Saturday, September 8, 2007

भगत सिंह और हम

भगत सिंह को हम क्या दे सकते हैं

राजकिशोर

जिस देश में जितने बड़े महापुरुष पैदा होते हैं, उसकी जिम्मेदारी उतनी ही ज्यादा बढ़ जाती है। यह भारत का दुर्भाग्य है कि उसने अपने महापुरुषों से बहुत कम सीखा है। यही कारण है कि आज हम भारतीय लोग जितना अच्छा जीवन बिता सकते थे, उसकी तुलना में बहुत ही घटिया जिंदगी बिता रहे हैं। महापुरुष शून्य में से नहीं पैदा होता। वह अपने समाज के सर्वश्रेष्ठ का प्रतिनिधित्व करता है। वह अपने चिंतन और आचरण से दिखाता है कि समाज के अन्य लोग भी उस ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं। यह समाज के सदस्यों का नैतिक दायित्व है कि वे अपने बीच से उठते हुए आह्वान को सुनें। इस आह्वान को न सुनना, दरअसल, अपनी ही अनसुनी करना है। अपनी अंतरात्मा की आवाज को न सुनने वाला समाज उसी तरह पतन की ओर बढ़ता है जिस तरह अपनी अंतरात्मा को कुचलने वाला व्यक्ति।

अपने पुराने महापुरुषों की याद हमारे मन में भले ही कमजोर पड़ गई हो, पर महात्मा गांधी और भगत सिंह, हाल के दो व्यक्तित्व ऐसे हैं जो जन स्मृति में बराबर बने हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्ल मार्क्स को ही यह दरजा हासिल है। गांधी की याद को जिंदा रखने का कुछ श्रेय उस मध्य वर्ग को भी है जो उनके आदर्शों को अपनाने में असमर्थ रहते हुए भी उनका गुणगान करता रहता है। इस समय सार्थक विचारों के क्षेत्र में मार्क्सवाद अभी भी संभवतः सबसे बड़ा उद्यम है। विडंबना यह है कि यह उद्यम जितना फैलता जा रहा है, मार्क्स की कल्पना का समाज बनाना उतना ही कठिन बताया जाने लगा है। यह मार्क्स की विफलता है या उन्हें अपना शिक्षक मानने वालों की? यह सवाल गांधी के संदर्भ में और ज्यादा पूछे जाने लायक है, क्योंकि आजकल देश भर में गांधीवाद को मुक्ति का एकमात्र रास्ता बताने वालों की भीड़ भी शर्मनाक रूप से बढ़ रही है। ऐसे में नौजवानी में ही अपने देश और समाज के लिए शहीद हो जाने वाले भगत सिंह की स्थिति क्या हो सकती है? सरकारी क्षेत्रों में भगत सिंह के प्रति आपराधिक उदासीनता दिखाई देती है। विदेश में कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति भगत सिंह की तारीफ करने लगे, तो हमारे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बगलें झांकने लगेंगे। लेकिन जनता अपने नायक को पहचानने में कभी भूल नहीं करती। इसीलिए वह गांधी का आदर करती है, तो भगत सिंह को भी पूजती है। आजकल गांधी से अनेक वर्गों को शिकायत है। इस तरह की शिकायतें तब भी थीं जब गांधी जीवित थे। लेकिन मुझे आज तक कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसे भगत सिंह से शिकायत हो। अगर विधाता भारतवासियों से पूछे कि मैं गांधी और भगत सिंह, दोनों में से किसी एक को लौटा सकता हूं, बताओ तुम्हें इन दोनों में से कौन चाहिए, तो मेरा अनुमान है कि भगत सिंह को ज्यादा मत मिलेंगे। वे खरे सोना थे, उनमें जरा भी खाद नहीं था।

भगत सिंह ने अपने सुख, आराम, कैरियर, नेतृत्व की पंक्ति में स्थान इत्यादि के बारे में कभी नहीं सोचा। सिर्फ भारत की जनता के वास्तविक हितों के बारे में सोचा। सिर्फ तेईस वर्ष तक जीवित रहने वाले इस महापुरुष ने विचार और धारणा के क्षेत्र में जैसी अद्भुत प्रगति की थी, वह सभी नौजवानों के लिए स्पृहा करने योग्य है। भगत सिंह के चिंतन में हमें भारत की सभी समस्याओं का हल मिल जाता है। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे गांधी के विचार और आचरण में हमारी अधिकांश विफलताओं को सफलता में बदलने की शक्ति दिखाई देती है। आज जब देश के एक बड़े हिस्से में पस्ती और निराशा का वातावरण सघन हो रहा है, हमें एक बार फिर से अपने महापुरुषों के पास जाना चाहिए और उनकी राय मत जानने की कोशिश करनी चाहिए कि आज हमारा कर्तव्य क्या है। इस प्रक्रिया में विदेशी महापुरुषों के साथ विचार-विमर्श करने की मनाही नहीं है, लेकिन पहले हम अपने महापुरुषों को तो समझ-बूझ लें और उनसे जो भी सीख मिल सकती है, उसे ग्रहण, स्वीकार और अपना तो लें। यहां एक चेतावनी देना जरूरी है। जिस तरह कुनैन का जाप करने से मलेरिया नहीं हटता, उसे हटाने के लिए कुनैन को खाना पड़ता है, उसी तरह भगत सिंह का जाप करने से बेहतर है कि उनकी कोई एक मूल बात भी सच्चे अर्थों में मान ली जाए।

मजे की बात यह है कि आज हम जिस गतिरोध के शिकार हैं, वैसे गतिरोध की कल्पना भगत सिंह ने पहले ही कर ली थी और उसी के साथ यह भी बता दिया था कि इस गतिरोध को कैसे तोड़ा जा सकता है। भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने के कुछ समय पहले कहा था, जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे घबराते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, अन्यथा पतन और बरबादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इनसान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्पिरिट ताजा की जाए, ताकि इनसानियत की रूह में एक हरकत पैदा हो। (भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज, संपादक जगमोहन सिंह और चमन लाल, भूमिका)

भगत सिंह की सलाह है, क्रांति की स्पिरिट ताजा की जाए। वे यह नहीं कहते कि यह स्पिरिट पैदा की जाए। यानी वे मानते थे कि क्रांति की स्पिरिट किसी भी समाज में हमेशा मौजूद होती है, जरूरत सिर्फ उसे जगाने की है। गालिब की उपमा का सहारा लें, तो बाजे में संगीत शुरू से ही मौजूद होता है, लेकिन संगीत तभी पैदा होगा जब उसे बजाया जाएगा। फिर हमारा ही बाजा गूंगा कैसे हो सकता है? हम एक ऐसा समाज कैसे हो सकते हैं जिसमें किसी तरह की क्रांतिकारी स्पिरिट ही न हो? हमारे पास तो क्रांति का एक कानूनी दस्तावेज भी है। यहां मैं यह याद दिलाना चाहता हूं कि स्वतंत्र भारत का संविधान बनाते समय हमारे पूर्वजों ने गांधी की बातों को लगभग नहीं माना, लेकिन उन्होंने भगत सिंह का पूरा सम्मान किया। यह सम्मान जान-बूझ कर या समझ-बूझ कर किया गया था, यह बात मानने लायक नहीं लगती। यह सम्मान अनजानते में ही हुआ और इसलिए हुआ कि उस समय दुनिया भर में समाजवाद को ही सभी बंद तालों की एकमात्र कुंजी के रूप में देखा जा रहा था। इसमें कोई संदेह नहीं कि संविधान बनाते समय भारत के एक बड़े बौध्दिक और राजनीतिक वर्ग ने चरम प्रकार का आत्म-मंथन किया था। वे कोशिश कर रहे थे कि दुनिया की विभिन्न व्यवस्थाओं में जो कुछ श्रेष्ठ है, उसे अपने सर्वाधिक मूल्यवान राष्ट्रीय दस्तावेज में समेट लिया जाए। अपने को विश्वगुरु मानने वाला देश अचानक विश्वशिष्य बन गया था। संविधान सभा में जैसी गहरी और ईमानदार बहसें हुईं, उनकी परछाई भी अब देखने को नहीं मिलती। न कांग्रेस के लोगों में, न समाजवादियों में, न कम्युनिस्टों में। नक्सलवादियों को अभी भी ईमानदार बहस करना आता है, पर उससे कोई ऐसा राजनीतिक कार्यक्रम निकलता दिखाई नहीं देता, जो देश भर की जनता को आंदोलित या आलोड़ित कर सके। नक्सलवादियों की सत्ता कुछ गांवों या जिलों तक सीमित हो कर रह जाएगी, ऐसा लगता है। ऐसी स्थिति में एक दमदार रास्ता यह दिखाई देता है कि हम एक हाथ में भगत सिंह का क्रांतिकारी लेखन और दूसरे हाथ में भारतीय संविधान ले कर निःशंक भाव से आगे बढ़ें। हमारा संविधान हमें जितनी दूर तक जाने की इजाजत देता है, उतना फासला पूरा करने के बाद हम पाएंगे कि समाजवाद तक पहुंचने के लिए सिर्फ कुछ और कदम चलने की जरूरत है।

इसके पहले कि आपमें से कुछ इस प्रस्ताव पर हंसें, निवेदन है कि बात को थोड़ा स्पष्ट करने का अवसर दिया जाए। यह सच है कि इसी संविधान का सहारा ले कर आज हमें एक बाजार-केंद्रित समाज बनने की ओर धकेला जा रहा है और अधिसंख्य लोगों को बाजार से बाहर फेंक देने की खुली राष्ट्रीय साजिश चल रही है। लेकिन सच यह भी है कि इसी संविधान का सहारा ले कर हम एक समता-उन्मुख और मानवीय समाज बनाने का अभियान शुरू कर सकते हैं। भगत सिंह कैसा समाज चाहते थे? कुछ उध्दरण विचारणीय हैं (1) क्रांति से हमारा अभिप्राय यह है कि वर्तमान व्यवस्था, जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी हुई है, बदलनी चाहिए। (2) क्रांति पूंजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली प्रणाली का अंत कर देगी. वह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा। (3) क्रांति के लिए खूनी संघर्ष अनिवार्य नहीं है और न ही उसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा का कोई स्थान है। यह बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। (4) मैंने एक आतंकवादी की तरह काम किया है, लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूं। मैं तो ऐसा क्रांतिकारी हूं जिसके पास लंबा कार्यक्रम और उसके बारे में सुनिश्चित विचार होते हैं। मैं पूरी ताकत के साथ बताना चाहता हूं कि मैं आतंकवादी नहीं हूं और कभी था भी नहीं, कदाचित उन कुछ दिनों को छोड़ कर जब मैं अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत कर रहा था। मुझे विश्वास है कि हम ऐसे तरीकों से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। (सभी उध्दरण उपर्युक्त पुस्तक से)

आइए, अब हम भारतीय संविधान के कुछ ऐसे निदेशों पर विचार करें, जो भगत सिंह के सपनों का समाज बनाने की दिशा में हमारी मदद कर सकते हैं (1) राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृध्दि का प्रयास करेगा। (2) राज्य, विशिष्टतया, आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा... (3) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो। (4) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिसमें धन और उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो। ये सभी वाक्य भारतीय संविधान के भाग 4 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) से लिए गए हैं। यह सच है कि इन निदेशों को पूरा करवाने के लिए अदालत में नहीं जाया जा सकता। लेकिन ऐसा राजनीति और सामाजिक संगठन तो खड़ा किया ही जा सकता है जो जीवन के हर पहलू में इन उद्देश्यों को पाने के लिए संघर्ष करे और सत्ता में आए तो इन्हें कानूनी रूप से लागू करे। रोक न्यायालय में जा कर गुहार लगाने पर है। सरकार और जनता पर इन उद्देश्यों के अनुकूल काम करने पर कोई रोक नहीं है। बल्कि संविधान का भाग 5 (मूल कर्तव्य) तो हमें आदेश देता है कि हम उपर्युक्त लक्ष्यों के लिए काम करें। अनुच्छेद 51क निर्दिष्ट करता है, भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह (क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करे।... स्पष्ट है कि हमें संवैधानिक स्तर पर ऐसे पूरे अधिकार दिए गए हैं जिनका प्रयोग करते हुए हम विषमता के सभी प्रकारों को खत्म करने का कानूनी, लोकतांत्रिक और संगठित प्रयास, जिसमें संघर्ष और सविनय निवेदन शामिल हैं, कर सकते हैं। ऐसा आंदोलन देश भर में फैल जाए, तो उसे दबाना आसान नहीं होगा। यह भी संभव है कि इसमें हमें न्यायालयों का भी सहयोग मिले, क्योंकि न्यायालयों का काम संविधान को लागू कराना है।

निश्चय ही रास्ता आसान नहीं है। लेकिन क्रांति भी बंगाल का रसगुल्ला नहीं है। भगत सिंह साफ-साफ कहते हैं, विस्तार में गए बगैर हम यह दावे से कह सकते हैं कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए रूसी नवयुवकों की भांति हमारे हजारों मेधावी नौजवानों को अपना बहुमूल्य जीवन गांवों में बिताना पड़ेगा और लोगों को समझाना पड़ेगा कि भारतीय क्रांति वास्तव में क्या होगी। ... कई दशकों का अद्वितीय आत्मबलिदान ही जनता को उस महान कार्य के लिए तत्पर कर सकेगा और इस कार्य को केवल क्रांतिकारी युवक ही पूरा कर सकेंगे।

आत्मबलिदान का अलिखित नियम यह है कि जो इसके लिए आह्वान करता है, वह सबसे पहले अपने को ही इस अग्निपरीक्षा में उतारता है। भगत सिंह इस कसौटी पर सोलह आना खरे उतरे। हम उन्हें शहीदेआजम कहते हैं। क्या भारत के एक अरब से ज्यादा लोग अपने इस लाड़ले शहीद को यह एक छोटा-सा मरणोत्तर उपहार नहीं दे सकते -- सभी प्रकार के शोषण से मुक्त एक समाजवादी भारत।

2 comments:

Anonymous said...

अपनी खामोशी.

-भगत सिंह.

सुरभि श्रीवास्तव said...

अपना खून और पसीना