Sunday, March 30, 2008

समाजवाद के प्रश्न

समाजवादी किसे कहेंगे
राजकिशोर

एक बार मिर्जा गालिब से किसी अंग्रेज ने पूछा -- क्या टुम मुसलमान है? गालिब ने जवाब दिया -- हुजूर, आधा। मतलब पूछे जाने पर गालिब ने कहा -- शराब पीता हूं, सूअर नहीं खाता। लेकिन इस्लाम के किसी अनुयायी से पूछ कर देखिए, वह यह नहीं मानेगा कि जो आदमी सूअर नहीं खाता और शराब नहीं पीता, वह पूरा मुसलमान है। दुनिया की बात छोड़िए, भारत में ही ऐसे करोड़ों लोग हैं, जो इन दोनों चीजों से दूर हैं। तो क्या वे सभी मुसलमान हो गए? मुसलमान होने के लिए कुछ करना भी होता है, जैसे खुदा और रसूल में यकीन रखना, नमाज पढ़ना, रोजा रखना, जकात देना आदि-आदि। यह सब करने के बाद भी कोई खरा मौलवी कह सकता है कि जो यह सब करते हैं, लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए -- हकीकत में वे न खुदा से डरते हैं और न कुरआन की हिदायतों के मुताबिक जीते हैं, वे सच्चे मुसलमान नहीं हैं। ये सवाल ईसाइयत के बारे में भी किए जा सकते हैं। जिन अंग्रेजों ने दुनिया भर में अपने उपनिवेश बनाए और स्थानीय लोगों को या तो गुलाम बना लिया या नष्ट कर दिया, क्या उन्हें ईसाई कहा जा सकता है? कुछ ऐसी ही बात गांधीवाद के बारे में भी कही जा सकती है। कोई आदमी शाकाहारी भोजन करता है, रोज नियम से चरखा चलाता है, खादी पहनता है, गीता, कुरआन और बाइबिल पढ़ता है, ब्रह्मचर्य धारण किए हुए है, तो क्या सिर्फ इसलिए उसे गांधीवादी मान लिया जाए? विज्ञान के साथ इस तरह की समस्याएं नहीं हैं। ग्रहों के बारे में जानकारी यह नहीं बताती कि हमें दो बार खाना चाहिए या दस बार खाना चाहिए। रसायनशास्त्र यह नहीं बता सकता कि ब्रह्मचर्य अच्छा है या बुरा है। भौतिकविज्ञानी से इस बारे में सलाह मांगना बेकार है कि पड़ोसी के घर में चूल्हा नहीं जला है, तब भी क्या हम पेट भर कर भोजन कर सकते हैं। जब जानकारी का दायरा मनुष्य और मानव समाज की ओर मुड़ता है, तो ज्ञान नीति-निरपेक्ष नहीं हो सकता। आदमी से संबंधित किसी भी शास्त्र को यह बताना ही होगा कि क्या करना अच्छा है और क्या करना बुरा। बात आगे भी जाती है। जब कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि यह अच्छा है और वह अच्छा नहीं है, तो इसकी विश्वसनीयता तभी बनेगी जब उसके अपने आचरण से यह साबित हो। धर्म और राजनीति के क्षेत्र में तो यह सबसे बड़ी और उतनी ही सीधी कसौटी है। इस सिलसिले में महात्मा जी का यह कथन याद आता है -- मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।
अब हम आसानी से यह पहचान सकते हैं कि कौन समाजवादी है और कौन नहीं। समाजवादी वह है जिसकी समाजवाद में आस्था है और जो अपनी इस आस्था के मुताबिक जीने का प्रयास कर रहा है। महात्मा जी ने कभी यह नहीं कहा कि वे सत्य के मार्ग पर चलते रहे हैं। उनका दावा सिर्फ यह था कि वे बराबर इसकी कोशिश करते रहे। इसीलिए उन्होंनेे अपनी आत्मकथा को ‘सत्य के प्रयोग' कहा। समाजवादी भी अपने जीवन में समाजवाद के प्रयोग कर सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नेता जिसे समाजवाद बता रहा हो, समाजवाद वही हो। नरेंद्रदेव भी समाजवादी थे, लोहिया भी और किशन पटनायक भी। सभी के विचार एक जैसे नहीं थे। पर उन सभी में साम्य यह है कि उन्होंने जो जीवन जिया, वह उनके विचारों से बहुत भिन्न नहीं था। कुछ जगहों पर ये तथा अन्य महापुरुष भी च्युत हुए होंगे, लेकिन धरती पर रहनेवाला धूल-मिट्टी से कब तक बच सकता है? इसलिए किसी व्यक्ति के आचरण को जांचने की कसौटी यह नहीं है कि वह कहां-कहां या कितना गिरा, कसौटी यह है कि वह कितना उठा और उसके जीवन की दिशा, कुल मिला कर, गिरने की तरफ रही या उठने की तरफ। समाजवाद को कई तरह से परिभाषित किया जा सकता है। सबमें ये बातें समान होंगी कि समस्त व्यवस्था समाज के हित में होगी, हर आदमी की इज्जत की जाएगी, कोई किसी को नौकर नहीं रखेगा, तथा हर स्तर पर लोकतंत्र होगा। इससे कम पर किसी विचार को समाजवादी कहना ठीक नहीं है। इसलिए समाजवादी उसे कहेंगे जो इन बातों पर तथा इनसे निकलनेवाली या इनकी पूरक अन्य बातों पर विश्वास करता हो और इन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश कर रहा हो। यह कोशिश दिखावा नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसी कोशिश नहीं है, तो किसी समाजवादी संगठन का सदस्य होने या समाजवादियों के साथ घूमने-फिरने या किसी समाजवादी कार्यक्रम में उपस्थित होने या भाग लेने से कोई समाजवादी नहीं हो जाएगा। हो सकता है किसी के पास कारखाना हो, लेकिन अगर वह उस कारखाने के भीतर लोकतंत्र नहीं लाता और समाजवादी दल को लाखों रुपए सालाना चंदा देने के बावजूद अपना सारा ध्यान एक से दो और दो से तीन कारखाने खड़े करने की कोशिश में लगा रहता है, तो मैं उसे समाजवादी नहीं मानूंगा। कोई समाजवाद का प्रकांड विद्वान है, लेकिन उसका जीवन नीचता से लबालब भरा हुआ है, तो वह भी मेरी निगाह में समाजवादी नहीं है। वे नेता भी समाजवादी नहीं हैं जो समाजवाद की राजनीति नहीं करते या जिनके आचरण में समाजवाद का कोई तत्व नहीं है। समाजवाद के विपरीत आचरण करनेवालों को समाजवादियों का समर्थक, सहायक, प्रशंसक, फाइनांसर कुछ भी कहा जा सकता है, समाजवादी नहीं।

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप के आज के विचार से सहमति है। क्या यही विचार साम्यवादियों के लिए भी उत्तम है।

राजकिशोर said...

जी हां, सभी के लिए।

जोशिम said...

अच्छा लिखा है - खासकर - "..इसलिए किसी व्यक्ति के आचरण को जांचने की कसौटी यह नहीं है कि वह कहां-कहां या कितना गिरा, कसौटी यह है कि वह कितना उठा और उसके जीवन की दिशा, कुल मिला कर, गिरने की तरफ रही या उठने की तरफ.." - (डाक्साब और गांधी जी दोनों का वैचारिक साम्य) मेरा भी मानना है - कि १०० प्रतिशत का समाजवादी नाम का शख्स बना ही नहीं (वैसे ही जैसे १०० प्रतिशत का पूंजीवादी, साम्यवादी वगैरह) - यदि हम व्यक्ति रूप निर्बल को मान और संबल देते हैं समता को "यथासंभव" आचरण में रखते हैं तो अपने सामर्थ्य का समाजवाद बढाते हैं - यदि समता ध्येय है तो वाद इत्यादि यह सब नाम हैं, किसी आदर्श के काम को अंजाम तक लाने के, (और जब यही बड़े कटघरे बन जाते हैं तो नाम ज़्यादा ज़रूरी हो जाते हैं और ध्येय बंद बस्ते में होते हैं?) - आप विद्वान् हैं - अवगत हैं कि हिन्दोस्तानी समाजवाद खासकर लोहियावादी विचारधारा का परिवेश व्यवहारिक था स्वप्नदर्शी नहीं - उसके समता के उद्गम में "सम्भव समानता" का विचार भी था समता का जनाधार बढ़ाने के लिए ["राजनीति धर्म का अल्पकालीन रूप है ... ", - "चूंकि राजनैतिक प्रक्रिया ध्येय की और जाने वाली राह है और ध्येय तक पहुंचना वहां से है जहाँ पर वर्तमान है ,- वर्तमान में समाज और देश अपनी कमी के साथ है -"] - मजेदार बात यह है कि डाक्साब के साठ के दशक के (अपने तब के सहयोगियों से) विचारभेद (जिसके बारे में आपने भी कहीं लिखा है और मैंने बड़ा व्यक्तिगत सुना देखा है) शायद इसी नासमझी में थे -
लेकिन इस बात पर मैं व्यथित नहीं होता कि फलाना अपने आप को समाजवादी कहता है कि नहीं और करता है तो क्या? जहाँ तक मैंने देखा है अमीर देश/ समाज गरीब देशों/ समाजों से अधिक समाजवादी आचरण दिखाते हैं -
- कम से कम अगले पचास सालों तक हमारे गरीब देश में समता/ समानता के दिए को तेल भी चाहिए, संयत आग भी, ईमानदार बाती भी और मजबूत सकोरा भी जो इन सब को सम्हाल सके - फिलहाल राजनीति और उसका आचरण समाज में चुनाव दर चुनाव होगा - चौराहों पर प्रतिमाओं - सडकों अस्पतालों के नाम रखना ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होगा - ढाक के तीन पात होते रहेंगे - अगर सच में हम समाजवाद चाहते हैं तो यही तेल ले कर उन सभी दबे पिछड़ों को शिक्षित और स्वस्थ काहे नहीं बनाते, हवाई जहाज काहे चलाते हैं?
आपको पढ़ना अच्छा लगा - धीरे धीरे पढूंगा - साभार - मनीष जोशी