Friday, May 30, 2008

पुलिस बनाम प्रदर्शनकारी


पुलिस ऐसा क्यों करती है
राजकिशोर



मेरे सामने एक तसवीर है। तीन युवक हैं, जिनमें से एक जमीन पर गिरा हुआ है, दूसरे को पुलिस जबरदस्ती उठाना चाह रही है और तीसरे की पीठ पर एक पुलिसमैन अपना पैर रखे उसे कुचल रहा है। यह घटना मुंबई की है। तीनों ही युवक प्रदर्शनकारियों में हैं -- कर्नाटक के एक सीमावर्ती जिले के, जहां वह महाराष्ट्र से लगता है। ये मराठी भाषी हैं। प्रदर्शन का मुद्दा यह है कि महाराष्ट्र सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा की गई नियुक्तियों में इन्हें प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई।

यह तसवीर न तो अजीबोगरीब है और न ही उनसे ज्यादा खूंखार जो आम तौर पर अखबारों में या टेलीविजन पर दिखाई देती हैं। इसे देख कर दिल नहीं दहलता। लेकिन युवक की पीठ पर दबा कर रखा हुआ जूतेदार पैर एक बार फिर वह सवाल पूछने के लिए प्रेरित करता है जो इसके पहले हजारों बार पूछा जा चुका है और शासकों की मानसिकता में सुधार नहीं हुआ तो आगे भी पूछा जाता रहेगा : पुलिस ऐसा क्यों कर रही है? पुलिस ऐसा क्यों करती है? इस संदर्भ में प्रदर्शनकारियों की मांग पर विचार करना अप्रासंगिक है। यह मांग सही भी हो सकती है और गलत भी। दोनों ही स्थितियों में, पुलिस का व्यवहार एक जैसा होना चाहिए। उसे जनता की किसी मांग के औचित्य पर विचार करने के लिए नियुक्त नहीं किया गया है। उसका काम है कानून और व्यवस्था को बनाए रखना। प्रदर्शनकारियों के साथ आम तौर पर पुलिस का जैसा व्यवहार रहता है, क्या वह कानून और व्यवस्था को बनाए रखने का एकमात्र तरीका है? या, उसके सभ्य और लोकतांत्रिक विकल्प हो सकते हैं? पुलिस का काम यह तो हो नहीं सकता कि प्रदर्शन करनेवालों को वह इस कदर धुन दे कि दूसरे लोग सरकार के सामने अपनी मांगें ले कर जाने के पहले सौ बार सोचें। उसका काम यह है कि वह लोकतांत्रिक ढांचा सुरक्षित रहे, जिसमें नागरिकों और सरकार के बीच का संबंध अशिष्ट नहीं होता।

यह तो तय ही है कि भारतीय पुलिस का यह चरित्र कोई नई घटना नहीं है। सामंती काल से ही वह ऐसी या इस जैसी रही है। वह शासन रुआब पर जितना आधारित था, परवर्ती अंग्रेजी शासन उससे कहीं ज्यादा आधारित था। उसके पहले के शासक जैसे भी थे, भारतीय थे। उन्हें भारत में ही रहना था, अपनी जिंदगी गुजारनी थी। अतएव आपवादिक रूप से क्रूर और अदूरदर्शी शासकों को छोड़ कर सामान्य जनता के साथ निबाह करके ही चलना था। ब्रिटिश शासकों के साथ ऐसा नहीं था। वे उपनिवेशवादी थे। उन्हें भारत को अपना देश नहीं बनाना था, यहां से धन-संपत्ति लूट कर ब्रिटेन को समृद्ध करना था। यह भारतीय जनता पर ज्यादा से ज्यादा आतंक स्थापित करके ही किया जा सकता था। इसलिए उसकी पुलिस का चरित्र अगर जन-विरोधी था, तो यह अस्वाभाविक नहीं लगता। जो अस्वाभाविक लगता है, वह यह है कि देशी पुलिस अपने ही भाई-बहनों को इस तरह क्यों सताती थी मानो वे दोनों दो अलग-अलग देशों के नागरिक हों। यह तत्कालीन भारतीय पुलिस में देशभक्ति और मानव संवेदना के अभाव की ओर संकेत करता है। शासन के प्रति वफादारी का मतलब यह नहीं है कि दूसरी और उतनी ही या उससे ज्यादा महत्वपूर्ण वफादारियों को भुला दिया जाए -- उदाहरण के लिए मानव मूल्यों के प्रति वफादारी।

आजादी के बाद की पुलिस व्यवस्था में देशभक्ति और मानव संवेदना के अभाव का ही विस्तार दिखाई देता है। अर्थात सरकार भले ही देशी हो गई हो, पर उसके चरित्र और व्यवहार में विदेशीपन बरकरार रह गया। कह सकते हैं कि प्रशासनिक स्तर पर नई लोकतांत्रिक व्यवस्था का कोई विशेष लाभ भारत की जनता को नहीं मिला। नए शासक लोकतंत्र के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की राजनीतिक संस्कृति को तो बनाए रखना चाहते थे, पर उनकी इच्छा यह नहीं थी कि सरकार और नागरिक के संबंधों में कोई बुनियादी फर्क पड़े। यह अनिच्छा नागरिकों के प्रति पुलिस के व्यवहार में लगातार दिखाई देती है। शासन किस दल का है, वामपंथी है या दक्षिणपंथी, ब्राह्मणवादी है या दलितवादी या पिछड़ावादी, इससे पुलिस के मूल आचरण में कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके लिए सभी शासकों का एक ही आदेश है : जो भी व्यक्ति या समूह सरकार के लिए दिक्कत पैदा करता है, उसे पकड़ो और मारो। यूरोप या अमेरिका की पुलिस का आचरण ऐसा नहीं है, क्योंकि वहां सरकार और नागरिकों के संबंध इतने सामंती नहीं हैं। पूर्व सोवियत रूस, चीन, उत्तर कोरिया, वियतनाम आदि का मामला भारत से भी गया-गुजरा है, क्योंकि वहां की सरकारों में तानाशाही के अनेक तत्व हैं।

यहां दूसरे पक्ष पर भी विचार करने की जरूरत है। आजादी के पहले विरोध और प्रदर्शन की एक अहिंसक संस्कृति का विकास हुआ था। दुनिया भर में यह पहली बार हुआ कि सरकार का विरोध करनेवालों ने पुलिस पर हाथ नहीं उठाया और उसकी लाठी-गोली का सामना साहस और धीरज के साथ करते रहे। सत्याग्रह की वह संस्कृति कहां चली गई? आजादी के बाद खूनी दंगों के दौरान गांधी जी ने अपने अनुयायियों से निराशा व्यक्त करते हुए कहा था कि मैं समझता था कि उन्होंने सत्य और अहिंसा को स्वीकार कर लिया है, पर यह मेरा भ्रम था -- अहिंसा उनके लिए रणनीति मात्र थी। आजाद होते ही, मूल चरित्र उभर कर आ गया। आंदोलनकारी भी उतने ही उग्र और खूंखार होने लगे जितनी वह पुलिस थी जो उनका दमन करती थी। बिहार आंदोलन के दौरान पहली बार यह नारा सुनाई दिया : पुलिस हमारा भाई है, उससे नहीं लड़ाई है। यह सीधे और सरल जयप्रकाश के कारण संभव हुआ। लेकिन जल्द ही यह छोटा-सा दीया भी बुझ गया। बिहार आंदोलन से निकले शासकों तथा अन्य शासकों में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया। आज भी वही स्थिति जारी है।

अगर आंदोलनकारी एक बेहतर संस्कृति की रचना करना चाहते हैं, तो वे पुलिस को क्रूर होने का मौका ही क्यों देते हैं? उन्हें पुलिस से अनावश्यक मुठभेड़ क्यों करनी चाहिए? पुलिस पर पत्थर फेंकना, उसे अपने ऊपर आक्रमण करने के लिए उकसाना अच्छी बात नहीं। प्रदर्शकारियों को चाहिए कि वे पुलिस को मित्र बनाने का प्रयत्न करें। बेशक इसके बावजूद पुलिस बहुत दिनों तक अपना काम उसी तरह करेगी जिस तरह वह करती आई है, पर धीरे-धीरे उसके स्वभाव और चरित्र में परिवर्तन आएगा। नहीं भी आया, तो शिष्ट और सुसंस्कृत होने में बुराई क्या है?

4 comments:

aman said...

लंबे समय से आपके लेख पढ़ता आ रहा हूं, दिल्‍ली से भोपाल आकर इन दिनों भास्‍कर से जुड़ा हूं, अपने विचार इस ब्‍लाग पर दे रहा हूं, उम्‍मीद है आपकी प्रतिक्रिया मिलेंगी।
अमन
www.jajbat.blogspot.com

tasleem said...

sir namaskaar,
sab kuchh samajh me aa jayega, kahi thode se pradershankaari hon aur media ka jamavda, ve yeh bhi bhul jate hai ki ham kis mudde ko lekar pradershan kar rahe the! koyi prayaas ganbhirta se hota dikhai nahi deta.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

जहाँ तक पुलिस का सवाल है तो यदि हमने अपने देश की पुलिस बनाई होती तो ऐसा नहीं होता. अंग्रेजों का छोटा रूप हमें देखने को मिल रहा है. करेंगे भी क्या आप, कुछ करते भी हैं तो हवालात (हवा के साथ लातों का मज़ा) दीखता है.

Shivshankar Malviya said...

polis ke baare me koi bhi kuch bhi kahta hai galat hai. polis nishkriya hai...nikammi hai...polis ne esa kiya....vaisa kiya.......
ham kya kar rahe hai..polis ko kar hi rahi hai.....hamari raksha.... kuchch bhi hota hai to polis ki burai hoti hai.......kabhi achchai bhi karen........hal hi me election hua hai.......polis ka kaam aur election commission ka kaam.......tarife kabil hai.....yadi galti karenge to saja to milegi hi.........na... chahe koi bhi.....polis nahi karegi to uparwala hai.....polis ki lathi me awaj hai dikhai deti hai sunai deti hai.......uparwale ki lathi me awaj nahi hoti hai.....uska kya karoge.....polis ko to bhala bura kag doge.....uparwale ko kya kahoge.......