Saturday, October 25, 2008

छिन्न-भिन्न भारत

भविष्य का भारत
राजकिशोर


पड़ोसी के लड़के आदित्य ने जब भारत के भविष्य का नया नक्शा मेरी मेज पर रखा, तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। आदित्य एक निबंध प्रतियोगिता में भाग ले रहा है। प्रतियोगिता का विषय है -- भारत में शांति। अन्य छात्रों की तरह आदित्य ने इंटरनेट, अंकलों और आंटियों की मदद नहीं ली। लेख लिखने का यह सबसे आसान रास्ता था। आदित्य ने कठिन रास्ता चुना। उसने कई दिनों तक इस विषय पर खुद सोचा। नतीजा मेरे सामने था।

आदित्य ने भारत का नया ही नक्शा खींच डाला था। इस नक्शे में एक राष्ट्र की जगह पांच राष्ट्र थे। पांचों के बीच मोटी-मोटी लाइन ऑफ कंट्रोल थी। पुलिस राइफल लिए गश्त लगा रही थी। भारत के नए विभाजन का किस्सा आदित्य के मुंह से ही सुनिए ।

'अंकल, यह देखिए। यह रहा हिन्दू भारत। इसे मैंने केसरिया से रंग दिया है। यहां देश भर के हिन्दू रहेंगे। अपने इलाके में वे चाहे जिस मस्जिद या चर्च को तोड़ें, यह उनके अधिकार क्षेत्र में होगा। इसके खिलाफ किसी भी कोर्ट में नहीं जाया जा सकेगा। यहां अगले और पिछड़े के बीच युद्ध तो हो सकता है, पर अल्पसंख्यकों का दमन तो हो ही नहीं सकता। कारण, इस भारत में अल्पसंख्यक होंगे ही नहीं।

'अल्पसंख्यकों के लिए मैंने तीन अलग-अलग भारत बनाए हैं। एक बड़ा-सा इलाका मुसलमानों को दिया है। इस इलाके में सिर्फ मुसलमान रह सकेंगे। एक इलाका सिखों को दिया है। भारत विभाजन से इन दोनों कौमों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई थीं। अब हो जाएंगी। एक छोटा-सा इलाका ईसाइयों के लिए बनाया है। दुनिया में कौन नहीं जानता कि भारत मूलत: धार्मिक देश है। इसलिए धर्म के आधार पर ठीक से विभाजन कर दिया जाए, तो अशांति की जड़ ही खत्म हो जाएगी।

'अंकल, यह देखिए, यह इलाका दलितों के लिए हैं। इस देश में सिर्फ दलित रहेंगे। उसके बाद वे यह शिकायत नहीं कर सकेंगे कि सवर्ण समाज हमें सता रहा है। यहां दलित अपने लिए नया कल्चर डेवलप कर सकेंगे। कैसा है मेरा यह प्लान?'

मैंने पूछा, 'लेकिन बेटे, बिहार और यूपी के जिन लड़कों को महाराष्ट्र में पीटा गया, वे भी हिन्दू हैं और जिन्होंने पीटा, वे भी हिन्दू हैं। तो फिर तुम्हारे भारत में, या कहो भारतों में, शांति कैसे बनी रह सकती है? लखनऊ के शिया-सुन्नी दंगे मशहूर हैं।'

'इसका समाधान भी मैंने सोच लिया है। जैसे मुस्लिम भारत में शिया और सुन्नी चाहें तो अपने देश का एक और विभाजन कर सकते हैं। शियाओं का देश अलग और सुन्नियों का अलग। इसी तरह, दलितों की विभिन्न जातियों में आपस में न पटे, तो उनमें से हरएक को अलग-अलग देश दिया जाएगा। हिन्दू भारत भी चाहे तो जातियों के आधार पर अपने को पुनर्विभाजित कर सकता है, जैसे गांवों में ब्राह्मणों, ठाकुरों, बनियों, चमारों आदि की टोलियां अलग-अलग होती हैं।

मेरा गला खुश्क होने लगा था। मैंने कहा, शायद तुम ठीक कहते हो। प्रेम बनाए रखने के लिए कुछ दूरी जरूरी है। करीबी से कलह बढ़ता है।

आदित्य ने कहा, 'अब तो अदालत ने भी मान लिया है कि जो साथ-साथ नहीं रह सकते, उन्हें अलग हो जाना चाहिए। कपूर आंटी को तो इसी आधार पर तलाक मिला है। कपूर अंकल से रोज उनका झगड़ा होता था। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही समुदायों पर भी। भारत में तो तभी शांति होगी, जब हर संप्रदाय, हर समुदाय को अपना अलग देश मिल जाएगा। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।'

मैंने जिज्ञासा प्रगट की, 'जम्मू-कश्मीर का क्या सोचा है?'

आदित्य ने कहा,'मेरी योजना लागू कर दी जाए, तो यह समस्या भी हल हो जाएगी। जम्मू के लोग हिन्दू भारत में आ जाएंगे। कश्मीर के मुसलमान मुस्लिम भारत में। सारा झगड़ा ही खत्म हो जाएगा। सभी को आजादी मिल जाएगी।'

'लेकिन कश्मीरी मुसलमान भारत के दूसरे मुसलमानों के साथ रहना पसंद करेंगे?'

'अकल, यह उनकी समस्या है। और यह बंटवारा ऐसे ही थोड़े हो जाएगा? देश में बड़े पैमाने पर जनमत संग्रह किया जाएगा। जरूरत पड़ी तो बार-बार जनमत संग्रह करवाया जाएगा। उसके बाद देश के बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों को ले कर भारत विभाजन आयोग गठित किया जाएगा। अरुंधति राय जैसा कोई व्यक्ति इस आयोग का महासचिव होगा। आयोग की रिपोर्ट पर संसद में विचार होगा। तब जा कर यह ऐतिहासिक कार्य संपन्न हो पाएगा।'

मैंने जिज्ञासा प्रगट की, 'अच्छा, यह बताओ, तुम्हारी योजना में हमारे जैसे लोगों का क्या होगा, जो न धर्म मानते हैं न जाति?'

आदित्य मुसकराते हुए बोला, "यह बात शुरू से ही मेरे दिमाग में थी। अगर ऐसे लोगों की की संख्या बीस लाख से ज्यादा हुई, तो इन्हें भी एक छोटा-सा देश मिलेगा।'

तब तक मेरी पत्नी तश्तरी में फल और मिठाई ले कर आ गई थी। उसने पूछा, " लेकिन बेटे, तुम्हारी योजना में हम स्त्रियों का क्या होगा? हम कहां रहेंगी?' आदित्य -- 'आंटी, क्या औरतों को भी अलग देश चाहिए? तब तो सारा बंटा धार हो जाएगा। वे वहीं जाएंगी जहां उनका परिवार जाएगा।' पत्नी -- 'क्यों, क्या औरतों को आजादी नहीं चाहिए?'

आदित्य विचारों में खो गया।

मैंने उसके चिंतन में बाधा डाली, 'और बेटे, तुम? तुमने अपने लिए इनमें से कौन-सा देश चुन रखा है?'

आदित्य हंसने लगा, 'अंकल, आप भी अजीब सवाल पूछते हैं। मुझे भारत में रहना ही नहीं है। आईआईटी पूरा होते ही मैं स्टेट्स चला जाऊंगा। वहां मेरे एक सगे अंकल हैं, दो मामा हैं, तीन कजन हैं। पापा ने कह रखा है, पहले तुम चलो, पीछे-पीछे हम भी आ जाएंगे।'

7 comments:

युग-विमर्श said...

व्यंग्य की यह शैली मार्मिक भी है और प्रभावक भी.

एस. बी. सिंह said...

विचारोतेजक आलेख के लिए शुक्रिया।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अच्छा व्यंग्य है।
दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
दीपावली आप के लिए सुख, समृद्धि और
खुशियाँ लाए!

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक-प्रहार!!

आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

मिहिर said...

rajkishore ji, saalon pehle shabbir shah pe aapka likha padha tha. ve purane din the..tab me iimc me tha....navbharat times me chape us anchor ko padhna bahut achcha laga tha. aj aapka blog dekha to achcha laga.

Dr. Amar Jyoti said...

इतने हल्के-फ़ुल्के अंदाज़ में इतनी गहरी बात कह गये आप। सचमुच यह आपके ही बस की बात है। हार्दिक बधाई।

अश्वनी श्रोत्रिय said...

वाह राज किशोर जी लेख बहुत अच्छा है और सोचने पर विवश करता है की अगर सचमुच ऐसा हुआ तो देश कितनी भयावह स्थिति में आ जाएगा और लेख का आखिरी क्षर बहुत मार्मिक है जब वो विदेश जाने की बात कहता है ! अगर सभी लोग इस देश से अपना काम निकल कर हाथ चुदा लेंगे तो इस देश को कौन सम्हालेगा !