Monday, October 1, 2007

ईशनिन्दा का सवाल

कुछ शब्दों को भूल जाइए, जैसे ईशनिन्दा
राजकिशोर

भारतीय जनता पार्टी के पढ़े-लिखे लोग भी, जैसे लालकृष्ण आडवाणी, जब ईशनिन्दा जैसे शब्दों का प्रयोग हिन्दू धर्म के संदर्भ में करते हैं, तो मन उदास हो जाता है। ये लोग हमेशा इस बात पर गर्व करते हैं कि हिन्दू धर्म दुनिया भर में एक निराला धर्म है, क्योंकि इसमें लोकतंत्र और उदारता 'इन-बिल्ट' हंै। हिन्दू आदमी सहज ही विशालहृदय होता है और सभी धर्मों का सम्मान करता है। अपनी इस मान्यता के आधार पर ये नेता इस्लाम और ईसाइयत की निन्दा करने का कोई भी अवसर नहीं चूकते। विडंबना यह है कि जब मौका पड़ता है, तो इन्हीं धर्मों की कुछ अननुकरणीय आदतों का अनुकरण करने से बाज नहीं आते और इस तरह सिद्ध करते हैं कि इस्लाम और ईसाइयत कुछ मामलों में हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ हैं, क्योंकि हिन्दू समाज आज भी उनसे कुछ सीख सकता है।

ऐसी ही एक चीज है, ब्लेसफेमी, जिसे हिन्दी में ईशनिन्दा कहा जा रहा है। इस शब्द का हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा में सही-सही अनुवाद नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह अवधारणा ही भारत में नहीं रही है। आज भी नहीं है। किसी भी गांव या शहर में आप ऐसे व्यक्तियों से आसानी से टकरा जा सकते हैं जो ईशनिन्दा में रस लेते हैं। ईशनिन्दा की ईसाई अवधारणा में सिर्फ ईश की निन्दा शामिल नहीं है, बाइबिल, ईसा मसीह, चर्च, पोप आदि की निन्दा भी शामिल है। मध्य युग के यूरोप में यह सबसे गंदा और खतरनाक शब्द बन गया था, क्योंकि ईशनिन्दा का आरोप लगा कर लाखों ऐसे पुरुष-स्त्रियों का सफाया कर दिया गया जो उस समय के चर्च से सहमत नहीं थे या जिनके बारे में ऐसी आशंका थी। यह एक तरह से यूरोपीय समाज का गृह युद्ध था, जिसमें कैथलिक धर्म सत्ता अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हर इलाके में खूनी दस्ते पैदा कर रही थी। प्रेम और करुणा की शिक्षा देने वाला, ईसा मसीह का कोमल-संवेदनशील धर्म अचानक भेड़िए की तरह खूंखार हो गया था और उछल-उछल कर तर्कशील मानवता का शिकार कर रहा था। इस्लाम में भी इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। सलमान रुश्दी की जान लेने के लिए जारी किए गए फतवों के पीछे यह भावना ही है कि उन्होंने ईशनिन्दा का अपराध किया है।
भारत में ईशनिन्दा का मामला कभी कोई मुद्दा ही नहीं बना, क्योंकि यहां न तो ईश का कोई एक ही स्वरूप मान्य है, न कोई एक धर्म पुस्तक है जिसकी शिक्षाओं पर चलने के लिए सभी को बाध्य किया जाता हो और न ही चर्च जैसा कोई अखिल भारतीय संगठन है जो लोगों के धार्मिक और सामाजिक जीवन को नियंत्रित करता हो। यहां प्रारंभ से ही 'मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना' और 'जतो मत ततो पथ' की मान्यता रही है। वैचारिक स्वातंत्र्य की इस परंपरा के कारण हमारे देश में ऐसे संप्रदाय भी पनपे और लोकप्रिय हुए जिनमें गॉड और अल्लाह जैसी धारणाओं के लिए कोई जगह ही नहीं है। भारतीय दर्शन के कई ऐसे रूप हैं, जिनमें सृष्टि का निर्माण करने वाले परमात्मा के लिए कोई मान्यता नहीं है। चार्वाकों की एक बहुत पुरानी परंपरा है जो इस लोक को ही सत्य मानते थे तथा परलोक, स्वर्ग, नरक, पूजा-पाठ, श्राद्ध, ब्राह्मण वर्ग, जाति आदि का मजाक उड़ाया करते थे। गीता में खुद भगवान कृष्ण कहते हैं कि मेरे पास आने का कोई एक निश्चित तरीका नहीं है। बौद्ध और जैन धर्मों में ब्राह्मण मतों की लगभग सारी चीजों को नकारा गया है। बाद में भक्ति आंदोलन के दौरान तो सारी परंपरा ही उलट-पुलट दी गई। भक्त कवियों ने दशरथ-सुत को अपना राम मानने से इनकार कर दिया। उन्हें उस राम से कोई लगाव नहीं था जिसने शंबूक की हत्या की थी और सीता का परित्याग कर दिया था। वे राम के उस आकाशधर्मी व्यक्तित्व पर फिदा थे जिसकी गोद में सिर रख कर किसी भी जाति का किसी भी तरह का आदमी असीम शांति का अनुभव कर सकता था। वे लौकिक राम को नहीं, जिसकी सीमाएं थीं, अलौकिक राम को खोज रहे थे, जो असीम है और जिस पर किसी विशेष समाज या वर्ग की नैतिकता आरोपित नहीं की जा सकती।
ऐसे समाज में अगर कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि राम ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं थे या राम के ऐतिहासिक व्यक्ति होने का कोई पुरातात्विक साक्ष्य नहीं मिलता, तो दूसरों के पास इसके सिवाय कोई और सभ्य विकल्प नहीं है कि वे या तो एक शालीन चुप्पी की शरण में चले जाएं या साक्ष्य और तर्क के आधार पर इस स्थापना का खंडन करें। अगर तर्क और साक्ष्य की कमी है, तो कोई भी भलामानुष यह कह कर उस व्यक्ति से झगड़ा नहीं करेगा या अदालत में उसकी पेशी नहीं कराएगा कि वह तो ईशनिन्दा कर रहा है। अगर राम को अनैतिहासिक बताना ईशनिन्दा है, तो दलित विचारकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा राम की लगातार आलोचना करना कि वे जाति प्रथा में विश्वास करते थे, कि उन्होंने ब्राह्मणों का वर्चस्व बनाए रखने के लिए पिछड़ी जाति के तपस्वी शंबूक की बिना वजह हत्या कर दी, उन्होंने निर्दोष सीता को राज्यबदर कर दिया, क्या तथाकथित ईश निन्दा के दायरे में नहीं आता? फिर अभी तक आडवाणी जैसे नेताओं ने इस संदर्भ में यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया? भाजपा ने जब मायावती के साथ मिल कर सरकार बनाई थी, तब क्या उसे पता नहीं था कि मायावती को ईश निन्दा में आनंद आता है? क्या स्वयं डॉ. आंबेडकर ने ईशनिन्दा का अपराध नहीं किया थ? क्या गांधी जी भी ईशनिन्दा के अपराधी नहीं थे, क्योंकि वे अकसर कहा करते थे कि मेरा राम वह नहीं है जो अयोध्या का राजा था? नहीं सर, भारत में अगर ईशनिन्दा को अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाएगा, तो गांधी और आंबेडकर ही नहीं, भगत सिंह जैस क्रांतिकारी सपूत भी इस कठघरे मेंं कैद हो जाएंगे। देश में इस समय वैसे ही विग्रह कम नहीं है, कृपया इसका एक और अध्याय खोलने की मेहरबानी न करें।
फतवे का मामला भी ऐसा ही है। भाजपा के एक पूर्व सांसद ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के खिलाफ एक किस्म का फतवा जारी किया और जब चारों तरफ आलोचना होने लगी, तो वे मुकर गए, मानो प्रेस हमेशा गलत रिपोर्टिंग करता हो। यह ईश निन्दा की तरह ही एक नई बीमारी है। भारत में धर्मपीठों या मान्य विद्वानों द्वारा निर्णय दिए जाते रहे हैं, व्यवस्थाएं दी जाती रही हैं, लेकिन किसी ने कोई फतवा जारी नहीं किया। यह देश फतवों से नहीं, धार्मिक चेतना और विवेक से संचालित होता रहा है। ऐसा नहीं है कि धार्मिक चेतना समय-समय पर मंद नहीं पड़ी है या विवेक कुंद नहीं पड़ा है, पर किसी के भी, वह चाहे जितना भी बड़ा हो या बड़े पद पर हो, इस दावे को स्वीकार नहीं किया गया कि सत्य उसकी मुट्ठी में कैद है। इस दृष्टि से भाजपा का दर्शन पहला ऐसा भारतीय दर्शन है जो मानता है कि हमारे सिवाय सभी गलत और झूठे हैं और हमें उनके खिलाफ भीड़वादी कार्रवाइयां करने का अधिकार है। पुरानी भाषा में इसे सांप्रदायिक उन्माद कहा जाता था, आजकल इसे फासीवाद के माध्यम से समझा जाता है। सेतु समुद्रम परियोजना पर अमल हो या नहीं हो, राम जैसे चरित्र को हिटलरी बाना पहनाने की कोशिश करना एक बीमार दिमाग का काम है।

2 comments:

सुबोध,लखनऊ said...

बिल्कुल ठीक कहा सर आपने..जिस राजनीतिक दल की बुनियाद ही गलत हो..उससे ठीक ठंग से किसी भी मुद्दे पर व्यवहार करने की उम्मीद करना बेमानी है..

दिलीप मंडल said...

राजकिशोर जी, आपकी ओर से बहुत ही उपयोगी और समय पर किया गया हस्तक्षेप है। यूपीए की अक्षमता और अलोकप्रिय होती छवि के बीच बीजेपी को एक बार फिर सत्ता में लौटने की गंध मिलने लगी है। और वो -मेरा रंग कितना चोखा है- ये बताने में जुटी है।