Thursday, October 2, 2008

गांधी जयन्ती पर

उस दिन का गांधी

राजकिशोर

 

गरमी का महीना था। दोपहर का समय। दिल्ली की गरमी अपने चरम पर थी। ड्राइवर बस को दौड़ाए लिए जा रहा था, जैसे वह कोई अपराध करके भागा हो। कंडक्टर पीछे से दरवाजे को ठक् ठक् ठोंकते हुए उसका हौसला बढ़ा रहा था। अचानक बस दिल्ली गेट के स्टॉप पर रुकी। एक अधेड़-सा आदमी कंडक्टर से लड़ते-झगड़ते उतरा और बस के सामने जा कर खड़ा हो गया। दोनों के बीच हो रहे वाक्य विनिमय से पता चला कि वह यात्री एक स्टॉप पहले एक्सप्रेस बिल्डिंग पर उतरना चाहता था, पर कंडक्टर ने वहां बस नहीं रुकवाई। यात्री का कहना था कि वह इस गरमी में पैदल वापस नहीं लौटेगा। उसकी मांग यह थी कि बस से वापस जाने के लिए उसे एक रुपया लौटाया जाए, जो उन दिनों बसों का न्यूनतम किराया था। कंडक्टर देना नहीं चाहता था। यात्री का कहना था कि या तो मुझे एक रुपया लौटाओ या मेरी देह पर से बस चलाओ। पांच-सात मिनट के बाद कंडक्टर ने ऊबी हुई हार मान ली और यात्री की तरफ एक रुपए का सिक्का इस तरह फेंका जैसे भिखारी की ओर फेंकते हैं। इसके पहले कि बस रफ्तार पकड़ती, मैं भी उतर गया  -- उस पागल सरीखे आदमी को देखने के लिए, जो एक रुपए का अन्याय सहन कर पाने के परिणामस्वरूप अपनी जान देने पर आमादा था। दुबला-पतला शरीर, उस पर मामूली कुरता-पाजामा और पैरों में सस्ती-सी चप्पलें। चेहरे पर रहस्यमय आत्मतुष्टि और आंखों में चमक।

लगभग यही हुलिया उस आदमी का था जो किसी और दिन पता नहीं कहां से कर फुटपाथ के पांच-छह मलिन बच्चों के बीच खड़ा हो गया था। यह घटना रामकृष्णपुरम की है। शाम हुआ चाहती थी। उस वक्त मैं एक दुकान पर खड़ा हो कर चाय पी रहा था। आधी प्याली पी लेने के बाद ही चाय का मजा दुगुना करने के लिए सिगरेट सुलगा ली थी और अपने को व्यस्त रखने के लिए इधर-उधर आंखें दौड़ा रहा था। बीच सड़क पर बसें, कारें और तिपहिए आ-जा रहे थे। जब लाल बत्ती हो जाने से गाड़ियां रुक जातीं, तो वही मलिन लड़के कारों के आगे-पीछे भीख मांगने लगते थे। उस दूसरे अधेड़ आदमी के हाथ में पांच रुपए वाली कई चाकलेटें थीं। दृश्य के और दिलचस्प  होने की उम्मीद में चाय का प्याला जल्दी-जल्दी खत्म कर मैं फुटपाथ पर उन लड़कों के निकट सरक आया।

     चाकलेट वाले आदमी ने पता नहीं क्या इशारा किया कि सभी मलिन लड़के तेजी से आगे भागने लगे। मुसकराता हुआ अधेड़ उनके पीछे-पीछे। आगे एक चांपाकल था। देखते ही देखते वह सार्वजनिक हम्माम बन गया। अधेड़ ने एक-एक के हाथ में साबुन की छोटी-छोटी टिकिया रखी। लड़के रगड़-रगड़ कर नहाने लगे। उसके बाद हरएक को खादी का पतला-छोटा तौलिया दिया गया। उसे पहन कर लड़कों ने अपने कपड़े धोए। अब हरएक की हथेली पर एक-एक चाकलेट थी। थोड़ी देर बाद सभी को दो-दो केले मिले। मुझे देर हो रही थी। मैं आगे के दृश्य देखने की स्थिति में नहीं था। अपनी बस पकड़ने के लिए मैं उलटी दिशा में बढ़ चला। मेरी आंखें नम थीं और हृदय उत्फुल्ल।

     तीसरी घटना समाचार अपार्टमेंट्स के पास की है। हम दो मित्र मार्क्सवाद और गांधीवाद पर बातचीत करते हुए मयूर विहार फेज - एक से पैदल रहे थे। तभी फुटपाथ पर एक किनारे बेसुध लेटी हुई नंगी औरत पर हमारी नजर पड़ी। लगातार नहाने से शरीर काला  हो गया था। बाल उलझे हुए थे। या तो पागल थी या बीमार और कमजोर। कमर के आसपास उसने कुछ बांध रखा होगा, जो नींद या बेहोशी में खुल कर उड़ गया था। गनीमत यह थी कि उसका चेहरा रेलिंग की तरफ था। हमने कुछ क्षण उसकी तरफ देखा और अपनी-अपनी नजर झुका ली। उसका अस्तित्व मानो पूरी दिल्ली पर थूक-सा रहा था। इस थूक की बूंदें हमारे ऊपर भी पड़ रही थीं।

     तभी वहां से एक चालीस-पैंतालीस साल की महिला गुजरी। उसने भी उस औरत की नग्नता को देखा। ठिठकी। उसके माथे पर ही नहीं, पूरे बदन पर बल पड़े। उसने पर्स से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन किया। शायद सौ नंबर को। वहां से कोई और नंबर दिया गया। उस पर फोन किया। लगा, वहां से भी कोई और नंबर दिया गया। अब तक वह भली औरत परेशान हो चुकी थी। उसने खीज कर मोबाइल पर्स में रखा। अपना दुपट्टा उतार कर हाथ में लिया और उससे लेटी हुई औरत की नग्नता को ढक दिया। तभी उसे शक हुआ कि दुपट्टा हवा से उड़ जाएगा। उसने आसपास से तीन-चार पत्थर के टुकड़े उठाए और उनसे दुपट्टे को जहां-तहां से दबा दिया। इस बीच दस-पंद्रह तमाशबीन जमा हो गए थे। सबकी नजर से बचते हुए वह जिधर जा रही थी, जाने लगी। भीड़ के साथ-साथ हम भी छंटने लगे। अब हम दोनों अपने लिए ही काफी भारी हो चले थे। 000   

6 comments:

मिथिलेश श्रीवास्तव said...

वाकई गांधीजी और उनके विचार आज भी जिंदा हैं, लेकिन उन लोगों के बीच नहीं जो उनके नाम का डंका पीटते हैं...गांधीगीरी देखनी है उनके पास ही जाना होगा जिन्हें केवल 'गन्हीं महतमा' याद हैं...

सुशील कुमार छौक्कर said...

आपने आँखो देखी जिदंगीयों का वर्णन किया। लगता है कि इंसानियत जिंदा है। होसंले बुलंद है। एक बार की बात है एक लड़्का आया बोला कि भूख लगी है एक रुपया दे दो। मैने दो सिक्का निकाला दे दिया। कुछ देर बाद वही लडका हाथ में ब्रेड थामे आ रहा था। और उसने मुझे एक रुपया वापिस कर दिया। और चला गया। यह बात 1996 की बात होगी। हरदयाल लाईब्रेरी की।

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया...शुभ दिवस की बधाई एवं शुभकामनाऐं.

mamta said...

उसने पर्स से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन किया। शायद सौ नंबर को। वहां से कोई और नंबर दिया गया। उस पर फोन किया। लगा, वहां से भी कोई और नंबर दिया गया। अब तक वह भली औरत परेशान हो चुकी थी।
आज के समय की सच्चाई यही है की किसी की मदद करना चाह कर भी हम नही कर सकते. उक्त महिला ने प्रयत्न किया की शायद पुलिस या कोई संस्था उसकी मदद कर दे परन्तु संतोषजनक उत्तर न पाकर वह हतोत्साहित हो गई. जरुरत इस बात की है की हमारे समाज का हर अंग अपने कर्तव्यों
के निर्वाह के प्रति सजग हो. तब कोई भी हमें रास्ते में इस तरह नग्न या विक्षिप्त अवस्था में नही दिखाई देगा.

ममता शर्मा

mamta said...

उसने पर्स से मोबाइल निकाल कर किसी को फोन किया। शायद सौ नंबर को। वहां से कोई और नंबर दिया गया। उस पर फोन किया। लगा, वहां से भी कोई और नंबर दिया गया। अब तक वह भली औरत परेशान हो चुकी थी।
आज के समय की सच्चाई यही है की किसी की मदद करना चाह कर भी हम नही कर सकते. उक्त महिला ने प्रयत्न किया की शायद पुलिस या कोई संस्था उसकी मदद कर दे परन्तु संतोषजनक उत्तर न पाकर वह हतोत्साहित हो गई. जरुरत इस बात की है की हमारे समाज का हर अंग अपने कर्तव्यों
के निर्वाह के प्रति सजग हो. तब कोई भी हमें रास्ते में इस तरह नग्न या विक्षिप्त अवस्था में नही दिखाई देगा.

ममता शर्मा

राधेश्याम दीक्षित said...

ये सवाल हमारे सामने अक्सर आते हैं..कि क्या सब कुछ देखकर हम यूं ही एनदेखा करते रहें.सब कुछ देककर यूं ही अनदेखा करते रहें..बचपन में प्राथमिक शिक्षा के साथ नैतिक शिक्षा के पाठ के तौर पर बहुत सी कहानिया पढ़ाई जाती थीं..जिनका मकसद न सिर्फ सड़क के बीच पड़े पत्थर को हटाना था, या किसी अन्धे को सहारा देना, किसी भूखे के साथ अपना भोजन बांटना बल्कि शायद सीधे तौर पर उसका मकसद यही था कि उचित अनुचित का फर्क कर अपनी भुमिका अदा करना ...लेकिन आपकी छोटी सी कहानी , जो कि आमतौर पर हर उस इन्सान के साथ घटती है..जिसके भईतर कहीं अभी भी इन्सानियत लेशमात्र शेष है...लेकिन दिल्ली जैसे शहर या फिर शहरों में आने के बाद लोगों को दिल की आवाज सुनकर भी अनसुना करने की आदत सी पड़ती जा रही है...मैं भी इसका शिकार हो चुका हूं...कभी कभी सोचता हूं कि जो कर रहा हूं...वो ग़लत है..लेकिन फिर सोचता हूं कि कुछ है ..जो हमें ख़ुद से अलग कर रहा है...ये सबके अपने अपने सवाल हैं...जिनके जवाब हमें ख़ुद ही ढ़ूढ़ने होंगे.................?