Sunday, August 17, 2008

चरित्र ऐसे बनता है

ये किस देश के लोग हैं
राजकिशोर


दिल्ली को नोएडा से जोड़ने वाले टॉल रोड के दो अनुभव बांटना चाहता हूं। पहला अनुभव करीब एक महीना पहले का है। हम (मैं और मेरी बेटी) दिल्ली से घर लौट रहे थे। हमारी कार का पेट्रोल अचानक चुक गया और कार बीच सड़क पर खड़ी हो गई। यह हादसा पहली बार हुआ था। इसलिए मैं नरवस हो गया। ड्राइवर मुझसे ज्यादा नरवस था। हो सकता है, भीतर ही भीतर मुझे गालियां दे रहा हो। बेटी समाधान निकालने के लिए परेशान थी। उसने थोड़ा आगे बढ़ कर एक बोर्ड से हेल्पलाइन का नंबर नोट किया । उन्हें फोन कर हमारी समस्या बताई। कुछ ही देर बाद टॉल रोड वालों की एक गाड़ी आई। उस पर बैठे कर्मचारियों में से किसी ने भी न हमें डांटा न फटकारा। उनमें से एक विनम्रता के साथ हमारे पास आया और हमारे ड्राइवर को अपने साथ ले गया। वे निकट के पेट्रोल पंप गए और वहां से एक डिब्बे में दो लीटर पेट्रोल ले आए। पेट्रोल गाड़ी में पड़ा, तो उसमें जान आ गई। अब हम मयूर विहार जा सकते थे।

गाड़ी स्टार्ट करने से पहले हमने टॉल रोड के कर्मचारियों का हार्दिक धन्यवाद किया और पूछा कि चार्ज के रूप में कितना पैसा देना है। मालूम हुआ, यह नि:शुल्क सेवा है। तबीयत खुश हो गई। मैंने सोचा, यही सड़क अगर भारत सरकार या दिल्ली नगर निगम या नोएडा प्राधिकार के प्रबंध में होती, तब भी हमारे साथ क्या ऐसा ही मृदु और सहयोगपूर्ण व्यवहार होता?

दूसरा अनुभव चार दिन पहले का है। इस सड़क का उपयोग करने की फीस भरने के दो तरीके हैं। एक तरीका नकद भुगतान का है। दूसरा तरीका यह है कि आप एक कार्ड में पहले से पैसे भरवा लें। मुझे लगा कि कार्ड वाला सिस्टम ठीक है। मेरे पास पहले का एक कार्ड था। सोचा, उसमें ही पैसे डलवा दूं। दिल्ली से हमारी तरफ आने का पुराना रास्ता है नोएडा हो कर। हाल ही में एक और रास्ता खुला है जो मयूर विहार फेज एक की ओर निकालता है। मैं इसी रास्ते का प्रयोग करता हूं।

फीस चुकाने वाली लाइन में दाखिल होने के पहले मैंने जानना चाहा कि कार्ड में पैसा कहां भरवाते हैं। गेट के पास तीन साधारण दर्जे के कर्मचारी खड़े थे। मेरा प्रश्न सुनते ही उनमें सहानुभूति की लहर दौड़ गई। एक ने बताया कि यह तो नोएडा वाले रास्ते में ही हो सकता है। मयूर विहार वाला रास्ता नया खुला है। इसलिए यहां यह इंतजाम अभी शुरू नहीं हुआ है। लेकिन जल्द ही शुरू होने वाला है। 'तब तक क्या किया जाए?' इस सवाल से जूझते हुए हम फीस की परची काटने वाले काउंटर के सामने पहुंच गए थे। एक दूसरा कर्मचारी भी वहां तक आ गया था। उसने बताया कि आप चाहें तो इस काउंटर पर चेक जमा कर सकते हैं। अगले दिन आपके कार्ड में पैसा जमा हो जाएगा और अपने कार्ड का इस्तेमाल शुरू कर सकेंगे। काउंटर क्लर्क ने हामी भरी। हमारी समस्या का हल निकल आया था। उस बार की फीस भर कर हम आगे बढ़े और अपने रास्ते आ लगे। एक बार फिर मैंने टॉल रोड के विदेशी मालिकों और उनके अधिकारियों को मन ही मन बधाई दी कि उन्होंने अपने कर्मचारियों में ग्राहकों के साथ अच्छा व्यवहार करने के संस्कार भरे हैं।

जाहिर है, इनमें से कोई भी व्यवहार अनोखा नहीं था। दिल्ली में ही ऐसे सैकड़ों संस्थान होंगे जहां ग्राहकों या आगंतुकों के साथ शिष्ट व्यवहार होता है। उनसे तमीज से बात की जाती है, उनकी समस्याओं को सहानुभूति से सुलझाया जाता है और उन्हें यह एहसास नहीं होने दिया जाता कि वे वहां किसी का समय बरबाद करने आए हैं। इनकी तुलना में ऐसे संस्थान सैकड़ों गुना ज्यादा होंगे, जहां आगंतुकों के साथ असभ्य और अशिष्ट, बल्कि बदतमीज ढंग से व्यवहार किया जाता है। ऐसा भी नहीं है कि शिष्ट संस्थानों में सिर्फ विदेशी काम करते हों या उनका मालिकाना विदेशियों के ही हाथ में हो। दोनों तरह के संस्थानों में हमारे देशी भाई-बहन ही काम करते हैं। फिर उनके आचरण में यह आसमान-पाताल का फर्क क्यों ? इस फर्क के लिए कौन जिम्मेदार है?

इस सिलसिले में हम याद कर सकते हैं कि भारतीय प्रोफेशनल अपने देश में उतने अच्छे ढंग से काम नहीं कर पाते हैं जितने अच्छे ढंग से वे विदेशों में काम कर दिखाते हैं। वहां वे बेहद अनुशासित होते हैं, जम कर काम करते हैं और उनकी प्रतिभा उत्कृष्टतम रूप में सामने आती है। जाहिर है, यह फर्क कार्य संस्कृति का फर्क है। विदेशों में, बहुराष्ट्रीय कंपनियों में, संयुक्त राष्ट्र की शाखा संस्थाओं की कार्य संस्कृति बेहतर है। वहां अच्छा काम करने वालों को प्रोत्साहन मिलता है, सम्मान मिलता है और उचित पारिश्रमिक भी दिया जाता है। कामचोर, दुष्ट और भ्रष्ट के लिए गुंजाइश कम से कम है। इसके विपरीत अधिकतर भारतीय संस्थानों में अधिकारियों को सामंती वातावरण में काम करना पड़ता है, गुणों के स्थान पर चापलूसी और चमचागीरी को तरजीह जी जाती है और कोई नहीं जानता कि कब उसका अपमान हो जाएगा। हमारे सरकारी कर्मचारी सबसे ज्यादा ढीठ हैं। वे मजबूर कर दिए जाने पर ही काम करते हैं और वह भी इस तरह मानों एहसान कर रहे हों। ग्राहकों के प्रति आदर भाव उच्च पूंजी के संस्थानों में ही दिखाया ताता है, आसी बात भी नहीं है। अनेक साधारण ढाबा वाले, खोमचे वाले, छोटे दुकानदार, ऑटोरिक्शा चालक भी उतने ही, बल्कि उससे ज्यादा सभ्य और शिष्ट हो सकते हैं। यहां मामला संस्कारों का है। कई बार व्यावसायिक दबाव भी होता है। क्षेत्र विशेष के लोगों का व्यवहार अलग-अलग होता है, अत: व्यवहार के निर्धारण में सामाजिक संस्कृति की भी निश्चित भूमिका है।

बहरहाल, वे भी भारतीय हैं जो बदतमीजी में छोटे-मोटे गुंडों को पीछे छोड़ सकते हैं और वे भी भारतीय ही हैं जो एक भिन्न वातावरण में शिष्टतम व्यवहार करते हैं। इससे एक संभावना बनती है कि यदि उचित प्रशिक्षण दिया जाए, राजनीतिक-सामाजिक दबाव हो और संस्कृति का स्तर ऊंचा उठाने का सचेत अभियान चलाया जाए, तो हम अपने देश में ही एक बेहतर कार्य संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं। इसमें बहुत बड़ी जिम्मेदारी मालिकों और मैनेजरों की है। ये अपने को सुधार लें तो अधिकारियों और कर्मचारियों में खुद ब खुद परिवर्तन आता जाएगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से बैंकिंग, बीमा आदि व्यवसायों में वातावरण काफी बदला है। लेकिन अभी तक ये परिवर्तन प्रतियोगिता, शिक्षा में फैलाव. वेतन में सुधार आदि के कारण स्वाभाविक रूप से आए हैं। जरूरत इस बात की है कि इसके लिए व्यवस्थित रूप से मुहिम चलाई जाए। अगर एअरलाइंस के कर्मचारी यात्रियों के साथ शिष्ट और नम्र व्यवहार कर सकते हैं, तो रेल और बस में सफर करने वालों ने क्या अपराध किया है?

5 comments:

Nitish Raj said...

बिल्कुल सही लिखा है। जैसे सहयोग टोल रोड पर मिलता है वैसा तो कहीं भी नहीं देखने में आता। लेकिन शायद इस देश के सइस्टम की ही कमी है कि कुछ प्रोफेशनलस देश में नहीं बाहर अच्छा कर दिखाते हैं। जब तक चापलूसी, भाई भतीजावाद खत्म नही होगा, लानत हम यूं ही झेलते रहेंगे।

Anil Pusadkar said...

Taqdeer walen hai saab aap warna toll par to gundon ka hi raj rehta hai.baharhal badhai aapko achhe logon ki achhai saamne laane ke liye

Anwar Qureshi said...

अच्छा लिखा है आप ने ..

अनुराग said...

ji haan ...agar sirf ye chote se badlaav hi aa jaaye to ek bada badlaav saf dikhne lagega ....

अरुण कुमार वर्मा said...

shai likha sir aap ne.