Thursday, September 13, 2007

संदर्भ : हिन्दी दिवस 2007

भाषा आंदोलन छेड़ने का समय

राजकिशोर

बहुत समय तक यह कहा जाता रहा कि भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। आज का सच यह है कि भारत की राष्ट्रभाषा अंग्रेजी है। संविधान की मोटी किताब में लिखा हुआ है कि हिन्दी केंद्रीय सरकार के कामकाज की और स्थानीय क्षेत्रीय भाषाएं राज्य सरकारों के कामकाज की भाषा होंगी। केंद्रीय सरकार का सारा कामकाज अभी भी अंग्रेजी में ही होता है और उसका हिन्दी अनुवाद दुमछल्ले के रूप में जोड़ दिया जाता है, क्योंकि हिंदीभाषियों की भावनाओं को संतुष्ट करने के लिए राजभाषा अनिनियम नाम का एक दोगला कानून बना दिया गया है। कुछ राज्य सरकारें अपनी-अपनी राजभाषा में काम करती हैं। लेकिन ये काम साधारण स्तर के होते हैं। बड़े और महत्वपूर्ण काम अकसर अंग्रेजी में ही होते हैं। केंद्रीय सरकार से पत्र व्यवहार तो अंग्रेजी में ही करना होता है। उद्योग-व्यापार में अंग्रेजी का इस्तेमाल लगभग अनिवार्य है। शिक्षा में अंग्रेजी का स्थायी दबदबा स्थापित हो चुका है। इस तरह देश भर में चारों ओर अंग्रेजी का क्रेज बढ़ रहा है। गरीब से गरीब आदमी भी यही चाहता है कि उसके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में ही पढ़ें। कहा जा सकता है कि विकास की लड़ाई में हिंदी और दूसरी भारतीय पराजित हो चुकी हैं और अंग्रेजी का वर्चस्व कायम हो चुका है।

मजेदार बात यह है कि इस भविष्य को सबसे पहले उस लेखक ने ही पहचाना था जिसे भारत में लगातार गालियां पड़ती रहीं। उसका नाम नीरद सी. चौधरी है। नीरद बाबू ने अंग्रेजी राज के दौरान ही लिखा था कि भारत में अंग्रेजी की स्थापना में सबसे बड़ी बाधा खुद अंग्रेज हैं। देशभक्त लोग अंग्रेजी से घृणा करते हैं, क्योंकि अंग्रेजी ब्रिटिश शासकों की भाषा है। भारत लौटने के कुछ समय बाद महात्मा गांधी ने अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग पहले कम और बाद में बंद कर दिया था। उस दौर में यह आम राय थी कि भारत की राष्ट्रभाषा बनने की योग्यता हिंदी में ही है। यह बात कहने को वे भी बाध्य थे जिन्हें हिन्दी पसंद नहीं थी या जो हिन्दी को एक तुच्छ भाषा मानते थे। वस्तुत: यह हिन्दी प्रेम नहीं था, अंग्रेजी का विरोध भी नहीं था। ये सभी लोग खासे अंग्रेजी पढ़े-लिखे और अंग्रेजी प्रेमी थे। उनका विरोध अंग्रेजी शासन से था। वे सोचते थे कि भारत आजाद होगा, तो जैसे अन्य देशों की अपनी एक राष्ट्रभाषा होती है, वैसे ही भारत की भी अपनी राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। यह भाषा अंग्रेजी तो हो नहीं सकती, भारत की ही कोई भाषा होगी। अपनी व्यापकता के कारण हिन्दी ही इस शर्त को पूरी करती थी। इस तरह हिन्दी को सर्वसम्मति से भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा मिला। नीरद चंद्र चौधरी ने लिखा है कि जब अंग्रेज भारत से चले जाएंगे, तब अंग्रेजी के भाग्य खुलेंगे और वह भारत की लोकभाषा बनने की ओर मुखातिब होगी। शायद नीरद बाबू अपनी खुर्दबीन आंखों से देख रहे थे कि भारत के लोग अंग्रेजी शासन से घृणा जरूर करते हैं, पर अंग्रेजों को और अंग्रेजी सभ्यता को आदर की दृष्टि से देखते हैं और उनके जैसा बनना भी चाहते हैं। इसीलिए उन्हें यकीन था कि जब अंग्रेज भारत से चले जाएंगे, तब भारतीय अंग्रेजों की तरह रहने का प्रयास करेंगे।

स्वतंत्रता संघर्ष के असर से कुछ समय तक अंग्रेजीकरण की प्रक्रिया थमी रही, लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय राज्य न तो गांधीवादी होगा और न ही समाजवादी -- वह मूलत: उपभोक्तावादी होगा, तब अंग्रेजी का महत्व समझा जाने लगा। जाति और दौलत के बाद अंग्रेजी सफलता की तीसरी सीढ़ी बन गई। यह प्रक्रिया आज तक जारी है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण की नीतियां अपनाने के बाद तो यह भी साफ हो गया कि हमारा उद्देश्य एक ऐसा देश बनना है जिसमें कुछ लाख या करोड़ लोग देश की बाकी आबादी को अपनी दुम से बांधे रहेंगे तथा विषमता को स्थायी बना दिया जाएगा। जाएगा। इस नए शासक वर्ग एकमात्र भाषा है -- अंग्रेजी। यही इस अखिल भारतीय शासक कहिए या शोषक वर्ग की संपर्क भाषा भी है। इस वर्ग के बच्चों की मातृभाषा अंग्रेजी है। ये कोई भी भारतीय भाषा ठीक से न बोल सकते हैं, न लिख सकते हैं।

इसीलिए यह निवेदन करना जरूरी लगता है कि यदि अंग्रेजी के विरुध्द लोक संघर्ष आज नहीं छेड़ा गया, तो जितना समय बीतता जाएगा, यह काम उतना ही मुश्किल होता जाएगा। मामला सिर्फ हिन्दी का नहीं है। वर्तमान संकट सभी भारतीय भाषाओं का है। अंग्रेजी की पूतना सभी भारतीय भाषों को खाती जा रही है -- एक-एक कर नहीं, एक साथ। हिन्दी और अन्य सभी भारतीय भाषाएं गरीब और अविकसित लोगों की भाषाएं बन कर रह गई हैं। जहां विकास है, वहां अंग्रेजी है। जहां गरीबी और शक्तिहीनता है, वहां हिन्दी है। उल्लेखनीय है कि कोई भी भाषा अकेले नहीं मरती, वह अपने बोलने या लिखने वालों को साथ ले कर मरती है। यानी हिन्दी की क्रमिक मृत्यु वास्तव में हिन्दी भाषियों के अवसान का प्रतीक है। जो सफलता के राजमहल में घुसने या घुसपैठ करने में सफल हो जाते हैं, वे अपनी मातृभाषा को छोड़ कर अंग्रेजी का दामन थाम लेते हैं। आज की पीढ़ियों में ऐसे बहुत-से लोग मिल जाएंगे जो अंग्रेजी और कोई भारतीय भाषा भी जानते हैं, क्योंकि यह संक्रमण का दौर है। एकाध दशक बाद होगा यह कि सफल और संपन्न वर्ग में अंग्रेजी ही चलेगी। वह स्थिति आने के पहले ही हमें भाषा आंदोलन छेड़ देना चाहिए और डंके की चोट पर कहना चाहिए कि अंग्रेजी, भारत छोड़ो। जिसे अंग्रेजी, फ्रेंच या स्पेनिश सीखना हो, वह शौक से सीखे। पर अंग्रेजी का सार्वजनिक प्रयोग हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम अंग्रेजी के पोस्टर फाड़ देंगे, अंग्रेजी के होर्डिंगों को गिरा देंगे, अपने अधिकारियों को अंग्रेजी का इस्तेमाल करने नहीं देंगे और किसी को पब्लिक में अंग्रेजी बोलने नहीं देंगे। मीडिया में अंग्रेजी के आतंक को खत्म करेंगे। अंग्रेजी दैनिकों का बहिष्कार करेंगे। अंग्रेजी फिल्में दिखाई जा सकती हैं। अंग्रेजी संगीत भी सुना जा सकता हैं। संस्कृति के क्षेत्र में सभी भाषाओं को समान महत्व दिया जाएगा। पर अंग्रेजी जहां-जहां भी प्रभुता की भाषा बनी हुई है, जहां-जहां वह वर्ग विभाजन पैदा कर रही है, उसे हम नेस्तनाबूद करके ही चैन की सांस लेंगे। यह सब हम गुंडई के द्वारा नहीं करेंगे, बल्कि बाकायदा सूचना दे कर और सविनय करेंगे। हम भारत मं अंग्रेजी के किले को तोड़ कर ही रहेंगे। इसलिए नहीं कि हम अंग्रेजी से नफरत करते हैं, बल्कि इसलिए कि हम देश के सभी गरीब और वंचित लोगों को प्यार करते हैं। इसलिए कि भाषा का सवाल इस व्यापक वर्ग के लिए अस्तित्व रक्षा का सवाल बन चुका है।

4 comments:

Vineet Kumar said...

राजकिशोर जी हिन्दी के प्रति इतना प्यार और अंग्रेजी को लेकर इतना ग़ुस्सा ..... कुछ ज्यादा नही हो गया .मौका जब हिन्दी दिवस का है तो हिन्दी को लेकर प्यार आना जायज है ....लेकिन तब उन मंसूबों का क्या होगा जिसको लेकर सरकार के साथ -साथ हिन्दी जगत भी ख़ूब उत्साहित है. ...की अंग्रेजी -हिन्दी का काकटेल
बनायेगे और globalisation के प्रोजेक्ट को पूरा करेंगे. ऐसा प्रोजेक्ट जिसमे विदर्भ का किसान और हिन्दी का चोट खाया विद्यार्थी भी सपने देख रहा है. जरा बताये तो की अंग्रेजी को इस तरह लतियाकर भला कोई ग्लोबल हो पायेगा

राजकिशोर said...

सर, अगर इसी तरह होना है, तो मैं ग्वोबल होना नहीं चाहता।

Vineet Kumar said...

इसी बात का तो रोना है सर की हम ग्लोबल हो या नही ये हमारे पसंद और न पसंद का मामला नही है ग्लोबल तो एक सिचुयेशन है और और उस हिसाब से हमे काम करना है ....भाषा प्रयोग को तो मानसिकता और अनिवार्यता का मसला मानता हू .इसलिये हिन्दी हो ठीक बात है ....लेकिन माफ़ करे एक अथॉरिटी या स्टिक यार्ड की तरह नही. फ़िर आप ही देखिये न की कही न कही भाषा की हठधर्मिता और पांडित्यपूर्ण रवैये ने लोगो को हिन्दी से दूर कर दिया

राजकिशोर said...

आपकी बात सही है। मूल सवाल हिन्दी का नहीं है। मुद्दा यह है कि सभी भारतीय भाषाओं की कीमत पर अंग्रेजी फैलती जा रही है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि भारत में जन-विरोधी नीतियां चल रही हैं। अंग्रेजी-भाषी वर्ग अभी भी यहां अल्पसंख्यक है और उसके हित बहुसंख्यकों के हितों के विरुद्ध है।
फिर गलोबलाइज चीजें और व्यापारी हो रही हैं, आदमी नहीं। क्या कोई भी दुनिया में कहीं भी जा और बस सकता है? विश्वग्राम टाटा और अंबानी के लिए है, हमारे-आपके लिए नहीं।