Tuesday, November 10, 2009

क्रांति अब भी संभावना है

रूसी क्रांति को क्यों याद करें
राजकिशोर


रूस की साम्यवादी क्रांति मानवता की एक महान विरासत है। इस विरासत की उपेक्षा इसलिए नहीं की जानी चाहिए कि यह क्रांति टेढ़े-मेढ़े रास्तों से चलती हुई विफल हुई और रूस को पूंजीवादी नीतियों के साथ समझौता करना पड़ा। अगर विफलताएं ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती हैं, तो रूसी क्रांति से भी सीखने के लिए बहुत कुछ होना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि वाश टब से नहाने के पानी के साथ-साथ बच्चे को भी फेंक दिया गया है। यह वास्तव में अपने साथ भी अन्याय है, क्योंकि वर्तमान समस्याओं से निजात पाने के लिए हम इतिहास के जिन प्रयोगों की तरफ आशावादी निगाहों से देख सकते हैं, उनमें रूसी क्रांति का अहम स्थान है।

दुनिया में जब से विषमता का सूत्रपात हुआ, तभी से समानता की भूख मनुष्य के मन में कुलबुलाती रही है। इसकी एक अभिव्यक्ति धर्म के रूप में हुई जो मानता है कि हम सब एक ही ईश्वर की संतानें हैं और इसलिए हम सभी का दर्जा बराबर है। लेकिन इस शिक्षा का पालन धार्मिक प्रतिष्ठान भी नहीं कर सके जिन पर धर्म का प्रसार करने की जिम्मेदारी रही है। ईश्वर के दरबार में राजा-रंक सभी की हैसियत बराबर होगी, पर धरती पर ईश्वर का राज्य तरह-तरह की विषमताओं से भरपूर है। यहां तक कि विचार करने की आजादी भी, जो मनुष्य को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है, सभी को नहीं है। जो धार्मिक क्षेत्र स्वयं प्रदूषित रहा है, वह समाज और राजनीति में गैरबराबरी का समर्थन और पोषण क्यों न करता?

इसलिए धर्म के बाहर समानता की खोज अनिवार्य हो उठी। समाजवाद का विचार इसी लंबी खोज का परिपाक है। भारत में समता का विचार आध्यात्मिक स्तर पर ज्यादा फैला। यूरोप ने इसे भौतिक स्तर पर लागू करने के ठोस तरीके खोजे। इसका एक नतीजा लोकतंत्र के रूप में आया, जिसमें, कम से कम सिद्धांत के स्तर पर, हर आदमी की राजनीतिक हैसियत बराबर होती है। लेकिन हम जानते हैं कि ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के आधार पर बने लोकतांत्रिक ढांचे में कितनी तरह की विषमताएं होती हैं। इनमें से अधिकांश का संबंध पूंजीवाद से है, जिसका प्रेरणा-स्रोत ही विषमता के अधिक से अधिक स्तर पैदा करना है। वस्तुओं के उत्पादन और वितरण का एक निश्चित तरीका किस तरह समाज के सभी संबंधों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है, पूंजीवाद इसका सबसे प्रबल उदाहरण है। इसलिए समाजवाद की पहली शर्त यह बनी कि उत्पादन के संबंधों में परिवर्तन हो। पूंजी की मुक्ति में सभी चीजों की मुक्ति निहित है।

पूंजी की मुक्ति का पहला बड़ा प्रयोग रूस की जमीन पर हुआ। इससे दुनिया भर में यह संदेश फैला कि जो एक देश में संभव है, वह दूसरे देशों में भी संभव है। आशा की यह लहर कितनी जबरदस्त थी और कितनी व्यापक, आज हम इसकी सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं। लेकिन रूसी क्रांति के अलमबरदारों ने जिस तरह की नीतियों का अनुसरण किया, उससे साम्यवाद की चादर पर खून के बड़े-बड़े धब्बे दिखाई देने लगे। स्टालिन और उसके अनुयायी भूल गए कि उनका काम पूंजीवादी लोकतंत्र को शुद्ध करना तथा जनवादी बनाना है, न कि लोकतंत्र को ही खत्म कर देना। असहमति के दमन पर टिकी कोई भी व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। रूस का समाजवादी प्रयोग पचास-साठ साल में ही अपने अंतर्विरोधों से भरभरा कर गिर गया, यह मानव इतिहास के करुण अध्यायों में एक है। आज का रूस अपने इस लाल-काले अध्याय के एक-एक अवशेष को मिटाने के लिए उतावला है, तो कल्पना की जा सकती है कि किस तरह की स्मृतियां रूस के लोगों को पीड़ित कर रही होंगी।

इसके बावजूद साम्यवादी रूस में बहुत कुछ ऐसा हुआ जो दुनिया में कहीं और नहीं हो सका है। वहां जमींदार नहीं थे, न पूंजीपति थे। न भिखारी थे, न वेश्याएं। विषमता थी, पर उसके बहुत ज्यादा स्तर नहीं थे। बच्चों के विकास पर पूरा ध्यान दिया जाता था। बूढ़ों को समय पर पेंशन मिलती थी। काम-काज में सामूहिकता को प्रोत्साहित किया जाता था। मेहनत करनेवाले पुरस्कृत किए जाते थे। बेशक इनके साथ-साथ यह भी हुआ कि मानव अधिकारों की कोई प्रतिष्ठा नहीं थी, स्वतंत्र रूप से सोचनेवाले प्रताड़ित किए जाते थे, अखबार झूठ के पुलिंदे बन गए, ईमानदार लेखकों और कवियों के लिए जेल के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे और हर तरफ षड्यंत्र का वातावरण बन गया। उपर्युक्त उपलब्धियों और इन दुरवस्थाओं के बीच तालमेल बैठा पाना मुश्किल है।

आज रूसी क्रांति को गर्व के बजाय डर की निगाह से देखा जाता है, तो इसका कारण मार्क्सवाद के साथ विश्वासघात ही है। दुख की बात यह है कि इसकी तरफ मार्क्सवादियों का ही ध्यान सबसे अधिक जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं हुआ। मार्क्सवादियों का एक बड़ा वर्ग, भारत में भी, रूसी क्रांति के विपथगामी होने का जिक्र करता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उसका यह हाल क्यों हुआ और आज के मार्क्सवादियों ने रूसी क्रांति की दुर्गति से क्या-क्या सीखा है। इसीलिए लाल झंडे के प्रति आम जनता में प्रेम तो देखा जाता है, पर कोई देश नहीं चाहता कि वह लाल रूस की तरह बने। समकालीन नेपाल में इस तरह की एक तरंग आई थी, क्योंकि वहां के मार्क्सवादियों ने सामंतशाही के खिलाफ कठोर संघर्ष किया था। लेकिन अब वहां भी मोहभंग का वातावरण है।

आज हमारे यहां मार्क्सवाद पंगु है। वह सामंती तौर-तरीकों से अपने को जीवित रखने की कोशिश कर रहा है। मार्क्सवाद की जगह माओवाद है। माओवाद ने कुछ खास तरह के इलाकों में सफलता प्राप्त की है, पर अपनी पोशीदा और डर पर आधारित कार्य प्रणाली के कारण वह वन आंदोलन बन कर रह गया है, जन आंदोलन नहीं बन पाया है। जन आंदोलन वह होता है जिसका राज्य की बुनियादी नीतियों पर दबाव पड़े और जिससे सत्ता के नए दावेदार पैदा हो सकें। आश्चर्य की बात यह है कि आज देश में सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी मार्क्सवादी ही हैं, किन्तु वे जन संघर्ष का कोई ऐसा मॉडल खोजने में असमर्थ हैं जिसके प्रति जनता में बड़े पैमाने पर आकर्षण पैदा हो सके। संकट की इस घड़ी में रूसी क्रांति के सही सबक बहुत काम के हो सकते हैं, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है।

8 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप की बात सही है। समाजवाद बिना जनतंत्र के सफल नहीं हो सकता।

RAJ SINH said...

bahut hee bebak vivechan !durbhagy ki roosee kranti vyaktigat 'adhikarvad ' me badalatee gayee aur aam aadmee ka sarokar 'jantantr ' nadarat ho gaya .

aap aur aap ke vichar tatha parichay me nihit uddesh prashanshneey hain .

shayad hamkhayalee hai.

Pramod Tambat said...

प्रजातंत्र, लोकतंत्र, जनवाद ये सारे शब्द पूँजीवाद की उपज हैं. जब वैश्विक स्तर पर पूँजीवाद एक प्रतिगामी शक्ति बनता जा रहा था तब अनन्य योद्वा स्टालिन के नेतृत्व में सोवियत क्रांति को पूँजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति की दिशा दी गई और सत्तर साल तक लोग समाजवादी व्यवस्था के गुण गाते रहे। इसमें क्या गलत हुआ ? देश का अधिकतर वामपंथी रूझानों वाला बुद्विजीवी वर्ग इस मामले में समझौतावादी तौर‍ तरीके से ही सोचने का आदी है जिस समझौतावाद ने सोवियत रूस की ऐसी की तैसी कर दी। यह गलत है कि कोई रूसी क्रांति के विपथगामी होने का कारण नहीं बताता यह नहीं बताता कि उसका यह हाल क्यों हुआ। दरअसल देश का बुद्विजीवी वर्ग आँख खोल कर देखना नहीं चाहता। नकली वामपंथियों से अगर यह पूछा जाएगा कि उन्होंने रूसी क्रांति की दुर्गति से क्या-क्या सीखा है तो उनके पास बताने के लिए कुछ नहीं है ना उन्हें क्रांति से कुछ लेना देना है। इसे जानने के लिए असल माक्र्सवादी शक्तियों की पहचान करना आज के बुद्विजीवी वर्ग की प्राथमिकता में हो तब तो ना पता चलेगी असलियत क्या है।

प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in

एस.के.राय said...

रूसी क्रांति को भूलना सम्भव नहीं है ,परन्तु एक बात साफ है कि कोई भी परिवर्तण में कुछ न कुछ कमी रह जाती हैं ,रूस में में कुछ कमी के कारण अत्याचार बढा ,कहते हैं स्टालिन ने लगभग 30 लाख लोगों को कत्ले आम कर दिया था और आगे चल कर लोगों ने कब्र से उठाकर दण्डित किया ।

मनुश्य को स्वतंत्रता चाहिए ,स्वतंत्रता के लिए नई रास्ते निकालना भी आवश्यक था ,कोई भी ासन विपक्ष के बीना चलना बहुत ही कठीन हैं ,मात्र आर्थिक चिन्तन से या भौतिक चिन्तन द्वारा पेट तो भरा जा सकता हैं पर स्वतंत्र मानसीक चिन्तन के बीना प्रगति कदापी सम्भव नहीं हैं । चाहे माक्र्स हो या माओ दोनों का दशZन ही मानव जाति के लिए अधूरा साबित होने के कारण असफल रहा ।

आज तो साम्यवाद मात्र नाम के लिए जीवित हैं चीन में भी कोई माओ वाद नहीं वहॉ भी पूंजीवाद हाबी हो चुका हैं ,एक समय डा. मानवेन्द्रनाथ राय ने रूस में साम्यवाद पर चर्चा करते हुए अनेक गलतीयों पर स्टालिन को सचेत किया था और स्टालिन ने उसे स्वीकार भी किया । आगे चल कर श्री राय ने रेडिकल हिम्योनिज्म की स्थापना की ।

क्रंाति तो भारत में सम्भव है ,पर वह किसी वाद आदी के बन्धन से मुक्त ,भारतीय समाजवाद जैसे मूल सिद्धान्त पर आधारित होना आवश्यक हैं ,जहॉं मानवता और आध्याित्मकता दोनों साथ साथ फलिभुत हो सके, ऐसा व्यवस्था करना होगा ।

भाट जैसे कलमकारों का पहचान करना भी आवश्यक हैं ,ऐसे भाट जो मात्र लाभ के लिए किसी का भी गुणगान करके पेट पालते हैं उसे रोकने के लिए कोई न कोई रास्ता खोजना समाज का ही कर्तव्य हैं ।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

रूसी-चीनी-क्यूबाई क्रांतियां परिवर्तन का स्वप्न देखने वाले हर व्यक्ति के लिय्र प्रेरक थीं, हैं और रहेंगी।

इन सब क्रांतियों के प्रणेताओं ने अपने समय और समाज के मुताबिक एक बेहतर विकल्प के निर्माण के रास्ते चुने और सफल हुए। हमारे यहां शायद कार्बन कापी बनाने की भूलें ज्यादा हुईं। आज भी इंक़लाब की उम्मीद उसी तबके से है जो जंगलों की रुमानियत और संसद के अंध समर्थन से अलग कोई रास्ता निकाल सके। जितना जनवाद इस संसदीय व्यवस्था ने दिया है उससे अधिक जनवादी विकल्प के लिये ही जनता तैयार होगी। इस नयी तैयारी के सामने शांति,समाजवाद और समृद्धि का लक्ष्य होना चाहिये।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

छापने के लिये नहीं---

मै अशोक हूं। असहमति और सहमतियों के बीच आपको नियमित पढ़ता रहा हूं। मेरा मेल है--ashokk34@gmail.com

आप संपर्क करेंगे तो अच्छा लगेगा।

सादर

vandana bharti (chunchun) said...

hello sir. its me vandana bharti. i usually dont like to read history. ya i know its my drawback. but when i read u, i became ur fan. whatever u right is simply great and beautiful.

संदीप said...

...मार्क्सवादियों का एक बड़ा वर्ग, भारत में भी, रूसी क्रांति के विपथगामी होने का जिक्र करता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उसका यह हाल क्यों हुआ और आज के मार्क्सवादियों ने रूसी क्रांति की दुर्गति से क्या-क्या सीखा है।...


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रूस ही नहीं, चीन में भी पूंजीवाद की पुनर्स्‍थापना क्‍यों हुई, इसका विश्‍लेषण बहुत लोगों ने किया है, कई पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं, और इन्‍हीं विश्‍लेषणों के आधार पर पर दुनिया भर में लोग काम भी कर रहे हैं,
आप कहिए तो कुछ किताबों के नाम मैं ही बता दूंगा...

वैसे आपके इस लेख को पढ़ने के बाद मार्क्‍सवाद के बारे में आपकी समझ पर कोई संदेह नहीं रह गया...
और आपकी इसी समझदारी के बारे में मैंने एक ब्‍लॉग पर भी कुछ पढ़ा था...लिंक यहां दे रहा हूं, समय मिले तो ज़रूर पढ़ि‍येगा :
ज्‍योति बसु, राजकिशोर और द्वंद्ववाद...