Sunday, October 17, 2010

आधी शुद्ध आधा बेशुद्ध

राजकिशोर

एक लड़का था। मध्य वर्ग में भी जो मध्य वर्ग होता है, उसी वर्ग का। जब वह बड़ा होने लगा, तो अंग्रेजी माध्यम के एक नजदीकी स्कूल में उसका दाखिला करा दिया गया। स्कूल में फीस तगड़ी ली जाती थी, पर वह सांस्कृतिक मुफलिसी का शिकार था। वहां न अंग्रेजी अच्छी पढ़ाई जाती थी न हिन्दी। लड़के में प्रतिभा थी। एक शाम, जब नीम के पत्ते गिरने लगे और मन की उदासी बढ़ने लगी, उसकी कवि-प्रतिभा फूट पड़ी। उसने एक छोटी-सी कविता लिखी -

कितने अच्छे हैं मेरे पेरेंट्स

उन्होंने दिया मुझे बर्थ

मुसकाया स्काइ नाच उठी अर्थ

नाउ आइ एम टेन एंड वन

अपने पेरेंट्स का प्राउड सन

वे हैं मेरे बेस्ट फ्रेंड्स

जानते हैं लेटेस्ट ट्रेंड्स

उनकी कृपा से एव्रीथिंग आइ गॉट

जब मैं पूरा ग्रो कर जाऊंगा

आइ विल अर्न ए लॉट

अपनी कविता को कॉपी पर सजावटी अक्षरों में उतार कर वह सातवें आसमान की ओर उड़ चला। रात भर आधा सोता आधा जागता रहा। अगले दिन उसने अपनी अंग्रेजी शिक्षिका को अपनी कविता दिखाई। वह हंसने लगी। फिर संजीदा हो कर बोली, - बेटे, तुम्हें पूरी पोएम इंग्लिश में ही राइट करनी चाहिए थी। शिक्षिका ने पहली पंक्ति को इस तरह सुधारा - हाउ ग्रेट आर माइ पेरेंट्स और लड़के से कहा, बाकी तुम देख लेना। वहां से निराश हो कर लड़का हिन्दी शिक्षक के पास गया। वह भी हंसने लगा। बोला, अटेम्प्ट तो अच्छा है, पर तुम्हें पूरी कविता को हिन्दी में ही कंपोज करना चाहिए था।। हिन्दी शिक्षक ने पहली पंक्ति को इस तरह सुधारा - कितने भले हैं मेरे माता-पिता ।

वहां से भी दुखी हो कर लड़का टिफिन की घंटी के बाद ही, पेट दर्द का बहाना कर, घर लौट आया। अब वह अपनी कविता को कभी पूरी अंग्रेजी में तो कभी पूरी हिन्दी में लिखने की कोशिश करने लगा। लेकिन सब बेकार। अंत में उसने पाया कि न उसकी अंग्रेजी इतनी अच्छी है कि वह अपनी कविता को पूरी तरह अंग्रेजी में लिख सके, न उसकी हिन्दी इतनी अच्छी है कि वह उसे पूरी तरह हिन्दी में लिख सके। थक कर वह उस रात बिना खाए ही सो गया। अगले कई महीनों तक उसने कोई कविता नहीं लिखी।

जिस हिंग्लिश को बातचीत की भाषा के स्तर पर स्वीकार करने की तर्क-सम्मत-सी दिखती हुई वकालत सुरेश कुमार ने (जनसत्ता, 10 अक्टूबर 2010) की है, उसका एक नतीजा यही होने वाला है। यह सिर्फ मेरी कल्पना नहीं है, सुरेश जी भी संजीदा हो कर भविष्य की कल्पना करेंगे, तो उनके हाथ भी यही लगेगा। मैं जानता हूं कि वे भाषा के मामले में सक्षम और सुरुचि-संपन्न व्यक्ति हैं, तभी इतनी प्रांजल भाषा में उन्होंने यह टिप्पणी लिखी है। वे हिंग्लिश के बढ़ते हुए असर से खुद भी चिंतित हैं। वे बहुत साफ-साफ कहते हैं, 'हां, यह ठीक है कि हिंग्लिश की यह वकालत आधा सच है। बाकी आधा सच नकारात्मक ही है। शिक्षा विशारदों के अनुसार यह सामान्यतया "हिन्दी पर अधिकार, न अंग्रेजी पर अधिकार" की स्थिति है। इसे शिक्षा-व्यवस्था का अंग नहीं बनाया जा सकता - ऐसी हिन्दी सीखने-सिखाने का आदर्श नहीं बन सकती।' फिर भी, उनकी मान्यता यह है कि 'जिस प्रकार समाज में प्रचलित व्यवहारों में कुछ ही अनुकरणीय होते हैं, शेष अन्य को हम बर्दाश्त करते हैं, इस प्रकार हिंग्लिंश को भी हम बर्दाश्त करेंगे, करना पड़ेगा, पर उसके अनुकरण को भाषा सौष्ठव की दृष्टि से सब प्रयोजनों के लिए संस्थागत आधार पर प्रोत्साहित न करना ही उचित होगा।'

जाहिर है, सुरेश कुमार के इरादे में कोई खोट नहीं है। वे हिन्दी के शुभचिंतक हैं। वे उन लोगों के भी शुभचिंतक हैं जो परिस्थितिवश हिंग्लिश का प्रयोग कर रहे हैं। इस दुहरी प्रतिबद्धता की वजह से ही वे एक क्षेत्र हिन्दी को देते हैं जहां कोई भी समझौता उन्हें मंजूर नहीं है और एक क्षेत्र हिंग्लिश को, जहां कोई भी समझौता मान्य है। अगर सुरेश कुमार इस उदाहरण का आनंद ले सकें, तो मैं कहना चाहूंगा कि यह बंटवारा कुछ-कुछ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले की तरह है जिसे मान लेने पर विवादग्रस्त भूमि पर न मंदिर बन सकेगा न मस्जिद खड़ी की जा सकेगी। कई बार समाज न्यायालय से अधिक बुद्धिमान होता है। हिन्दी के इसी समाज का आग्रह है कि अगर बीस करोड़ लोगों की इस भाषा ने इस रपटीली राह पर चलना स्वीकार कर लिया, तो अंततः वह खत्म हो जाएगी, उसकी गिनती क्रियोल भाषाओं में होने लगेगी, जिसका मतलब यह है कि वह न इधर की रहेगी न उधर की, और शायर कहेंगे, सुनते हैं कि हिन्दी भी थी अच्छी-सी इक जुबान

मुद्दा साधु भाषा और जन भाषा का नहीं है। दोनों में हमेशा अंतर रहा है। मुद्दा सिद्धांत और व्यवहार का भी नहीं है। दोनों में फर्क जितना ज्यादा हो, जीवन उतना ही प्रदूषित होता है। मुद्दा यह है : क्या यह संभव है कि शिक्षित समाज में कुछ लोग हिन्दी लिखते और बोलते रहें तथा कुछ लोग हिंग्लिश का प्रयोग करते रहें ? द्वंद्व का यह दौर पढ़े-लिखों और कम या गैर-पढ़े-लिखों के बीच नहीं, बल्कि पढ़े-लिखों और पढ़े-लिखों के बीच है। यही, एक ही, वर्ग हिंग्लिश का जनक है। इस वर्ग की झूठी तारीफ में 'द्विभाषी संस्कृति' नामक एक विचित्र चीज की कल्पना की गई है। मैं नहीं जानता कि यह चिड़िया देश के किस भाग में पाई जाती है। अशोक वाजपेयी और कृष्ण कुमार जैसे विशिष्ट अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो जो लोग मुख्यतः अंग्रेजी में काम करते हैं, उनकी हिन्दी हांफती रहती है और जो मुख्यतः हिन्दी में काम करते हैं, उनकी अंग्रेजी को हिचकी आती रहती है। क्या हम उस दौर की असहाय प्रतीक्षा करते रहें जब हिन्दी 'द्विभाषी संस्कृति' की नकली आभा से चमकने लगेगी और अंत में खोटा सिक्का असली सिक्के को बाजार से बाहर कर देगा?

सुरेश कुमार व्यावहारिक समस्याओं का हल निकालने के लिए यह व्यावहारिक सुझाव देते हैं, 'अगर हम पाठ्य पुस्तकों की हिन्दी में विशिष्ट तकनीकी शब्दावली अंग्रेजी में (रोमन लिपि का प्रयोग करते हुए) रखें और सामान्य शब्दावली (बहुप्रचलित तकनीकी शब्दों के साथ) और वाक्य रचना हिन्दी में ही रहे तो क्या हमारे प्रशिक्षुओं का ज्ञान, व्यवहार की दृष्टि से अधिक कार्यसाधक न होगा? ... बोलें 'ग्लोबल वार्मिंग' और पढ़े-लिखें 'वैश्विक तापमान वृद्धि' तो क्या उनकी उलझन और बोझ नहीं बढ़ेंगे?' बढ़ेंगे, जरूर बढ़ेंगे। लेकिन यह बढ़ना वैसा ही होगा जैसे पहले तो किसी की टांग तोड़ दी जाए और जब डॉक्टर उसके लिए बैसाखी बनाने लगे, तो शिकायत की जाए कि इससे उस आदमी की उलझन और बोझ नहीं बढ़ेंगे? बेशक टूटे हुए पैरों को बैसाखी अच्छी लगती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बैसाखी का प्रचलन बढ़ाने के लिए लोगों की टांगें तोड़ना शुरू कर दिया जाए। फिर तो बाजार में बैसाखी ही बैसाखी दिखने लगेगी। अंत में बैसाखी उद्योग के हित में यह राष्ट्रीय नीति बनाई जाएगी कि जन्म लेते ही बच्चों के दोनों पैर काट दिए जाएं।

जाहिर है, सुरेश कुमार जैसे सुधी लोग इस दृश्य की कल्पना कर कांप उठेंगे। लेकिन हिंग्लिश को थोड़ी भी मान्यता मिल गई, तो वह बीस-तीस साल में ही हिन्दी को चट कर जाएगी। भाषा पहले बोली जाती है, फिर लिखी जाती है। लिखे जाने पर उसके मानक रूप स्थिर होते हैं। इसी मानक रूप से भाषा का विकास होता है। उसमें साहित्य और दर्शन की सृष्टि होती है। जब बोली जाने वाली भाषा आक्रामक रूप से अशुद्ध होने लगती है, तब समाज में शुद्ध भाषा की रक्षा वैसे ही की जाती है जैसे संस्कृत भाषा की रक्षा की गई है - उसके हाथ-पांव बांध कर। इसी प्रक्रिया में संस्कृत जानने वालों की संख्या कम होती गई और अब वह पोथियों में ही मिलती है। हिंग्लिशीकरण के बाद भी हिन्दी रहेगी, क्यों नहीं रहेगी, पर कुछ किताबों तक महदूद हो कर।

अंग्रेजी राज में हिंग्लिश की शुरुआत नहीं हुई, जब इसकी गुंजायश बहुत ज्यादा थी। यह शुरुआत आजादी के कई दशकों के बाद हुई, क्योंकि भारत का शासक वर्ग हिन्दी सीखने और उसका प्रयोग करने के लिए राजी नहीं था। यही दुर्दशा अन्य भारतीय भाषाओं की भी हुई। वे साधन-संपन्न लोगों द्वारा मजा लेने के लिए नौकरानियों से पैदा हुई संतानें हो गईं। अगर शुरू से ही भाषा नीति और शिक्षा नीति को आमूलचूल बदल कर उनका भारतीयकरण करने का व्यवस्थित प्रयास किया गया होता, तो आज हिन्दी के शिक्षित समाज में 'ग्लोबल वार्मिंग' जैसे शब्द नहीं सुने जाते। आखिर कोई तो बात होगी कि भारत के दस बड़े फिल्मी सितारों, दस बड़े खिलाड़ियों, दस बड़े उद्योगपतियों और दस बड़े मीडिया व्यक्तित्वों में आधे भी ऐसे नहीं हैं जो अपनी मातृभाषा में दस शुद्ध वाक्य बोल या लिख सकें। यही वे डॉक्टर बंधु हैं जो पहले आदमी की टांग तोड़ते हैं और फिर कहते हैं, बैसाखी का इस्तेमाल करने में बुराई क्या है; देखो, हम भी तो बैसाखी पर ही चल रहे हैं। 000

3 comments:

अनूप शुक्ल said...

वर्धा से लौटने के बाद आपको पढ़ने की उत्सुकता था। यह लेख पढ़ने को मिला । अच्छा लगा। टांग तोड़कर बैसाखी की आनिवार्यता महसूस करानी वाली बात बहुत सही कही आपने।

अच्छा लगा आपको पढ़ना।

daddudarshan said...

अभी कुछ दिन पहले की बात है ,एक पढ़े-लिखे सज्जन (हिंगलिश प्रजाति के) किसी याचिका के सिलसिले में कोर्ट गए | जब भी जज महोदय कुछ पूछते तो वे 'यस-ऑनर ' या 'जी
माई-बाप ' की जगह ' या' , 'या' कहते जा रहे थे | संकर- प्रजाति भाषा का ज्यादा ज्ञान नहीं है | 'या' शब्द शायद इंग्लिश के 'यश' हिंदी के 'हाँ ' से मिलकर बना होगा | खैर ! जज साहब
को गुस्सा आ गया ; वे कहने लगे ," यदि तुमने एक बार और 'या','या' कहा तो मैं तुम पर कारवाही करूंगा , इतनी भी तमीज नहीं कि कॉफ़ी-हॉउस और जज से रूबरू होने का फर्क समझ
सकें |" कहने का मतलब माननीय न्यालय ने प्रथम-द्रष्टा नकार दिया | वैसे भी बच्चा तभी अच्छा , जब माँ भी अपनी हो और बाप भी अपना ही हो ,नहीं तो नाजयिज-औलाद कहलाती है |
मात्र-भाषा के पक्ष में एक समसामयिक बहुत अच्छा लेख ,बधाई |

प्रवीण त्रिवेदी ╬ PRAVEEN TRIVEDI said...

जानबूझकर ठेली गयी हिंगलिश से घृणा सी है !!