि उसे साप्ताहिक अवकाश भी नहीं मिलता, जिसे दुनिया भर में मजदूरों का मूल अधिकार माना जाता है। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि अखबार सुबह के बजाय शाम को छपें और बंटें? रविवार को तो अखबारवालों को भी छुट्टी मनानी चाहिए। अखबार पुलिस, दमकल और अस्पताल की तरह कोई अत्यंत आवश्यक सेवा नहीं है जिसके बिना कुछ बिगड़ जाएगा।

अखबार पढ़ने लगता हूं, तो कम से कम दो चीजें मुझे आहत करती हैं। पहली चीज हत्या और आत्महत्या के समाचार हैं। सभी हत्याओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन ऐसी हत्या-निरोधक संस्कृति तो बनाई ही जा सकती है जिसमें रोज इतनी मारकाट न हो। आत्महत्याओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे व्यक्ति की नहीं, समाज की विफलता के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। व्यवस्था को सुधार कर ये आत्महत्याएं भी रोकी जा सकती हैं। जो दूसरी चीज मेरी भावनाओं को आहत करती है, वह है देशी-विदेशी सुंदरियों की सुरुचिहीन तसवीरें। यह सोच कर मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं कि भगवान द्वारा दिए गए सौंदर्य के अद्भुत उपहार का कैसा भोंडा इस्तेमाल करने के लिए इन्हें प्रेरित और विवश किया जा रहा है। मेरी बेटी को अगर इस रूप में अपने को पेश करना पड़ गया, तो मुझे बहुत पछतावा होगा कि वह पैदा ही क्यों हुई।

जब तैयार हो कर काम पर निकलता हूं, तो मेरी भावनाओं का आहत होना फिर शुरू हो जाता है। जब अपनी सोसायटी के सफाईकर्ता पर नजर उठती है, तो शर्मशार हो जाता हूं। वह दिन भर घर-घर से कूड़ा-कचरा जमा करता है, सोसायटी की सीढ़ियों और सड़कों को झाड़ू से बुहारता है और बदले में उसे महीने में तीन-चार हजार भी नहीं मिलते। यही दुर्दशा चौकीदारों की है, जो सोसायटी में रहनेवाले परिवारों की सुरक्षा का खयाल रखते हैं, पर उनके जीवन में किसी तरह की सुरक्षा नहीं है। यहां तक कि उनकी नौकरी भी स्थायी नहीं है। सोसायटी से बाहर आने पर गली में कई ऐसे बच्चे मिलते हैं जिन्हें देख कर कुपोषण की राष्ट्रीय समस्या का ध्यान आता है। कुछ ऐसे बच्चे भी दिखाई देते हैं, जिन्हें उस समय स्कूल में होना चाहिए था। वे कामवालियां भी दिखाई देती हैं जो एक ही दिन में कई घरों की साफ-सफाई, चौका-बरतन आदि करती हैं और हमारा जीवन आसान बनाती हैं, फिर भी जिन्हें देख कर लगता नहीं है कि इससे होनेवाली आमदनी से उनके परिवार का काम अच्छी तरह चल जाता होगा।

सड़क पर आने के बाद दाएं-बाएं कचरे के ढेर मेरी भावनाओं को आहत करते हैं। मेरी समझ में नहीं आता कि पूरे शहर के लिए एक ही दिल्ली नगर निगम है, पर कुछ इलाकों की सड़कें साफ-सुथरी होती हैं और कुछ इलाकों की सड़कें टूटी-फूटी और गंदी। यह भेदभाव क्यों? फिर मिलती हैं सिगरेट और गुटके की एक के बाद एक चार दुकानें। इन्हें देखते ही गुस्सा आ जाता है कि हमारा स्वास्थ्य मंत्री अपना काम क्यों नहीं कर रहा है। वह सिगरेट और गुटकों के कारखाने बंद नहीं करा सकता, जो उसका संबैधानिक दायित्व है, तो कम से कम इतना तो कर ही सकता है कि इन जहरीले पदार्थों की दो दुकानों के बीच कम से कम एक किलोमीटर का फासला रखवाए। दफ्तर जाने के लिए ऑटोरिक्शा लेने की कोशिश करता हूं, तो पांच में से चार ड्राइवर मीटर पर चलने से इनकार कर देते हैं। कानून की इस खुली अवहेलना पर मेरी भावनाएं बुरी तरह आहत होती हैं। तब तो होती ही हैं जब मैं देखता हूं कि पांच-पांच, छह-छह लाख की बड़ी-बड़ी गाड़ियों में लोग अकेले भागे जा रहे हैं और उनसे दो या तीन गुना बड़े आकार की बसों में सौ-सौ आदमी-औरतें ठुंसे हुए हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब सड़क पर हफ्तों से नहाने के अवसर से वंचित, दीन-हीन चहरे कुछ बेचते हुए या सीधे भीख मांगते हुए न दिखाई पड़ते हों। फुटपाथ पर लेटी हुई ऐसी मानव आकृतियां भी दिखाई देती रहती हैं जिनका अहस्ताक्षरित बयान यह है कि इस दुनिया में हमारे लिए कोई जगह नहीं है।

क्या-क्या बयान करूं। रास्ते में कई आलीशान होटल पड़ते हैं। इनके एक कमरे का एक दिन का किराया आठ-दस हजार रुपए है। यह याद आता है, तो मेरा खून खौलने लगता है। तॉल्सतॉय ने अपनी एक कहानी के जरिए पूछा था, आदमी को कितनी जमीन छाहिए? इन स्वर्ग-तुल्य होटलों को देख कर मेरे मन में प्रश्न उठता है, आदमी को पराए शहर में ठहरने के लिए कितनी सुख-सुविधाएं चाहिए? मेरा बस चले, तो इन होटलों को रातों-रात गिरा कर इनकी जगह छोटी-छोटी धर्मशालाएं बनावा दूं, जहां पचास रुपए में एक छोटा-सा कमरा मिल सके। रास्ते में एक सरकारी अस्पताल भी पड़ता है। उसमें दाखिल रोगियों के हालात की कल्पना कर मन अधीर हो जाता है। कभी-कभी दफ्तर जाने का रास्ता रास्ता कुछ देर के लिए बंद कर दिया जाता है, क्योंकि कोई वीआइपी गुजर रहा होता है।

दफ्तर पहुंचता हूं, तो भावनाएं शांत नहीं होतीं। वरन उनके आहत होने के कई और कारण निकल आते हैं। सबसे पहले निगाह पड़ती है सुरक्षा गार्ड पर। दफ्तर के भीतर काम करनेवाले हम लोगों की ड्यूटी सात-आठ घंटे की होती है, पर गार्ड की ड्यूटी बारह घंटे की होती है। हमें साल में तरह-तरह की छुट्टी मिलती है, पर उसके लिए हफ्ते में एक छुट्टी छोड़ कर कोई और छुट्टी नहीं है। उसकी तनखा हम सबसे कम है -- बत्तीस सौ रुपए। दफ्तर में कुछ लोगों को पांच हजार रुपए महीना मिलता है, तो कुछ को पचास हजार। क्या उनकी योग्यताओं में इतना ज्यादा अंतर है? अगर सचमुच ऐसा है, तो बाकी लोगों को अपनी योग्यता बढ़ाने का अवसर क्यों नहीं मिलता? जब वे कम उम्र के थे, उस समय उन्हें यह अवसर क्यों नहीं मिला?

शाम को घर लौटता हूं, तो जगह-जगह जाम मिलता है। गाड़ियां ज्यादा हैं, सड़कें कम। क्या यही वह शहरी जीवन है जिसका स्वप्न हमारे वास्तुकारों ने देखा होगा? समझ में नहीं आता कि इस शहर को कौन चला रहा है या कोई चला भी रहा है या नहीं? समय बरबाद होने का खयाल आते ही भावनाएं मुरझाने लगती हैं। लौटने के रास्ते में एक वेश्यालय पड़ता है। फुटपाथ पर हमारी दर्जनों मां-बहनें अपनी अस्मत का सौदा करने के लिए इंतजार करती मिलती हैं। उनकी ओर देखा नहीं जाता। उनके बारे में सोचा तक नहीं जाता। दस साल से यही सिलसिला चला आता है। दिल्ली राज्य की मुख्यमंत्री एक महिला हैं। देश की सबसे बड़ी पार्टी की अध्यक्ष एक महिला है। भारत की राष्ट्रपति एक महिला हैं। तीनों दिल्ली में ही रहती हैं। क्या उन्हें अभागी औरतों के इस टोले के बारे में कुछ भी नहीं पता? क्या उनके चर और अनुचर उन्हें कुछ भी नहीं बताते? या, वे इस तरह की खबरें सुनना ही नहीं चाहते? यह सिद्धांत ठीक नहीं है कि औरतों की दुर्दशा को समाप्त करने के लिए औरतों को ही सक्रिय होना चाहिए। मर्दों की आंखों में भी शर्म दिखाई पड़नी चाहिए और उनकी भुजाएं भी फड़फड़ानी चाहिए। यह सब सोचते हुए घर पहुंचता हूं और चाय पी चुकने के बाद टीवी खोलता हूं, तो भावनाएं एक बार फिर आहत होने लगती हैं। सोते समय यही प्रश्न दिमाग में मंडराता रहता है कि इस बेईमान, बदमाश, अपराधी, फूहड़ और विज्ञापनी दुनिया में रहने के लिए हमें कौन बाध्य कर रहा है? 000

होली पर विशेष

रस ही जीवन / जीवन रस है
राजकिशोर

भारत में होली सबसे सरस पर्व है। दशहरा और दीपावली से भी ज्यादा। दूसरे त्योहारों में कोई न कोई वांछा है। या वांछा की पूर्ति का सुख। होली दोनों से परे है। यह बस है, जैसे प्रकृति है। अस्तित्व के आनंद का उत्सव। वांछा और वांछा की पूर्ति, दोनों में द्वंद्व है। यह जय-पराजय से जुड़ा हुआ है। दोनों ही एक अधूरी दास्तान हैं। सच यह है कि दूसरा हारे, तब भी हमारी पराजय है। कोई भी सज्जन किसी और को दुखी देखना नहीं चाहता। किसी का वध करके उसे खुशी नहीं होती। करुणानिधान राम ने जब रावण पर अंतिम प्राणहंता तीर चलाया होगा, तो उनका हृदय विषाद से भर गया होगा। उनके दिल में हूक उठी होगी कि काश, रावण ने ऐसा कुछ न किया होता जो उसके लिए मृत्यु का आह्वान बन जाए; काश, उसने अंगद के माध्यम से भेजे गए संधि प्रस्ताव को मंजूर कर लिया होता; काश, उसने विभीषण की सत सलाह का तिरस्कार नहीं किया होता। अर्जुन का विषाद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। युद्ध छिड़ने के ऐन पहले उसे अपने तीर-तूरीण भारी लगने लगे। उसके मन में उचित ही यह भाव पैदा हुआ कि अपने संगे-संबंधियों को मार कर सुख पाना एकदम अनैतिक है। यह भावना जितनी ज्यादा फैले, दुनिया के लिए उतना ही अच्छा है। श्मशान में सभ्यता का विकास नहीं होता। फिर भी महाभारत इसीलिए हो पाया, क्योंकि कृष्ण अपने सखा को यह समझा सके कि अन्याय का प्रतिरोध करना अगर जीवन-मरण का प्रश्न बन जाए, तब भी संघर्ष से भागना नहीं चाहिए। नतीजा यह हुआ कि दिन में कुरुवंश के लोग दिन में एक-दूसरे की जान लेते थे और रात को उनकी याद कर आंसू बहाते थे। इस तरह, द्वंद्व और उनका शमन जीवन प्रक्रिया को आगे बढ़ाता था। होली की विशेषता यह है कि यहां किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है; सामाजिक नैतिकता के नाम पर लादी हुई अनैतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप द्वंद्व है भी, तो उसका शमन नहीं, समाहार है। हृदय की मुक्तावस्था को क्या कहते हैं, मुझे नहीं मालूम, पर यह अनुभव जरूर है कि होली को मन से मनाया जाए, तो कुछ ऐसी ही अवस्था पैदा होती है।

होली का त्यौहार मनाने के लिए वसंत ऋतु को चुना गया, तो इसके ठोस कारण हैं। इन कारणों से हर कोई अवगत है। ये कारण मुख्यत: बाहर से आते हैं। लेकिन वे प्रभावी तभी होते हैं जब भीतर संचित कोई अद्भुत चीज अंगड़ाई ले कर जाग उठती है। कामना, विचार, हर्ष. विषाद सब कुछ हमारे भीतर ही है। लेकिन जागते वे तब हैं जब बाहर से उन्हें उद्दीपन और आलंबन मिलता है। बाहर और भीतर का विभाजन वास्तविक से ज्यादा कृत्रिम है। तभी तो यह विभाजन अकसर चिटख जाता है। श्वसुर साल भर श्वसुर रहता है, पर होली के दिन वह देवर बन जाता है। (फागुन में ससुर जी देवर लगेंं) इसका मतलब यही है कि उसमें देवरपन हमेशा मौजूद था, पर वह उभरता तब है जब उसे आवश्यक उद्दीपन मिलता है। यह उद्दीपन बहू देती है। इसका मतलब यह भी है कि बहू में भी सनातन नारी साल भर जीवित रहती है, पर बाहर आने के लिए वह उचित मौसम का इंतजार करती है। यह मौसम फागुन के अलावा और क्या हो सकता है?

बताते हैं, प्रकृति हर्ष और विषाद से परे हैं। उसे न दुख होता है न सुख होता है। लेकिन क्या पता। प्रकृति के बारे में हमारी जानकारी इतनी संक्षिप्त है कि उसके आधार पर कोई बड़ा फैसला नहीं किया जा सकता। हम यह तो जान गए हैं कि कीट-पतंगों को, पेड़-पौधों को भी दुख-सुख होता है, वे हर परिवर्तन से संवेदित होते हैं। लेकिन सभी प्राणी, जिनमें उद्भिज भी शामिल हैं, अगर प्रकृति की कोख से ही जन्म लेते हैं, तो यह कोख किसी भी स्तर पर इतनी बांझ नहीं हो सकती कि वह बिलकुल संवेदनहीन हो जाए। मार्क्स ने ठीक पहचाना था कि पदार्थ से ही चेतना पैदा होती है। तो फिर पदार्थ खुद अचेतन कैसे हो सकता है?

प्रकृति की यह सचेतनता वसंत ऋतु में पूरे शबाब में होती है। अन्य सभी ऋतुओं में कुछ न कुछ द्वंद्व होता है। गरमी, बारिश, जाड़ा -- सभी आवश्यक हैं और इस नाते प्रिय भी, पर अतिरेक में वे कष्ट भी देते हैं। वसंत ही एकमात्र ऋतु है जिसका कोई अतिरेक नहीं हो सकता। सभी चीजों का उत्कर्ष होता है, पर उत्कर्ष का उत्कर्ष क्या होगा? सागरमाथा (एवरेस्ट) अपनी ऊंचाई को कैसे लांघ सकता है? वसंत ऋतु परिवर्तन के पूरे चक्र का उत्कर्ष है। इसी के लिए प्रकृति साल भर तैयारी करती है, जैसे मानवी का शरीर सोलह साल तक साधना करता है ताकि उस पर यौवन का फूल खिल सके या जैसे जननी नौ महीने तक हर रंग से गुजरती है तब कोई शिशु धरती पर प्रगट होता है और सभी के दिलों पर छा जाता है। वसंत प्रकृति का यौवन भी है और उसकी रचनात्मकता का चरम उभार बिंदु भी। उसमें कोई द्वंद्व नहीं है। आनंद ही आनंद है। रस ही रस है। जीवन ही जीवन है। इसीलिए मनुष्य ही नहीं, संपूर्ण जीव जगत के साथ उसकी अनुकूलता है। वसंत में जैसे प्रकृति खुलती है, उसकी कंचुकियां छोटी पड़ जाती हैं, वैसे ही हम भी खुलते हैं, हमारे लिए हमारा परिवेश छोटा लगने लगता है। यह वह सर्वश्रेष्ठ उपहार है जो सृष्टि अपने आपको देती है। वरना तो बाकी सृष्टि में आंखों को जला देनेवाली रोशनी है -- जहां-जहां तारे हैं, या फिर उनके बीच का ठोस सघन अंधेरा, जिसमें कोई अपने आपको भी देख नहीं सकता। हम धरतीवालों को अपनी किस्मत पर इतराना चाहिए।

धरती इसलिए अनोखी है, क्योंकि सृष्टि भर में यहीं जीवन है। यहीं रस है। यह रस सबसे ज्यादा नर-नारी के बीच पैदा होता है, क्योंकि प्रकृति की अभी तक की योजना यही है। उसने पशु-पक्षियों में भी, पेड़-पौधों में भी युग्म बनाए हैं, पर इन युग्मों में वह आकर्षण, वह ताकत, वह निरंतरता नहीं है, जो मानव युग्म में दिखाई देता है। हो सकता है, लाखों-करोड़ों वर्ष पहले हमारे पूर्वज स्त्री-पुरुष भी जब-तब ही एक-दूसरे की ओर प्यार और लालसा की निगाहों से देखते रहे हों, पर वह संस्कृति के ककहरे का युग था। संस्कृति के निरंतर विकास ने न केवल शरीर को कोमल और सुंदर बनाया है, बल्कि दो शरीरों के बीच कला का इतना बड़ा सागर पैदा किया है जिसमें हम निरंतर ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इसीलिए हमारे एक पूर्वज ने आह भरते हुए कहा था कि जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से विहीन है, वह सींग-पूंछ रहित जानवर की तरह है। होली इसी सांस्कृतिकता का उत्सव है। जो होली के दिन सूखे पेड़ की तरह अपना और दूसरों का मूड खराब किए रहता है, उसे नरक का अनुभव करने के लिए जीवनोत्तर जीवन की प्रतीक्षा नहीं करनी होती। वह आंखवाला हो कर भी अंधा है, कानवाला हो कर भी बहरा है और हृदय होते हुए भी पत्थर है। वह समाज में होते हुए भी समाज से बाहर है, अपने भीतर होते हुए भी अपने को नहीं पहचानता। खुदा ऐसे लोगों को माफ करे -- ये नहीं जानते कि ये क्या खो रहे हैं।

नर-नारी का आकर्षण एक विशिष्ट प्रकार का आकर्षण है, जिसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। इसीलिए सभी भक्त ईश्वर को अपना माशूक मान कर उसकी मादक अनुभूति से घिरे रहते हैं। कबीर को लगता था कि राम उनके प्रियतम हैं और वे राम की बहुरिया हैं। कृष्ण को तो पति मान कर ही भजने की प्रथा है। ईसाई संतों को ईश्वर की वधू होने का अनुभव होता था। ये सभी अभिव्यक्तियां प्रगाढ़तम संबंध की जानी-पहचानी अनुभूति हैं। लेकिन सिर्फ अपनी पत्नी से होली खेल कर कौन उल्लास में डूब सकता है? सिर्फ अपने पति से होली खेल कर कौन बीरबहूटी बन सकती है? अतिशय निकटता नए आविष्कार करने की क्षमता को कुंद कर देती है। निष्प्रयास स्वीकृति प्रेम को आलसी बना देती है। इसीलिए अनेक समझदार लोगों ने सलाह दी है कि स्त्री-पुरुष को एक साथ नहीं रहना चाहिए और साथ रहने की मजबूरी हो तो रोज एक साथ एक ही बिछावन पर सोना नहीं चाहिए। पूरी तरह स्वकीय और पूरी तरह परकीय, दोनों बुरे हैं। हर स्त्री और हर पुरुष को थोड़ा स्वकीय और थोड़ा परकीय बने रहना चाहिए। नहीं तो आकर्षण की डोरी अतिशय तनाव से टूट कर गिर सकती है और बहुत ज्यादा ढीली हो जाने पर लुंज-पुंज हो जा सकती है। दोनों ही संस्करण घातक हैं। वे डोरी के गुण-धर्म को नष्ट कर डालते हैं। जब स्वकीयता के साथ परकीयता होगी और परकीयता के साथ स्वकीयता, तब हमें होली जैसे अद्भुत त्यौहार की महत्ता समझ में आएगी, जो स्वकीय और परकीय के विभाजन की दीवार को अपने रंग-गीले हाथों से गिरा देता है। फागुन के नशे में कौन स्वकीय रह जाता है या रह जाती है और कौन इस बोध से घिरा रहता है या घिरी रहती है कि वह परकीय है? जैसे प्रकृति की व्यवस्था अभिन्न है, हर जर्रा हर जर्रे का मायका या ससुराल है, वैसे ही सभी स्त्री-पुरुष एक नैसर्गिक व्याकरण की संज्ञाएं, विशेषण और क्रियापद बन जाते हैं। अब इससे आगे क्या कहूं, तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं। अगर यह प्रेम है, तो अध्यात्म भी यही है।

रस ध्वनि में है, स्पर्श में है, रंग में है। होली में हम तीनों का मधुर उत्तान देखते हैं। होली गाई जाती है, होली खेली जाती है और होली पर हम गले भी मिलते हैं। कुछ लोग होली के रंग में खुशबू भी मिला देते हैं। होली पर पकवान तो गरीब से गरीब के घर भी बनते हैं, जो हमारी स्वादेंद्रिय को तृप्त करते हैं। इस तरह होली ऐंद्रिय जगत की संपूर्णता का उत्सव बन जाता है। लेकिन इन तीनों में रंग का स्थान अन्यतम है। इंद्रियों के सभी विषयों में रंग ही दूर से चमकता है। सूर्य की लालिमा हमें कितनी दूर से दिखाई पड़ती है। चंद्रमा का प्रकाश निकटतर है, लेकिन वह भी कम दूर नहीं है। यह गुण किसी और तत्व में नहीं है। शायद इसीलिए रंग को होली का मुख्य दूत माना गया। प्रकृति भी इस मौसम में अपने रंगों का पूरा खजाना खोल देती है। एक-दूसरे के शरीर और उसके जरिए आत्मा पर गीला रंग फेंक कर हम मानो इस रंगीनियत का ही इजहार करते हैं। यही वह रस है जो हमारे तन-मन को आह्लादित कर देता है और हमारी भौगोलिक तथा मानसिक दूरियों को पाट देता है। हर कोई फूल और हर कोई भौंरा बन जाता है।

मेरी उलझन यह है कि जो रस स्त्री-पुरुष के बीच पैदा होता है, उसका कुछ हिस्सा पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच क्यों नहीं पैदा होता? स्त्रियां भी स्त्रियों के साथ होली खेलती हैं और पुरुष भी पुरुषों के साथ होली खेलते हैं। पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों की अपनी होली ज्यादा मजेदार, ज्यादा चुहल भरी होती है, क्योंकि उनमें प्राकृतिक लालित्य होता है और उनकी आपस की प्रतिस्पर्धा उतनी तीव्र और बहुआयामी नहीं होती जितनी पुरुषों के आपसी संबंधों में। इसीलिए युवाओं की होली ज्यादा खुली हुई होती है : वे इतने परिपक्व नहीं हुए होते हैं कि जिंदगी के द्वंद्वों को कुछ घड़ी के लिए भुला न सकें और अपने को रंगीनी के हाथों निश्शर्त सुपुर्द न कर सकें। शोक की बात यह है कि होली का यह सहज उल्लास साल भर हमारा साथ नहीं देता। स्त्री-पुरुष का आकर्षण बारहों महीने चौबीसों घंटे बना रहता है, पर पुरुष-पुरुष और स्त्री-स्त्री के बीच प्रगाढ़ता में तरह-तरह के अवरोध पैदा होते रहते हैं और जीवन रस को सोखते रहते हैं। कहा जा सकता है कि हमने जो सभ्यता गढ़ी हुई है, वह हमारे सहज सुखों का सोख्ता है। यह सोख्ता स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक संबंधों के रस को भी सोखता रहता है और जीवन को उतना रसमय नहीं होने देता जितना वह वास्तव में है और आज भी हो सकता है। विषमता की तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर हमने अपनी जिंदगियों को दुखपूर्ण बना डाला है। होली हर साल हमें यह याद दिलाने आती है कि यारो, यह जीना भी कोई जीना है जिसमें जीवन का रस द्वंद्वों की आंच में भाप बन कर उड़ता रहता है और हम जितना दूसरों से, उतना ही अपने आपसे बेगाना होते जाते हैं।

इस विसंगति में ही हम पहचान सकते हैं कि होली का दिन मजाक और हास-परिहास का दिन क्यों बन जाता है। जब हिरण्यकश्यप की बहन उसके संतनुमा बेटे प्रह्लाद को ले कर आग के कुंड में बैठ गई थी और बालक प्रह्लाद जल कर भस्म हो जाने के बजाय उससे पूरी तरह अक्षत और साबुत निकल आए, तो उसके तुतलाते होंठों पर एक ऐसी मुसकान जरूर होगी जिसने उस क्रूर-कपटी राजा का दिल तार-तार कर दिया होगा। यह मुसकान अन्याय और जुल्म के विरुद्ध विजय की शाश्वत मुसकान है। बाद की पीढ़ियां इतनी किस्मतवाली नहीं रहीं कि वे इस विध्वंसक आग से अपने को भस्म न होने दें। पर ऐसी हर आग के खिलाफ गाने तो गाए ही जा सकते हैं, प्रहसन तो किया ही जा सकता है, उसका मजाक तो उड़ाया ही जा सकता है। यह भी एक प्रकार की विमुक्ति है : साल भर हमारे कोमल मनों में जो तनाव जमा होते रहते हैं, उनसे उल्लासपूर्ण विमुक्ति का दुर्लभ मौका, जब आप कोयले को कोयला और कीचड़ को कीचड़ कह सकते हैं। होली के दिन कोई किसी का गुसैयां नहीं रह जाता। किसी से भी प्यार किया जा सकता है और किसी पर भी छींटाकशी की जा सकती है। लेकिन यह छींटाकशी भी विनोद भाव के परिणामस्वरूप मृदु और सहनीय हो जाती है। बल्कि जिसका परिहास किया जाता है, वह भी बुरा न मानने का अभिनय करते हुए बरबस हंस पड़ता है। शायद यही 'बुरा न मानो होली है' के हर्ष-विनोद घोष का उद्गम स्थल है।

होली वह अनोखा दिन है जब जिसे बहुमत से बुरा समझा जाता है, वह भी बुरा नहीं रह जाता। जिसे बहुमत से अच्छा माना जाता है, उसकी सार्वजनिक ऐसी-तैसी की जाती है। कह सकते हैं कि होली एक ऐसा स्वच्छ दर्पण है जिसके हम, हमारा समाज, हमारी तथाकथित संस्कृति सब निर्वस्त्र हो कर खड़े हो जाते हैं और अपने पर जितना इतराते हैं उतना ही सकुचाते भी हैं। क्या ही अच्छा हो कि हम रोज एक घंटा होली के मूड में आ जाया करें और दिन भर के गर्दो-गुबार को झटक कर साफ चित्त से प्रकृति की उस नियामत की सुरमई गोद में बच्चों की तरह लेट जाया करें जिसे नींद कहते हैं और जो मृत्यु का एक लघु संस्करण है, ताकि अगली सुबह के बाल सूर्य की तरह हम भी ताजादम हो कर जीवन में वापसी का सुख अनुभव करते हुए अपने दिन भर के कामकाज में लग सकें। 000

Saturday, February 28, 2009

महिला आरक्षण

संसद में सिसकी

राजकिशोर

 

चौदहवीं लोक सभा की उम्र पूरी हो चुकी थी। शोक सभा में स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, लालकृष्ण आडवाणी आदि नेता अपना-अपना वक्तव्य रख चुके थे। निर्णय हुआ कि लाश को अभी श्मशान तक ले जाया जाए। जब पंद्रहवीं लोक सभा का जन्म हो जाए, तब क्रिया-कर्म की रस्म पूरी