Monday, October 11, 2010

दलित राजनीति का नया चेहरा

दलितों का अंग्रेजी प्रेम

राजकिशोर

मैं अगर दलित होता, तो इस विषय पर लिखना मेरे लिए ज्यादा उचित होता। बेशक दलित मैं होना चाहता हूं, ताकि देश के इस सर्वाधिक वंचित और अपमानित समूह के लिए कुछ काम कर सकूं। लेकिन भारत की जाति व्यवस्था ऐसी है कि न कोई अपनी जाति निर्धारित कर सकता है और न अपनी जाति बदल सकता है। फिर भी मैं अपना कर्तव्य समझता हूं और अधिकार भी कि इस विषय में अपने विचार रख सकूं कि दलितों की भलाई किसमें है। इस तरह के हस्तक्षेप दलित विचारकों को अच्छे नहीं लगते, यह जानते हुए भी मैं अपनी बात कहना चाहता हूं, क्योंकि यह मानने से मेरा सीधा इनकार है कि सिर्फ दलित ही दलितों के शुभचिंतक हो सकते हैं। उलटे मेरा मानना है कि दलित विचारक दलितों को गुमराह भी कर सकते हैं, जैसे सवर्ण विचारक सवर्णों को और पिछड़ावादी विचारक पिछड़ों को या हिन्दूवादी हिन्दुओं को और मुसलमान नेता मुसलमानों को गुमराह कर सकते हैं।

खबर यह है कि उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में अंग्रेजी देवी का मंदिर बनाया जा रहा है। इस मंदिर के लिए अंग्रेजी देवी की जो मूर्ति तैयार की गई है, उसकी शक्ल अमेरिका की स्टैट्यू ऑफ लिबर्टी से बहुत मिलती है। मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा 25 अक्टूबर को होना है। यह लॉर्ड मेकाले का जन्मदिन है। मैकाले को भारत में ब्रिटिश पद्धति की शिक्षा प्रणाली शुरू करने और अंग्रेजी का चलन बढ़ाने के लिए जाना जाता है। इसी आधार पर स्वतंत्र भारत के अंग्रेजीपरस्त वर्ग को मेकाले की मानस संतान कहा जाता है। अंग्रेजी देवी की स्थापना का उद्देश्य दलितों को यह संदेश देना है कि अंग्रेजी को अपनाने से ही उनका कल्याण हो सकता है।

दरअसल, यह पूरा कार्यक्रम दलित बुद्धिजीवी चंद्रभान प्रसाद की वैचारिक देन है जो कई वर्षों से मेकाले का जन्न दिवस मनाते आ रहे हैं। कई अन्य दलित बुद्धिजीवियों की तरह चंद्रभान प्रसाद मानते हैं कि एक समूह के रूप में दलितों को राजनीतिक मान्यता देने तथा उनके कल्याण के लिए निश्चित कदम उठाने का श्रेय भारत में अंग्रेजी शासन को ही है। चंद्रभान की यह उक्ति याद रखने लायक है कि अंग्रेज भारत में देर से आए और जल्दी चले गए। खुद डॉ. अंबेडकर का अंग्रेजों से कहना था कि दलित समस्या को सुलझाए बगैर आप भारत नहीं छोड़ सकते। अंग्रेज तो चले गए -- भारत की किसी भी समस्या को सुलझाए बिना, क्योंकि वे भारत का शोषण करने के लिए यहां आए थे न कि भारत कि समस्याओं को सुलझाने के लिए, पर अंग्रेजी फल-फूल रही है। अंग्रेजी ही भारत के प्रभु वर्ग की भाषा है। जैसे-जैसे इस प्रभु वर्ग भारत पर अपना कब्जा मजबूत कर रहा है और साधारण लोगों को और भी ज्यादा हाशिए पर धकेल रहा है, अंग्रेजी का पलड़ा भारी होता जाता है।

ऐसी स्थिति में, स्वाभाविक है कि अंग्रेजी को उन्नति की सीढ़ी मान लिया जाए। समाज के सभी हिस्से ऐसा ही मान कर चल रहे हैं, तो दलितों में यह भावना आना स्वाभाविक है। चंद्रभान प्रसाद इसी भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंग्रेजी ज्ञान से वे स्वयं भी लाभान्वित हुए हैं। जहां अधिकांश दलित लेखक, विचारक और कार्यकर्ता अपने-अपने राज्य तक सीमित हैं या भारत की सीमाओं को पार नहीं कर पाए हैं, वहीं चंद्रभान ने अपना अंतरराष्ट्रीयकरण कर लिया है। बताते हैं कि 30 अप्रैल को जब अंग्रेजी माता के मंदिर का शिलान्यास हुआ था, इस अवसर पर दो विदेशी पत्रकार भी आए थे।

दलित उभार में अंग्रेजी के उपयोग की निश्चित भूमिका है। अगर डॉ. अंबेडकर ने दलित प्रश्न को उठाने के लिए अंग्रेजी का उपयोग नहीं किया होता, तो उनकी आवाज में दम नहीं आ पाता। आज भी जो अंग्रेजी में अपनी बात नहीं रख पाते, उनकी कोई सुनता नहीं है। हालांकि इसके विपरीत उदाहरण भी हैं। मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, मायावती, नीतीश कुमार आदि नेताओं को अंग्रेजी बहुत कम आती है, फिर भी उनकी गिनती सफल नेताओं में होती है। बस यह है कि सभी के लिए यह रास्ता खुला नहीं है। इसके अलावा, इस रास्ते से मुट्ठी भर लोग ही प्रभु वर्ग के सदस्य बन सकते हैं, साधारण जनता नहीं जिसका प्रतिनिधित्व करने का वे दम भरते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि क्या अंग्रेजी के आधार पर देश का निर्माण किया जा सकता है ? दुनिया में कोई भी ऐसा देश ऐसा नहीं है जिसने विदेशी भाषा में अपना निर्माण या पुनर्निर्माण किया हो। फिर भारत अपवाद कैसे हो सकता है? हमारा खयाल तो यही है कि यदि स्वतंत्र होते ही भारत के सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी को हटा दिया जाता तथा प्रशासन, शिक्षा, न्याय आदि का काम देशी भाषाओं में शुरू कर दिया गया होता, तो भारत आज एक विकासमान नहीं, विकसित देश होता।

अंग्रेजी-प्रेमी दलित विचारकों को, ऐसा लगता है, भारत के समग्र विकास में कोई रुचि नहीं है। उनकी दिलचस्पी सिर्फ दलितों के सशक्तीकरण में है। वे देखते हैं कि अंग्रेजी की महफिल में घुसने के बाद भारत का आदमी तेजी से तरक्की करने लगता है, इसलिए उन्हें लगता है कि दलितों की उन्नति का सच्चा रास्ता यही है। इस संदर्भ में निवेदन है कि यह रास्ता देश के सभी दलितों को कभी भी उपलब्ध नहीं हो सकता। चंद्रभान प्रसाद ही बताएं कि उनके बचपन के संगी-साथियों में कितने लोग अंग्रेजी में दक्षता हासिल कर सके हैं। वर्तमान व्यवस्था में मुट्ठी भर लोग ही और फलस्वरूप मुट्ठी भर दलित ही अंग्रेजी का फायदा उठाने की स्थिति में आ सकते हैं। साधारण लोगों के हित में तो यही है कि देशी भाषाएं अंग्रेजी को अपदस्थ कर दें। ऐसा करने पर हमारा लोकतंत्र भी मजबूत होगाऔर वंचित लोग भी न्याय पाने या न्याय छीनने में सफल हो सकते हैं।

3 comments:

daddudarshan said...

सबसे पहले तो एक अरसे बाद अपनी पोस्ट पर आने के लिए आपको बधाई | मन में कई शंकाएँ उठ रहीं थीं ,आपकी लम्बी चुप्पी पर ;खैर! खुशामदीद ;जो सारीं शंकाएँ गलत सवित हुईं | अब आए हैं तो थोक के भाव में | एक के बाद एक तड़ातड़ कई A पोस्ट ;पुन: बधाई |
बाबा-साहिब ने कहा था कि, "अंग्रेगी भाषा शेरनी का दूध है,जो पिएगा वही दहाड़ेगा | और सच भी है | यदि बाबा साहिब को अंग्रेजी का विस्तृत ज्ञान न होता, तो न वे अंग्रेजों से(जो उस समय देश के शासक थे ) अपनी (दलितों की) बात असरकारक तरीके से रख पाते| और न दलितों का कोई उद्धार हो पाता | जिस रूपमें आज आप दलित बिरादरी को देख रहे हैं,ये विल्कुल भी नहीं होता | ये सच है कि बाबा-साहिब की विद्वता के आगे अंग्रेजी का कोई मोल नहीं | लेकिन कांटा,कांटे से ही निकलता है | मैं आपकी इस बात से भी इत्तफाक रखता हूँ कि अंग्रेज केवल देश को लूटने आए थे ;फिर भी उनके सुधार-शिक्षा पर जोर देना (अंग्रेजी ही सही),कई सामाजिक कुरीतियों के प्रति शख्ती से पेस आना, देश में रेल-यातायात को बढ़ावा देना आदि और भी हैं जिन्हें नाकारा नहीं जा सकता |
देश में सबको अपने तरीके से जीने का हक है | यदि दलित अंगेजी में अपना उद्धार खोजते हैं तो यही सही |
लेख अच्छा लगा और सबसे अच्छा ये लगा कि आपके विचार पढ़ने को मिलने लगे | धन्यवाद |

satyendra... said...

निश्चित रूप से अंग्रेजी की माला जपने से दलित उत्थान होगा। लेकिन अगर यह उचित समय पर हो जाए तो। आरक्षण के तर्ज पर नहीं- कि जब सरकारी नौकरियां करीब खत्म हो गईं और नौकरियां कारोबारियों के हाथ चली गईं तो पिछड़े वर्ग को आरक्षण का झुनझुना पकड़ा दिया गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि अंग्रेजी जानने वाले भारत में इलीट हैं। जो हिंदी या देशी भाषाओं की माला जपकर सामान्य लोगों को बेवकूफ बनाते हैं उनके बच्चे भी अंग्रेजी माध्यम और भाषा ही पढ़ते हैं, क्योंकि भारत में यह सम्मान के साथ रोजी रोटी से जुड़ा मसला है।

अनूप शुक्ल said...

आपकी बात से सहमत!