Thursday, April 17, 2008

स्त्रियों के नए हेडमास्टर

स्त्रियों को क्या नहीं पहनना चाहिए
राजकिशोर

कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश सीरिएक जोसेफ ने स्त्रियों के आदर्श लिबास पर एक परंपरागत टिप्पणी दे कर अपनी उंगलियां जला ली हैं। अवसर था जुडिशियल इम्पायर नाम की मासिक पत्रिका का लोकार्पण समारोह। इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय की एक पत्रिका का भी विमोचन होना था, जिसका संबंध भारतीय विवाह अधिनियम, 1955 से है। बढ़ते हुए अपराधों के कारणों पर विचार करते हुए जज साहब अचानक स्त्रियों की पोशाक की चर्चा करने लगे। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के विरुद्ध अपराध इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि वे उत्तेजक कपड़े पहनने लगी हैं। उन्होंने इसका जो उदाहरण दिया, वह कम दिलचस्प नहीं है। जज साहब ने बताया, 'आजकल स्त्रियां मंदिरों और चर्चों में भी ऐसे कपड़े पहन कर आती हैं कि ईश्वर की ओर से हमारा ध्यान उचट जाता है और हम अपने सामने उपस्थित व्यक्ति का ध्यान करने लगते हैं।' आगे उन्होंने फरमाया, स्त्रियां बसों में जिस तरह के उत्तेजक कपड़े पहनती हैं, उससे बसों में यात्रा कर रहे पुरुषों के सामने असमंजस की स्थिति आ जाती है। उन्होंने स्त्रियों को जन हित में शालीन कपड़े पहनने की सलाह दी।

कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की मानसिकता को हम समझ सकते हैं। वे सीधे-सादे आदमी होंगे और जटिल समस्याओं पर सीधे-सादे ढंग से बोल रहे होंगे। इसके पहले भी अनेक जज तथा समाज सेवी यह विचार प्रगट कर चुके हैं कि उत्तेजक कपड़े पहननेवाली स्त्रियां बलात्कार के लिए आमंत्रण देती हैं। यानी स्त्रियों पर बढ़ते अपराधों के लिए पुरुष नहीं, स्त्रियां खुद जिम्मेदार हैं। बहुत-से लोगों को यह बात सही भी लगती है। लेकिन तनिक-सा विचार करते ही संभ्रम परदा फट जाता है और सत्य सामने आ जाता है। इस सिलसिले में विचारणीय बात यह है कि ज्यादातर बलात्कार किन स्त्रियों के साथ होता है। उन स्त्रियों के साथ नहीं जो उच्च या मध्य वर्ग से आती हैं और ऐसी पोशाक पहनती हैं जो उनके शरीर सौंदर्य को कामुक ढंग से उद्धाटित करने में मदद करती हैं। ये स्त्रियां सामाजिक रूप से पूर्णत: सुरक्षित होती हैं और लोग भले ही पीठ पीछे उनकी रुचियों या इरादों पर टिप्पणी करें, लेकिन उनकी उपस्थिति में अपना मुंह सिला रखते हैं। सचाई यह है कि अकसर बलात्कार का शिकार होती हैं वे औरतें जो दीन-हीन वर्ग से आती हैं। कहते हैं, गरीब की जोरू सबकी भौजाई होती है। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि गरीब की बेटी पर पड़नेवाली सारी निगाहें लगभग एक जैसी होती हैं। बलात्कारी सौन्दर्य का उपासक नहीं होता। न आकस्मिक उत्तेजना का शिकार। वह एक ऐसा छिपा हुआ भेड़िया है जो सबसे कमजोर शिकार पर वार करता है।

दूसरी बात यह है कि स्त्रियां क्या पहनें और क्या नहीं, इसका फैसला करनेवाला पुरुष कौन होता है? क्या पुरुष स्त्रियों से अनुमति ले कर अपनी पोशाक तय करते हैं? ऐसा लगता है कि पुरुष किसी न किसी रूप में स्त्रियों के जीवन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं। जब वे निजी जीवन में पराजित हो जाते हैं, तो सार्वजनिक मंचों से स्त्रियों पर हमला बोल देते हैं। लेकिन मामला उतना सीधा नहीं है जितना सतही तौर पर दिखाई पड़ता है। अगर हम यह मानते हैं कि स्त्रियों की भड़कीली पोशाक देख कर पुरुषों के मन में कामुकता का संचार होने लगता है, तब तो अमीर लोगों को मंहगी गाड़ियों में चलते देख कर गरीब राहगीरों के मन में ईर्ष्या का ज्वार उठना चाहिए और इन्हें अमीरों पर हमला कर देना चाहिए। इसी तरह, बैंकों में जमा लाखों-करोड़ों रुपयों को भी जन हिंसा का कारण बन जाना चाहिए। या रेल यात्रियों को हवाई अड्डों पर नजर पड़ते ही कुपित हो जाना चाहिए। मिठाई की दुकानों में प्रदर्शित मिठाइयों को देख कर भी हमारे मुंह में पानी आ जाता है, लेकिन हम इन दुकानों से मिठाई उठा कर खाने तो नहीं लगते। कानून कहिए या सभ्यता, कुछ है जो ऐसे सभी मौकों पर हमें रोकता है और हम आत्मनियंत्रण का परिचय देते हैं। फिर स्त्रियों के मामले में ही हम फिसलने का अधिकार क्यों अपने पास रखना चाहते हैं? क्या इसलिए कि स्त्रियां हमारी निगाह में भोग का सामान हैं और उनका भोग करना पुरुष वर्ग का नैसर्गिक अधिकार है? जैसे ही हम स्त्रियों को मनुष्य के रूप में देखना शुरू करेंगे, उनके मानव अधिकारों का सम्मान करना शुरू कर देंगे, जिसमें यह भी शामिल है कि वे क्या पहनें और क्या न पहनें, यह तय करने का अधिकार उन्हें ही है, किसी और को नहीं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिक पूंजीवाद के दबाव से, जिसमें विज्ञापन तथा मास मीडिया उद्योग अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए लगातार स्त्री देह का शोषण करता रहता है, हमारे इर्द -गिर्द कामुकता का आक्रामक वातावरण तैयार करने का सुनियोजित अभियान जारी है। यह पश्चिमी सभ्यता का एक ऐसा मधुर आक्रमण है जिसके कड़वे जहर को अब पहचाना जाने लगा है। कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश अगर यह कहते कि कामुकता की यह संस्कृति हमारे जीवन को एकायामी बना रही है और इस विनाशकारी संस्कृति में स्त्रियों को अपनी सही भूमिका पहचाननी चाहिए, तो वे शायद एक भला और जरूरी काम कर रहे होते। लेकिन एक सभ्यतागत समस्या पर विचार करने के स्थान पर उन्होंने अपनी निगाह सिर्फ स्त्रियों की पोशाक पर केंद्रित की, जिससे उन्हें सार्वजनिक आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं है कि कोई स्त्री क्या पहनती है, सवाल यह है कि नई संस्कृति में पोशाक से किस तरह का काम लिया जा रहा है, फिल्मों में और टीवी पर दर्शकों को लुभाने के लिए स्त्रियों को किस तरह पेश किया जा रहा है।

जाहिर है, फिल्मों और टीवी की नायिकाओं के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि अभिनय करते समय वे वही पहनती हैं जो वे चाहती हैं। इतनी आजादी उन्हें कहां। वे निर्देशक के हुक्म की गुलाम होती हैं और यह वही तय करता है कि उसकी अभिनेत्रियों को कब और कहां अपने को कितना छिपाना है और कितना दिखाना है। यह सौंदर्य के प्रदर्शन का मामला नहीं है। सौन्दर्य की अनुभूति हमें अनिवार्य रूप से कामुक नहीं बनाती। वह हमारे सौन्दर्य बोध को तृप्त करती है और उसका परिष्कार भी करती है। सिनेमा और टीवी अभिनेत्रियों की इस पेशागत मजबूरी को न समझ कर जब अन्य स्त्रियां उनकी नासमझ नकल करने लगती हैं, तो इससे यही पता चलता है कि व्यावसायिकता का दबाव कितना गंभीर है। पहले गृहस्त्र स्त्री और पतुरिया की पोशाक अलग-अलग होती थी। अब दोनों में भेद मिटता जा रहा है। नहीं, सर, नहीं, हम कर्नाटक के मुख्य न्यायाधीश की बात को दूसरे तरीके से दुहरा नहीं रहे हैं। हम इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि धीरे-धीरे यह तय करना कठिन होता जा रहा है कि कौन-सी रुचि हमारी अपनी है और कौन-सी रुचि हम पर लादी जा रही है। बहरहाल, स्थिति जो भी हो, कानून के द्वारा या फतवे जारी कर हम स्त्रियों के विकल्पों को सीमित नहीं कर सकते। हां, इस विमर्श में स्त्रियों को जरूर आमंत्रित कर सकते हैं कि कहीं वे अनजानत: किसी भयानक सांस्कृतिक षड्यंत्र का शिकार तो नहीं हो रही हैं। (साभार : भास्कर, दिल्ली)

5 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

राज किशोर जी, आप अपने आलेख को जस्टीफाई न करें इस से वह फायरफॉक्स में सही नहीं दिखता। आप उसे लेफ्ट अलाइन करें। इसी कारण से चोखेरबाली वाली पोस्ट भी सही नहीं दिख रही है।

note pad said...

लेख तर्कसम्मत है और स्त्री की पोशाक व बलातकार के मामले मे दी जाने वाली पौराणिक टिप्पणियों का अच्छा उत्तर है ।
धन्यवाद!

अतुल said...

गरीब की जोरू सबकी भौजाई.यह सटीक टिप्पणी है.
लेकिन एक बात पर संदेह है कि समाज का एक सद्स्य होने के नाते स्त्रियों के बारे में पुरूष और पुरुषों के बारे में स्त्रियों को क्यों नहीं बोलना चाहिए. जोर तो इसपर होना चाहिए कि अगर स्त्रियां पुरुषों के बारे में नही बोल रहीं तो उसे बोलने को प्रेरित किया जाए, जबकि आपका जोर समाज को खंड कर देखने पर है. क्या आप भी नारीवाद की संकीर्ण मानसिकता से तो ग्रस्त नहीं हैं ? जो समतावाद- समाजवाद की राह के आधुनिक और नए रोडे बनकर उभरे है. एक बात और, मुझे जज साहब का समर्थक न माना जाए.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपका कहना सही है, राजकिशोर जी , किसी के कपडों को लेकर किसी दूसरे को अपना नियम बनाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। स्त्रियों के मामले में तो ये समस्या बन जाती है। आज की नारी को अब समझाने की जरूरत नहीं है। आप बताएं कि कपडों से आपके अंग झलकते हैं तो सुनिए ये कि 'जो दिखाने लायक है वो तो झाल्केगा ही' वह क्या बात है? दूसरी समस्या ये है कि आप नारी का समर्थन करो तो मरो 'औरत को देख कर लार गिरा रहा है' न करो तो सुनो 'नारी प्रगति का विरोधी है'। इसलिए जो चल रहा है उसे चलने दीजिये, हम अपने-अपने घर की नारियों को ही संभाल ले यही बहुत है।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपका कहना सही है, राजकिशोर जी , किसी के कपडों को लेकर किसी दूसरे को अपना नियम बनाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। स्त्रियों के मामले में तो ये समस्या बन जाती है। आज की नारी को अब समझाने की जरूरत नहीं है। आप बताएं कि कपडों से आपके अंग झलकते हैं तो सुनिए ये कि 'जो दिखाने लायक है वो तो झाल्केगा ही' वह क्या बात है? दूसरी समस्या ये है कि आप नारी का समर्थन करो तो मरो 'औरत को देख कर लार गिरा रहा है' न करो तो सुनो 'नारी प्रगति का विरोधी है'। इसलिए जो चल रहा है उसे चलने दीजिये, हम अपने-अपने घर की नारियों को ही संभाल ले यही बहुत है।