Tuesday, February 12, 2008

वेलेंटाइन दिवस पर

संत ने यह तो नहीं कहा था
राजकिशोर

भारत के महानगरों में वेलेंटाइन दिवस मनाना इतना लोकप्रिय हो गया है कि संत वेलेंटाइन अपने ही देश के लगने लगे हैं। वैसे, संत स्वभावत: सार्वदेशिक होते हैं। वे किसी विशेष क्षेत्र के भले की नहीं, विश्व भर के हित में सोचते हैं। इसी तरह, सभी समाजों के संतों में कुछ बातें सामान्य होती हैं। फिर भी धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश के कारण संतों के नाम, वेशभूषा, भाषा आदि अलग-अलग हो जाते हैं। यह एक तरह से अच्छा ही है, क्योंकि इससे यह बात साबित होती है कि कोई भी समाज ऐसा नहीं है जिसने संत न पैदा किए हों। यह मानव समाज की विविधता में एकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसलिए संत वेलेंटाइन अगर भारत के मध्य वर्ग की युवा पीढ़ी के आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं, तो यह कोई हैरत की बात नहीं है।

हैरत की बात यह है कि संत वेलेंटाइन एकमात्र ईसाई समाज में ही पैदा हुए। दूसरी परंपराओं में ऐसा कोई संत दिखाई नहीं देता जो प्रेम और विवाह जैसी चीजों में सिर खपाता हो। माना जाता है कि संत का संबंध इहलोक से नहीं, परलोक से होता है। लेकिन यह बात पूरी तरह से सही नहीं है। यदि धर्म मूलत: धरती के जीवन की समस्याओं का समाधान करने के लिए अस्तित्व में आया था, तो संत भी सामाजिकता से परे नहीं हा सकते। उन्होंने भले ही स्वयं लौकिकता का त्याग कर दिया हो, पर उनकी शिक्षाएं उनके भी काम की हैं जो लौकिकता में डूबे हुए हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो कोई भी समाज संतों की पूजा नहीं करता।
संत वेलेंटाइन किस बात के प्रतीक हैं? उन्हें इसलिए याद किया जाने लगा है कि जब राजा ने शादी करने पर रोक लगा दी, क्योंकि उसे युद्ध के लिए सैनिक चाहिए थे, तो उन्होंने इस तानाशाही के खिलाफ विद्रोह कर दिया और नौजवान जोड़ों की शादी कराने लगे। ऐसा नहीं है कि संत वेलेंटाइन को ब्रह्मचर्य की मान्यता का पता नहीं होगा। ज्यादा संभावना है कि वे स्वयं ब्रह्मचारी ही रहे होंगे। लेकिन मैं अपने लिए ब्रह्मचर्य को उचित मानता हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि जो ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए उत्सुक नहीं हैं, उनके अधिकारों के अतिक्रमण में सहयोग करने लगूं। जो तर्क सामान्य गृहस्थ के लिए आदरणीय है, वह संतों पर तो और गंभीरता से लागू होता है। इस नाते संत वेलेंटाइन ने अगर विवाहों को प्रोत्साहित करना शुरू किया, तो वे अपने समय के युवकों के एक मूल मानव अधिकार की ही रक्षा कर रहे थे। इसके लिए जिस नैतिक साहस की जरूरत थी, वह किसी संत में ही पाई जा सकती है। गृहस्थ डर का शिकार हो सकता है, वह राज्य की अवमानना करने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि वह तमाम प्रकार के लोभों-प्रलोभों से घिरा होता है। इसके विपरीत, संत ने चूंकि सब कुछ त्याग दिया है, इसलिए उसमें उच्चतम कोटि का साहस आ जाता है। संत वेलेंटाइन, इस तरह, एक आवश्यक साहस के भी प्रतीक हैं।
संत वेलेंटाइन पश्चिम के वर्जनाहीन समाजों की तुलना में उन समाजों के लिए ज्यादा प्रासंगिक हैं, जो अभी भी परंपरागत मानसिकता के शिकार हैं। ये वे समाज हैं जहां स्त्री-पुरुष का जीवन प्रतिबंधों की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। प्रेम करने की आजादी प्रत्येक स्त्री-पुरुष का नैसर्गिक अधिकार है। लेकिन परंपरागत और वर्जनाग्रस्त समाजों में, जिनमें हम भी एक हैं, इस अधिकार को शक की निगाह से देखा जाता है। बुजुर्ग चाहते हैं कि युवा पीढ़ी के अंतरंगतम निर्णय भी उनके आदेश से लिए जाएं। देश के कुछ हिस्सों में प्रेमी युगलों के साथ जो नृशंस व्यवहार किया जाता है, दहेज की मार ने जिस तरह लाखों युवतियों का जीना हराम किया हुआ है, उसे देखते हुए वेलेंटाइन की प्रगतिशील पहल का सम्मान करना चाहिए। वे हमारे भी संत हो सकते हैं, क्योंकि वे परिस्थितियां हमारे यहां काफी मौजूद हैं जिनमें राजा की तो नहीं, पर परिवार और समाज की तानाशाही से युवा हृदयों की तमन्नाओं का गला घोंट दिया जाता है।
इस संदर्भ में जिस बात की ओर हमारा ध्यान जरूर जाना चाहिए कि ईसाई संत ने, दरअसल, प्रेम को सामाजिक बनाने का प्रयास किया था। राजा के आदेश से शादी करना भले ही रुक गया हो, पर प्रेम करने पर कौन रोक लगा सकता है? जब प्रेम को अपनी स्वाभाविक परिणति तक पहुंचने से रोक दिया जाता है, तो समाज में तरह-तरह की विकृतियां फैलने लगती हैं। संत ने जरूर इसे लक्षित किया होगा। तभी उन्होंने प्रेमियों का आह्वान किया होगा कि डरने की जरूरत नहीं, तुम मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विवाह के बंधन में बांधने के लिए तैयार हूं। इस तरह, संत सिर्फ प्रेम करने की स्वतंत्रता के समर्थक नहीं थे, वे चाहते थे कि इसका एक जिम्मेदार स्वरूप भी हो, क्योंकि इसी तरह वह टिकाऊ हो सकता है। प्रेम के आनंद के साथ प्रेम की नैतिकता भी जुड़नी चाहिए। प्रेम का अराजकतावादी दृष्टिकोण व्यक्ति और समाज, दोनों को जहन्नुम की ओर ले जा सकता है।

लेकिन हमारे यहां संत से सीखा नहीं जा रहा है, संत का इस्तेमाल किया जा रहा है। वेलेंटाइन दिवस पर प्रेम प्रदर्शन की इस कदर बाढ़ आ जाती है कि उसके वास्तविक होने पर संदेह होने लगता है। यह सोच कर आश्चर्य होता है कि ये लोग साल भर अपना प्रेम कहां छिपाए हुए थे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस वर्ग में संत को कुछ ज्यादा ही श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है, उस वर्ग में विवाह को उतनी गंभीरता से नहीं देखा जाता। उनके लिए विवाह खुले रूप से साथ रहने की एक युक्ति भर है। निश्चय ही, संत यह नहीं चाहते होंगे कि नौजवान आज विवाह करें और कल तलाक की दरख्वास्त ले कर काजी के सामने पहुंच जाएं। प्रेम संबंध शरीर मीमांसा का एक अध्याय भर नहीं है। प्रेम करने का साहस विवाह करने की जिम्मेदारी में बदले और विवाह की नैतिकता प्रेम करने की शक्ति को बढ़ाए, संत यह भी चाहते होंगे। परंपरागत विवाह में अगर तानाशाही का तत्व था, तो आधुनिक विवाह किसी गहरी प्रतिबद्धता पर टिका हुआ प्रतीत नहीं होता। इसलिए वेलेंटाइन दिवस के समारोही वातावरण को कोसने की जरूरत नहीं है, नौजवानों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि रासरंग के साथ-साथ प्रेम के और भी आयाम होते हैं।

1 comment:

अफ़लातून said...

बहुत सुन्दर ।