Thursday, October 9, 2008

अमेरिका में बेलआउट का मुद्दा

पूंजीवाद की नर्सें
राजकिशोर

संयुक्त राज्य अमेरिका को जिस चीज से सबसे ज्यादा डर लगता है, वह है समाजवाद। समाजवाद को रोकने के लिए वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही परेशान रहा है। जिसे शीत युद्ध का काल कहते हैं (जो अभी खत्म नहीं हुआ है), उसकी पृष्ठभूमि में समाजवाद और पूंजीवाद का संघर्ष ही था। बताते हैं कि इस संघर्ष में समाजवाद की पराजय हुई। जाहिर है, ऐसा मानने वाले लोग यह भी मानते हैं कि सोवियत संघ में समाजवाद था। जो था, वह समाजवाद ही था, तो वह पराजित कैसे हो गया, यह बात समझ में नहीं आती। जब तक समाज है, तब तक समाजवाद की भूख रहेगी। जब समाज को तोड़-तोड़ कर खत्म कर दिया जाएगा, तब समाज की भूख पैदा होगी। इसलिए विकास से या विकास के नाम पर होने वाली किसी भी अवांछनीय चीज से समाजवादियों को चिंता जरूर होती है, पर डर नहीं लगता। वे जानते हैं कि भविष्य उन्हीं का है। लेकिन पूंजीवाद के साथ ऐसा नहीं हैं। चूंकि यह पूरी व्यवस्था लालच और भय पर टिकी हुई है, इसलिए उसे सभी से डर लगता है।
तो क्या संयुक्त राज्य अमेरिका के वे सभी नागरिक, स्तंभकार और सार्वजनिक विचारक लालच और भय की इस व्यवस्था के बहुत बड़े ताबेदार है, जो सात हजार लाख डॉलर की उस गठरी का जम कर विरोध कर रहे हैं जिसे उस देश के दोनों प्रमुख दलों ने अपना समर्थन देना पड़ा? यह गठरी दो वित्तीय संस्थानों को बचाने के लिए बुश प्रशासन ने प्रस्तावित की थी। इसकी आलोचना यह कह कर की जा रही है कि यह तो समाजवाद है, क्योंकि जनता द्वारा दिए गए कर का पैसा ऐसी संस्थाओं को बचाने के लिए खर्च किया जा रहा है, जो अपनी अकुशलता के कारण डूब रही थीं। पीटर एब्लर नाम के एक स्तंभकार ने तो यहां तक लिख दिया कि 'समाजवाद का उदय' यह नया अध्याय 'अमेरिका का उत्थान और पतन' नाम की पुस्तक का आखिरी अध्याय है। इस तरह के स्तंभकार कोई छोटे-मोटे ब्लॉगकार नहीं हैं। इनका लिखा हुआ बहुत बड़े वर्ग द्वारा पढ़ा और (शायद) गुना जाता है। डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार तथा उदार नीतियों के समर्थक बराक ओबामा को कम्युनिस्ट कहा जा रहा है और उनके इतिहास का पता लगा-लगा कर साबित किया जा रहा है कि वे तो शुरू से ही कम्युनिस्ट रहे हैं। यह और बात है कि इससे ओबामा की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। ऐसा लगता है कि अमेरिका के पूंजीवाद को समाजवाद की दो-चार खुराक की जरूरत है।
सचाई यह प्रतीत होती है कि इस खैरात की गठरी के कटु आलोचक अपनी ही विचारधारा के प्रपंचवादी प्रचार तंत्र के शिकार हो गए हैं जो मानता है कि बाजार की शक्तियां ही फैसला कर सकती हैं कि मनुष्य के लिए सर्वोत्तम क्या है। दरअसल, विचारधारा और राज्य का संचालन, दो अलग-अलग चीजें हैं। विचारधारा के स्तर पर तर्क का निर्वाह करते हुए आप बहुत दूर तक जा सकते हैं, पर चूंकि प्रत्येक राज्य विचार या तर्क से नहीं, व्यावहारिक उद्देश्यों से चल रहा है, इसलिए राज्य का संचालन करते समय आपको बहुत-सी ऐसी चीजों का ध्यान रखना पड़ता है जो आपकी विचारधारा में बाधक हैं। दो उदाहरण लेते हैं। विचार के स्तर पर सभी धर्म ईश्वर के सामना सभी की बराबरी की शिक्षा देते हैं। लेकिन सभी धर्मों के संचालक अमीर और सत्ताधारी लोगों के साथ खासुलखास का संबंध रखते हैं। इन संचालकों की समस्या यह है कि इन्हें अपना धर्मतंत्र भी तो चलाना है। इसी तरह, इस बात पर अचरज किया जाता रहा है कि लोकतंत्र का समर्थक अमेरिका पाकिस्तान सहित ऐसे सभी राज्यों का समर्थन क्यों करता रहा है जहां लोकतंत्र-विरोधी सत्ताएं रही हैं। इसका कारण यह है कि अमेरिका को विश्व स्तर पर अपना वर्चस्व स्थापित करना था और अब बनाए रखना है एवं इस मुहिम में अमेरिका का साथ एकाधिकारवादी सत्ताएं ही दे सकती थीं और दे रही हैं। लेकिन ओबामा को कम्युनिस्ट या समाजवादी कहने वालों ने अफगानिस्तान और इराक पर हमला करने वाले बुश को कभी भी फासिस्ट नहीं कहा। कारण, दोनों की ही निगाह में इन देशों में रहने वालों का हैसियत कीड़े-मकोड़ों जैसी है। वस्तुत: दोनों हैं एक ही वर्ग के, इसलिए उनके मूल विचार में फर्क नहीं है।
तथाकथित समाजवाद का विरोध भी ऐसा ही मामला है। बाजार के तर्क को माना जाए, तो फेल हो जाने वाले वित्तीय संस्थानों को बचाने की कोई जरूरत नहीं है। जिसने जैसा बोया है, वह वैसा काटे। पूंजीवाद के शास्त्र में विफलता के लिए कोई स्थान नहीं है। आपकी दुकान नहीं चल रही है, तो दुकान बंद कर चाहे भीख मांगिए चाहे फाका कीजिए -- सरकार या समाज से यह उम्मीद मत कीजिए कि वे आपके बुरे दिनों के दोस्त बनेंगे। सेवा और सदाव्रत के दिन लद चुके हैं। पूंजीवाद के मंदिर में बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है -- यहां मुफ्त भोजन की व्यवस्था नहीं है। कायदे से, इसके साथ ही यह भी लिख देना चाहिए कि आप अपने भोजन की व्यवस्था कैसे करते हैं, इस बारे में हम कुछ नहीं पूछेंगे। चूंकि अपने भोजन के लिए आप खुद जिम्मेदार हैं, इसलिए यह जिम्मेदारी पूरी न कर पाने की सजा भी आपको ही मिलेगी, बीच में हम कहीं नहीं आते। आप दो बार की जगह पांच बार खाएं, तब भी हम मना नहीं करेंगे और तब भी मना नहीं करेंगे जब आप भोजन के अभाव में आप आत्महत्या करने जा रहे हों।
लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि जो लोग दांत पीस-पीस कर कह रहे हैं कि इन बेईमान और विफल सट्टेबाजों की नाव को डूबने से बचाने के लिए जनता का पैसा क्यों झोंका जा रहा है, वे यह मांग नहीं कर रहे हैं कि शेअर बाजार प्रणाली को ही खत्म कर देना चाहिए, क्योंकि वह सट्टेबाजी का अड्डा है। भारत में भी शेअरों का भाव गिरने पर चिंता प्रगट की जा रही है, यह नहीं पूछा जा रहा है कि शेअर बाजार में किस चीज का उत्पादन होता है। सच्चे पूंजीवाद को शेअर बाजार की कोई जरूरत नहीं है। वहां कोई ऐसी जगह नहीं है जहां नैनो मोटरगाड़ी बनाई जा सके। वहां बड़े-बड़े खिलाड़ी सिर्फ यह तय करते हैं कि कल टाटा मोटर्स के शेअरों का भाव क्या होना चाहिए। शेअर बाजार में भावों के इधर-उधर होने से से जो लोग कमाई करते हैं, वे सट्टेबाज हैं और रुपए को कल-कारखाने या सेवा प्रदानन में लगाने के बजाय कागजों के खेत में बोते हैं और अफवाहों से उसकी सिंचाई करते हैं। यह पूंजी का मखौल है। उसका दुरुपयोग है। इससे वास्तविक समृद्धि नहीं आ सकती। नकली समृद्धि आती है और कोई भी नकली चीज कब भसक जाए, कौन कह सकता है?
लेकिन जो पूंजीवाद हमको-आपको पढ़ाया जाता है, वह और जिस पूंजीवाद का वास्तव में अनुसरण किया गया है और आज भी किया जा रहा है, वे वास्तव में दो अलग-अलग चीजें हैं। पढ़ाए जाने वाले पूंजीवाद के हिसाब से सरकार को किसी निजी कंपनी का न विरोध करना चाहिए न उसकी सहायता करनी चाहिए। सभी को बाजार में अपनी-अपनी किस्मत आजमाने का मौका मिलना चाहिए। लेकिन व्यवहृत पूजीवाद में राज्य ने हमेशा पूंजी की मदद की है। इतिहास बताता है कि राज्य की मदद के बगैर पूंजीवाद इतनी तेजी से फैल ही नहीं सकता था। बल्कि फैल सकता था या नहीं, इसमें भी संदेह है। कारण, यह एक ऐसी नृशंस प्रणाली है जो सिर्फ अधिकार ही अधिकार जानती है, जिसका कोई कर्तव्य शास्त्र नहीं है। बिना कर्तव्य के कोई भी अधिकार व्यक्ति या समाज के हित में नहीं हो सकता। इसलिए कर्तव्यविहीन पूंजीवाद भी किसी भी समाज को चला नहीं सकता। फिर भी, यह यूरोप में चला, तो इसलिए कि यूरोप के शासक वर्ग ने इसे चलाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना एक कर दिया। बाजार की खोज में दूर-दूर तक घोड़े दौड़ाए गए और गोरे सैनिकों और व्यापारियों ने मिल-जुल कर रंगीन दुनिया के कोने-कोने में अपने उपनिवेश कायम किए। भारत में इंग्लिस्तान की हुकूमत इसी का एक नतीजा थी। तब भी भारत में पैदा की जाने वाली बहुत-सी चीजें इंग्लिस्तान के उत्पादों पर भारी पड़ती थीं, इसलिए वहां की सरकार को कुछ भारतीय उत्पादों के आयात पर रोक लगानी पड़ी और कुछ पर आयात कर इतना बढ़ा दिया गया कि वहां के मुट्ठी भर लोग ही उनका इस्तेमाल कर सकें। यूरोप ने लगभग पूरी दुनिया को अपना उपनिवेश न बना लिया होता, तो पूंजावीद अपने जन्म पर पछताता रह जाता। इस प्रक्रिया में उत्तर अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया में तो वहां की पूरी की पूरी स्थानीय आबादी का सफाया कर दिया गया।
यही नहीं, पूंजीवाद अपने ही देशों के लोगों के प्रति बहुत ही क्रूर था। उद्योगीकरण और फैक्टरी प्रणाली के शुरू के वर्षों के वृत्तांत पढ़ने पर हृदयहीन आदमी भी बच्चों की तरह रोने लगेगा। स्त्रियों और बच्चों से अठार-अठारह घंटे काम लिया जाता था। बच्चों को पतली चिमनियां साफ करने के काम में लगाया जाता था, जिनमें से बहुतों की लाश ही नीचे उतरती थी। मजदूर गंदी और घनी बस्तियों में रहते थे, जहां किसी भी प्रकार की जन सुविधाओं की व्यवस्था नहीं थी। पश्चिम का यही पूंजीवाद आज स्वच्छ और आकर्षक नजर आता है, क्योंकि शोषण और क्रूरता की बुनियाद पर उसने समृद्धि की आकर्षक इमारत बना ली है। इस समृद्धि का नया आधार आज दुनिया भर में उद्योग-व्यापार करने की आजादी है, क्योंकि इसका लाभ गरीब और अविकसित देशों को नहीं, पहले से ही समृद्ध और टेक्नोलॉजी-प्रधान देशों को मिल रहा है।
यह विशेष लाभ उठाने की स्थिति में जो देश हैं, वही अपनी पंद्रह-बीस प्रतिशत बेरोजगार आबादी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं। अमेरिका में तथाकथित समाजवाद के उदय से त्रस्त विचारक यह मांग भी क्यों नहीं करते कि चूंकि हम बाजारवादी देश हैं, इसलिए सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में सरकार को एक डॉलर भी खर्च नहीं करना चाहिए? कारण, ऐसा हो जाए, तो अमेरिका में भी पूंजीवाद को सदा के लिए दफना दिया जाएगा। सामाजिक सुरक्षा, बीमार कंपनियों की जमानतदारी आदि ऐसे कदम हैं जिनसे पूंजीवाद सहनीय बनता हैं। जो बड़ी-बड़ी कंपनियां बंद हो रही हैं, उन्हें न बचाया जाए तो बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैलेगी और पूंंजीवाद की बाजार प्रणाली भरभरा कर गिर जाएगी। इसलिए ये कदम समाजवाद लाने के लिए नहीं, पूंजीवाद की रक्षा करने के लिए हैं। दुनिया का सबसे बड़ा पूंजीवादी देश दुनिया की सबसे बड़ी सामरिक ताकत भी है, यह संयोग नहीं हो सकता।
यही हालत हमारे अपने देश की भी है। भारतीय राज्य ने शुरू से ही पूंजीवाद की मदद की है। अंग्रेजी राज में भी यही हुआ और उसके बाद भी यही हुआ। पहले छिप-छिप कर यह होता था, अब भारतीय राज्य ने अपने कपड़े उतार दिए हैं। इसलिए एक ओर तो औद्योगिक इकाइयां बैठाने के लिए सस्ते में जमीन, बिजली, कर से छूट आदि दी जाती है, विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाए जाते हैं और दूसरी ओर जन असंतोष को दबाने के लिए इंदिरा आवास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, किसान कर्ज माफी आदि कार्यक्रम बनाए-बिगाड़े जाते हैं। दरअसल, ये राहत कार्यक्रम पूंजीवाद की नर्सें हैं जो अमीर घायलों को गद्देदार बिस्तर पर ग्लुकोज चढ़ाती हैं और गरीब बीमारों के गले में चीनी और नमक का घोल डालती रहती हैं। 000

3 comments:

hemant said...

चिदंबरम, कमलनाथ और आहुलवालिया जी के एक बयान पर मैंने भी कुछ लिखने का प्रयास किया है जिसमें उन्होंने कहा था की भारत पर वैश्विक संकट का प्रभाव नही पढेगा.

hemant said...

चिदंबरम, कमलनाथ और आहुलवालिया जी के एक बयान पर मैंने भी कुछ लिखने का प्रयास किया है जिसमें उन्होंने कहा था की भारत पर वैश्विक संकट का प्रभाव नही पढेगा

Dr. Amar Jyoti said...

पहली बार आया आपके ब्लॉग पर। पहली बार ही देखा ऐसा सुसंगत और वैज्ञानिक विवेचन आज के भारत का। साधुवाद।