Saturday, September 15, 2007

भारत का अंग्रेजी लेखन


क्या अंग्रेजी भारत की भाषा है
राजकिशोर


हाल ही में एक यशस्वी और चमत्कारी लेखक के मुंह से यह सुन कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि अंग्रेजी भी एक भारतीय भाषा है। उसी कार्यक्रम में उपस्थित साहित्य अकादेमी के एक अधिकारी ने इस बयान पर आधिकारिक मुहर लगाते हुए कहा कि तभी तो अकादेमी अंग्रेजी के लेखकों को भी पुरस्कृत करती है। साहित्य अकादेंमी स्वायत्त संस्था है। इस नाते उसे अधिकार है कि वह किन भाषाओं के साहित्य को मान्यता देती है। लेकिन भारत की जनता स्वायत्त ही नहीं, स्वाधीन भी है और उसे इस पर विचार करने का पूरा अधिकार है कि अंग्रेजी को अगर भारतीय भाषा के रूप में मान्य किया जाता है, तो इसके मतलब क्या हैं और देश के भविष्य पर इसका क्या असर पड़ने वाला है। कहीं यह भारत की अपनी भाषाओं को गटकने के किसी षडयंत्र का हिस्सा तो नहीं है ?
जाहिर है, भारत में अंग्रेजी का प्रचलन ही नहीं हुआ होता अगर अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा करने में सफलता हासिल नहीं की होती। शासक की भाषा धीरे-धीरे जन भाषा बनने लगती है। इसीलिए लैटिन अमेरिका में स्पेनी भाषा को प्रभुता मिल सकी। लेकिन लैटिन अमेरिका और भारत में फर्क यह है कि वहां यूरोपीय मूल की बहुत बड़ी आबादी है जो स्पेनी बोलती है। भारत में अंग्रेज रहने के लिए नहीं आए थे। जब यहां उनके अंतिम दिन आ गए, तो वे मुट्ठी भर लोग अपने वतन वापस लौट गए। इस दरम्यान एक खिचड़ी जाति के रूप में एंग्लो-इंडियन समुदाय बन गया था, जो अंग्रेजी बोल सकता था। लेकिन यह एक बहुत ही छोटा-सा समुदाय था, जिसका देश की राजनीति या समाज पर कोई प्रभाव नहीं था। इससे कहीं बहुत बड़ा समुदाय वह था जिसने अपना धर्म नहीं बदला था, लेकिन जो अंग्रेजी संस्कृति के प्रवाह में विलीन हो चुका था। ज्ञातव्य है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री जितनी अच्छी तरह अंग्रेजी बोल या लिख सकते थे, उर्दू, कश्मीरी या हिन्दी का ज्ञान उसका सौवां हिस्सा भी नहीं था। यानी तब भी देश में ऐसे लोगों की संख्या कम न थी जिनकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति की भाषा अंग्रेजी ही थी। यही बात इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, राहुल गांधी आदि पर लागू होती है। इसके साथ-साथ भारत में ऐसे लेखक, कवि और विचारक भी पैदा हुए जो सिर्फ अंग्रेजी में ही अपने को व्यक्त कर सकते थे। इनमें से अनेक ने बहुत अच्छा लिखा है और विश्व बिरादरी में भारत का मान बढ़ाया है। लेकिन सवाल यह है कि वे किस भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं ? उनके पाठक कहां के हैं ? उनका साहित्य कौन छापता है ? उन्हें पुरस्कृत करने वाली संस्थाएं किन देशों की हैं ?
अरुंधति राय की पहली किताब एक विदेशी प्रकाशक ने छापी। इस किताब को एक अमेरिकी संस्था ने पुरस्कृत किया। पुरस्कार के कारण कम, पुरस्कार की राशि के कारण ज्यादा ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ की कीर्ति फैलने लगी, तो भारत में भी उसकी धूम मच गई और फिर भारतीय भाषाओं में उसके अनुवाद छपने लगे। फिर भी अरुंधति राय अंग्रेजी की ही लेखिका बनी रहीं। उसके बाद उन्होंने बहुत कुछ ऐसा लिखा जिसका संबंध भारतीय जनता के वास्तविक हितों से है, लेकिन यह सब भी अंग्रेजी में ही लिखा गया और अंग्रेजी भाषी लोगों को ही संबंधित था। आज भी नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता और इस बांध अभियान के शिकार अरुंधति राय को अपने हिमायती और मददगार के रूप में याद करते हैं, लेकिन अपने प्रिय उपन्यासकार के रूप में नहीं। यानी अरुंधति राय को भारत के साधारण लोग पसंद हैं, लेकिन उनकी भाषाएं नहीं, क्योंकि मलयालम या हिन्दी में लिख कर उन्हें क्या मिल सकता है ? भारत का बड़ा से बड़ा साहित्यिक पुरस्कार भी पांच लाख रुपए से ज्यादा का नहीं है, जबकि वे चाहें तो अपनी अगले उपन्यास के लिए कई करोड़ रुपए किसी विदेशी प्रकाशक से एडवांस के रूप में सहज ही प्राप्त कर सकती हैं।
अंग्रेजी अगर भारतीय भाषा है और भारतीयों द्वारा अंग्रेजी में लिखा हुआ साहित्य भी भारतीय साहित्य का हिस्सा है, तो इसी अर्थ में। जिस भाषा को भारत के संविधान में कोई मान्यता न हो, उसमें लिखने वाले लेखक और लेखिकाए रातों-रात प्रसिध्द और संपन्न होते जाएं, यह खुशी की बात है या शर्म की ? श्रीलाल शुक्ल, मनोहर श्याम जोशी, मैत्रेयी पुष्पा आदि को देर से भी नहीं, पर झुंपाओं और किरनों को भारत के लेखकों के रूप में तुरंत मान्यता मिल जाए, क्या यह भारत की जातीय प्रतिभा का अपमान नहीं है ? क्या यह उस असली भारत की अवमानना नहीं है जिसकी मेहनत के बल पर देश का पूरा प्रतिष्ठान खड़ा है भारत की जनता देशी भाषाओं में लिखने वालों को प्यार करेगी या एबीसीडी के उपासक भारतीय लेखकों को ?
हम यहां कोई तंग दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहते। हम यह भी मानते हैं कि किसी भी भाषा में लिखा गया हो, साहित्य तो साहित्य ही होता है। इसलिए हम सलमान रुश्दी, विक्रम सेठ, केकी दारूवाला, निजीम इकबाल आदि की रचनात्मक प्रतिभा का बेहद सम्मान करते हैं। लेकिन इस पर अफसोस करना कभी नहीं भूलते कि इन्होंने भारत की अपनी भाषाओं में अपना साहित्य क्यों नहीं लिखा ? क्या उन्हें पता नहीं है कि भारत का अंग्रेजी शिक्षित वर्ग भारत के सबसे बड़े दुश्मनों में एक है ? इसी वर्ग के कारण भारत आज भी एक धूसर और अविकसित देश बना हुआ है। यह भी कहा जा सकता है कि भारत के अंग्रेजी लेखन को तत्काल और इतनी मान्यता मिल जाने के परिणामस्वरूप भारत की अपनी भाषाओं से अंग्रेजी को ओर प्रतिभा पलायन भी हो रहा है। जो हिन्दी, बांग्ला, मलयालम या मराठी में लिख सकते हैं, वे भी अंग्रेजी में लिखते हैं। इसका एक पीड़ादायक परिणाम यह हुआ है कि सिर्फ भारतीय भाषाओं में लिखने वाली बेहतर प्रतिभाओं को भी हीन ग्रंथि सताने लगी है। वे अपने आपसे और अपने समाज से बार-बार पूछते हैं : हम क्यों लिखें ? किसके लिए लिखें ? हमारे पाठक कहां हैं ? लिख कर हमें मिलता क्या है ? शराब का साल भर का खर्च भी नहीं ! विष्णु खरे एक प्रसिध्द दैनिक में मिलवे वाले वेतन को ‘दो केले’ कहा करते थे। वही दो केले आज भी बहुत बड़े- बड़े देशी लेखकों की नियति हैं। इस दारुण स्थिति में हमें यह तय करना ही होगा के वे कौन लेखक हैं जो हैं तो भारतीय या भारतीय मूल के, पर अपने साहित्यिक कर्म के द्वारा भारत की 95 प्रतिशत जनता का उपहास करते हैं ?

2 comments:

विनीत कुमार said...

इस बात से मुझे भी लगातार परेशानी रही है कि स्थानीय और क्षेत्रीय समस्याओं और सवालों को अंग्रेजी में तो जमकर लिखा जा रहा है...बड़े-बड़े प्रकाशक भी मिल जा रहे हैं, लेकिन हिन्दी या फिर वहां की क्षेत्रीय भाषाओं की स्थिति बहुत खराब है। जो चीजें सीधे-सीधे आनी चाहिए वो अनूदित होकर हमारे सामने आती है,,इसलिए लेखक में कुंठा आती है कि लेखक होने से बेहतर स्थिति अनुवादक होने में है।

गौरव पाल said...

जो भारतीय अंग्रेजी में लेखन करते हैं, वे न तो भारत को समझते हैं और न लेखन की पवित्रता को। उन्हें सिर्फ पैसा, यश और प्राइज चाहिए। इनका बहिष्कार करना ही उचित है।